धूप-ताप प्रो. डॉ. पुष्पिता अवस्थी
धूप निचोड़ लेती है देह के रक्त से पसीना
माटी से बीज बीज से पत्ते पत्ते से वृक्ष और वृक्ष से निकलवा लेती है - धूप सबकुछ
धूप सबकुछ सहेज लेती है धरती से उसका सर्वस्व और सौंप देती है - प्रतिदान में अपना अविरल स्वर्णताप कि जैसे - प्रणय का हो यह अपना विलक्षण अपनापन