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06.03.2012


मेरे उसके दरमियां दूरियाँ चलती रहीं

मेरे उसके दरमियां दूरियाँ चलती रहीं
उम्र भर हमराह तन्हाइयाँ चलती रहीं

लाख चाहा पर कभी खुल के रो पाए न हम
बंद कमरे में फ़क़त हिचकियाँ चलती रहीं

तश्नालब तरसा किए एक क़तरे के लिए
सर पे साये की तरह बदलियाँ चलती रहीं

रू-ब-रू तारीफ़ के पुल कईं बंधते रहे
पीठ के पीछे मगर गालियाँ चलती रहीं

आँसुओं की शब कभी मुस्कुराहट की सहर
ज़ीस्त की बाज़ी में यूँ पारियाँ चलती रहीं

फ़ासला मंजि़ल से हर गाम पर बढ़ता गया
’पुरू‘ सफ़र ज़ारी रहा दूरियाँ चलती रहीं



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