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06.03.2012


हँसने-रोने के मुझे कितने बहाने आ गए

हँसने-रोने के मुझे कितने बहाने आ गए
याद जब ग़ुज़रे ज़मानों के फ़साने आ गए

तूने तो सौगंध ली थी भूल जाने की मुझे
फिर तेरे होंठों पे क्यूँ मेरे फ़साने आ गए

तीरग़ी ने कर दिया ओझल मेरा अपना वज़ूद
रोशनी में साये भी आँखें लड़ाने आ गए

कौन मुज़रिम है? ख़ता क्या थी? ये सब जाने हैं पर
घूम-फिर के हम पे ही इल्ज़ाम लगाने आ गए

मेल-जोल अपना उन्हें अच्छा नहीं लगता ज़नाब
अक़्सरन वो इसलिए हमको लड़ाने आ गए

नाज़ ‘पुरू‘ करते थे कितना आपकी उल्फ़त पे हम
अच्छा है होश अपने जल्दी ही ठिकाने आ गए



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