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06.03.2012


महाकुम्भ

 "अपनी माँ को कुम्भ के मेले में क्यूँ नहीं ले जाते?" पत्नी ने परम्परागत कारगर उपाय बताया।

"इतना लम्बा सफ़र मैं कैसे तय कर पाऊँगी बेटा? बुढ़ापे में शरीर भी तो साथ नहीं देता। मेले में भीड़ भी तो कितनी होती है। बेकार में तुम्हे दिक्कत होगी। तुम दोनों चले जाओ। शायद इस पुण्य से बहू की गोद हरी हो जाए।"

"पर माँ तुम अकेली कैसे रहोगी?" बेटे ने फिक्र ज़ाहिर की।

"मेरी चिंता मत करो तुम लोग जाओ", माँ ने मुस्कराकर कहा।

"चलो ये भी अच्छा हुआ। हमें आने-जाने में महीने-दो महीने तो लग ही जायेंगें। इतने समय में बुढ़िया सिधार जायेगी और गाँव वाले क्रिया-करम भी कर देंगें", पत्नी ने दूसरा उपाय बताया।

दो-ढाई महीने बाद...

"अरे, बेटा ! तुम अकेले कैसे? बहू कहाँ है?" माँ ने आश्चर्य से पूछा।

बेटा सिर पकड़ कर बैठ गया और रोने लगा।


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