| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 05.22.2009 |
|
रिश्तों से अब डर लगता है |
|
रिश्तों से अब डर लगता है। चहरों पे शातिर मुस्कानें संग हवा के उड़ने वाला हथियारों की इस नगरी में जीवन के झोंकों पर तेरा सारा जग सिमटा घर में तो |
|
|
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|