पुरू मालव

दीवान
अगर किसी ने यहाँ दिल से
अब साथ भी उनका रहे ..
आज जिएं कल मरना है 
आपके हर ग़म को सीने से
उनको समझा न मैं ...
उनसे यूँ जुदा होकर फिर ..
कहते हैं आँसू मोतियों से कम नहीं होते
क्यूँ ऐसा अक्सर लगता है
ग़म अगर दिल को मिला ..
जिसने ताउम्र अँधेरा सहा है
मेरे उसके दरमियां दूरियाँ चलती रहीं
यूँ तो घुट जाएगा दम
रिश्तों से अब डर लगता है
सुख-दुःख में जो साथ चले हैं
सैंकड़ों ग़म दिल पे अपने..
हँसने-रोने के मुझे कितने बहाने आ गए
कविता
कपड़े झड़ रहे हैं 
तुम और मैं
मैं कुछ नहीं कहता
लघुकथा
ख़याल
महाकुम्भ
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