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03.05.2009
 

कपड़े झड़ रहें हैं 
पुरु मालव


कपड़े झड़ रहें हैं दोनों के बदन से
दोनों नंगे हुए जाते हैं
मैं चिथड़ा-चिथड़ा जोड़कर
नाकाम कोशिशें करता हूँ
बदन ढाँकने की
और तुमने कर दी चिथड़े-चिथड़े
अपनी शर्मो-हया
मेरे तार-तार कपड़ों से
झाँक रही है मुफ़लिसी
मेरी नीली शिराएँ,
उभरी हड्डियाँ,
मटमेली रूखी चमड़ी,
मेरा चिपका हुआ पेट,
डगमगाती असमर्थ टाँगें,
कँपकपाती भुजाएँ,
कमान की तरह झुकी पीठ

और तुमने कर दी तार-तार
सारी मर्यादाएँ
कपड़ा तुम्हें नहीं
तुम ढँक रही हो कपड़े को
अपने बदन से
कपड़ा सिमट कर रह गया है
तुम्हारे चुनिंदा अंगों तक
तुम दिखा रही हो बदन
फ़ैशन-शो में
सुडौल बाँहें,
नंगी टाँगें,
कसे हुए कूल्हे,
उभरे हुए स्तन,
निर्लज्ज हँसी,
कामुक नज़रें टटोल रही हैं
तुम्हारे हर अंग को
और तुम्हारी आँखों में
पल रहा है इक अंधा सपना

कपड़े झड़ रहे हैं
दोनों लाचार है
दोनों बेबस


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