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| 07.12.2007 |
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मैनेजमेंट प्रमोद राय |
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दफ्तर की तीन मंजिली इमारत बाहर से जितनी भव्य थी, अंदर से उतनी ही आलीशान। चमकते फर्श, दमकती दीवारें और वातानुकूलित माहौल। खटकता था तो सिर्फ सीढ़ियों के पास का वह कोना जहाँ, कोई न कोई गुटका या पान थूक दिया करता था। हर दो दिन पर दीवार के उस हिस्से की पुताई करनी पड़ती, अगले दिन फिर लाल-पीले धब्बे। स्वीपर से लेकर गेटकीपर तक तंग आ चुके थे। बात जनरल मैनेजर तक पहुँची। मैनेजर ने गणेश जी की एक सुंदर मूर्ति मंगवाकर उस जगह पर रखवा दी। अगले दिन से लोगों ने वहाँ थूकना बंद कर दिया। |
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