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06.03.2012


मैं कुछ नहीं कहता

मै रो नहीं सकता
क्योंकि मेरे आँसुओं की कोई कीमत नहीं है

मैं अपना दुःख किसी को बता नहीं सकता
चूँकि यह लोगों को मामूली लगता है

मैं शिकायत नहीं कर सकता
चूँकि मुझ पर अहसान लदे हैं

मैं अपने ज़ज़्बात बयां नहीं कर सकता
चूँकि लोग इन्हें तर्क देकर अमान्य कर देते हैं

मैं अपनी इच्छा से कोई कार्य नहीं कर सकता
चूँकि उनकी इच्छा सर्वोपरि है

मैं अपनी तुच्छ ख़ुशियां प्रकट नहीं कर सकता
चूँकि जानने के पूर्व ही उनके चहरे पे खिंच आती हैं
अज़ीब सी लक़ीरें

मैं खुल कर अपनी बात कह नहीं सकता
चूँकि उन्हें फ़िज़ूल बातें सुनने का वक़्त नहीं हैं

मुझे उनके इशारे समझ कर
काम करना पड़ता है
न चाहते हुए भी मुझे
हँसना पड़ता है उनकी ख़ातिर
उनके हर अच्छे-बुरे काम की
तारीफ़ करनी पड़ती है
उनकी हर राय को समर्थन देना होता है
उनके दिखावटी ग़म में
आँसू बहाने पड़ते हैं
उनकी उदासी में उदास होना पड़ता है
उनके ग़ुस्से को दयनीय बन कर
सहना पड़ता है

मेरा अपना कोई वज़ूद नहीं
मेरी कोई इच्छा नहीं
मेरा कोई सपना नहीं

मैं ख़ामोश रहता हूँ
बिल्कुल ख़ामोश
कुछ नहीं कहता
सब कुछ सुनता हूँ


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