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05.23.2009
 

आज जिएँ कल मरना है 
पुरु मालव


आज जिएं कल मरना है
और हमें क्या करना है

भूली-बिसरी गलियों से
मुझको आज गुज़रना है

ख़ौफ़ मिटेगा दिल से कब
और कहाँ तक डरना है

आग बिछी है राहों में
देख-सम्हल पग धरना है

साथ रहो तुम या न रहो
मुझको पार उतरना है

थम न सके आँसू इनमें
आँखें क्या है, झरना है

एक खुशी की ख़ातिर ही
ग़म बाहों में भरना है


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