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ISSN 2292-9754

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08.27.2016


परिधि और केंद्र

ढूँढ कर परिधि में मुझे
थक कर चूर हो गए तुम
बनकर मेरे अधिपति
मुझसे दूर हो गए तुम
प्रेम में अधिकार की चाहत
प्रेमी कहाँ हो तुम
क्षणिक अभिव्यक्त संबंध
कैसा था जुड़ाव
अरे मैं तो स्वयं नहीं अपने वश में
मेरा जन्म, मेरी मृत्यु
कुछ भी नहीं हमारे वश में
कैसा है प्रेम तुम्हारा
शेष है केवल तुममें
तुम और तुम्हारा
प्रेम में मैं कहाँ, तुम कहाँ
रिक्त नहीं, कि समा सकूँ
स्वतः सहजता से
बंद दरवाज़े पर थाप देकर
लौट आई पुनः केंद्र की ओर
चलो बंधनमुक्त हो गई
बनकर प्रेम सुगंध
व्याप्त हो गई ----


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