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उनसे यूँ जुदा होकर फिर क़रीब आने में
देर लगती हैं आखिर फ़ासले मिटाने में
कितनी देर लगती है आसमां झुकाने में
लोग-बाग माहिर है उँगलियाँ उठाने में
किस तरह भला उसने ये जहां बना डाला
दम निकल गया मेरा अपना घर बनाने में
आज़माके तो देखूँ एक बार उसको भी
जो यक़ीन रखता हो सबको आज़माने में
तेरे सामने सारा रोम जल गया नीरो
तू लगा रहा केवल बाँसुरी बजाने में
मुश्क़िलों से घबरा कर राह में न रुक जाना
ये तो काम आती हैं होंसला बढ़ाने में
दिन सुहाने बचपन के रूठ जायेंगें इक दिन
इल्म ये कहाँ था पुरु मुझको उस ज़माने में
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