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| 06.16.2007 |
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फ्री चिप्स प्रमोद राय |
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मल्टिप्लेक्स के ठीक सामने पोस्टर-बैनरों से लैस किसी कंपनी की प्रचार गाड़ी खड़ी थी। उसके इर्द-गिर्द एक ही रंग के कपड़ों में सजी-धजी लड़कियाँ डाँस कर रही थीं। नज़दीक जाने पर पता चला कि कंपनी के प्रचार के लिए मुफ्त में चिप्स बाँटे जा रहे है। माइक पर एक एनाउंसर ने बताया, आपको करना कुछ नहीं है, बस इस स्लिप में अपना नाम, पता, कॉन्टैक्ट नंबर वगैरह भरिए और ले जाइए चिप्स या कुरकुरे का एक पैकेट। मैंने बारी-बारी से दो पैकेट लिए और विजयी मुस्कान के साथ चिप्स का एक पैकेट पत्नी को थमा दिया। पत्नी ने हिचकिचाते हुए पैकेट खोला और बोली - “लेकिन ये मुफ्त में क्यों बाँट रहे हैं?” मैंने उसकी नादानी पर खीझते हुए कहा, “तुम्हें आम खाने से मतलब है या पेड़ गिनने से। यह मार्केटिंग का जमाना है। प्रचार और प्रोमोशन पर कंपनियाँ किसी भी हद तक खर्च कर सकती हैं।” अगले दिन मोबाइल पर आई कॉल के साथ मेरी नींद खुली। "हैलो, मैं फलां इंश्योरेंस से बोल रही हूँ। हमारे पास हेल्थ इंश्योरेंस की एक नई स्कीम है, मार्केट में किसी कंपनी के पास ..।" मैंने कहा, "मेरे पास पहले से हेल्थ इंश्योरेंस है।
इसके पहले कि वह कोई और पेशकश करे मैंने फोन काट दिया। इस तरह के अनवॉन्टेड कॉल से मैं बहुत पहले से परेशान था और अक्सर सोचता था कि इन कमबख्तों को मेरा नंबर कहाँ से मिल जाता है। इसी बीच, एक और कॉल आई,.."कॉन्ग्रैट्स! आप हमारे लकी ड्रा में चुने गए चंद विजेताओं में से एक हैं, जिन्हें फलां-फलां मॉल में अत्यंत ही रियायती दरों पर खरीदारी का ऑफर दिया जा रहा है।" मुझे इस तरह के रियायती दरों की हाल ही में महँगी कीमत चुकानी पड़ी थी, इसलिए मैंने कॉलर को झिड़कते हुए कहा, "अब फिर फोन मत करना।" सुबह-सुबह मूड खराब हो चुका था। मैं चाय की घूँट के साथ
गुस्से को निगलने की कोशिश कर रहा था। अचानक मैंने महसूस किया कि हर चुस्की
पर चिप्स का एक अजीबोगरीब जायका मेरे जेहन में तैर रहा है। |
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