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06.03.2012


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पहली घटना-

 - बेटा, बहू को भी अपने साथ ले जा। शादी ब्याह में साथ जाओ तो अच्छा लगता है।

-मगर पिताजी। आपकी देखभाल कौन करेगा? वैसे भी दोस्त की बहिन की शादी है। मैं ही चला जाता हूँ।

-अरे बेटा। हम इतने भी बूढ़े नहीं हुए कि देखभाल की जरूरत पड़े। तू बहू को ले जा। माँ ने कहा।

- मैं अनपढ़, गँवार और बदसूरत हूँ ना इसलिए नहीं ले जाते। शर्म महसूस होती है। पत्नी ने मन ही मन कहा।

दूसरी घटना-

- अरे बेटा। बहू को ले जाकर क्या करेगा? दोस्त के भाई की ही शादी है। तू ही चला जा।

-मगर पिताजी।

-बेटा, घर में भी बहुत काम रहता है। फिर आजकल तेरे पिताजी की तबीयत भी ठीक नहीं रहती। तू ही चला जा। माँ ने कहा।

- माँ, तुम तो जानती हो। इस समय बसों-ट्रेनों में कितनी भीड़ होती है। डेढ़-दो घण्टे क्यू में लगो तो टिकट मिलता है। और इस भीषण गर्मी में डेढ़-दो घण्टे..!

-तो इसमें बहू क्या करेगी? पिताजी संयत स्वर में खीझते हुए बोले।

-लेडिज़ क्यू में...।



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