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| 07.29.2007 |
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दोपहर और शाम प्रमोद राय |
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सुबह-शाम लोगों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाला निगम पार्क दोपहर होते-होते सुनसान हो जाता था। ऐसे में वहाँ या तो कुछ नशेड़ी होते थे, या फिर ताश खेलते कर्मचारी। ऐसी ही एक दोपहरी में पार्क के एक कोने में एक युवा जोड़ा बैठा हुआ था। लड़का दूसरी ओर देख रहा था, लेकिन कह कुछ लड़की से रहा था। लड़की लड़के को सुन रही थी, लेकिन देख कहीं और रही थी। बीच-बीच में एक दूसरे को देखते और ऐसे मुस्कराते, मानो किसी डर, बेचैनी और घबराहट को दबा रहे हों। लेकिन दोनों की आँखों में एक खुशी चमक रही थी। थोड़ी देर बाद अचानक आँखों की वह खुशी बदहवासी में तब्दील
हो गई। बेंच पर डंडे की आवाज से दोनों चौंक उठे। सिर उठाकर देखा तो सामने
दो पुलिस कॉन्स्टेबल खड़े थे। पुलिसवालों के चेहरे पर मुस्कान की ऐसी लकीरें खिंची,
जैसे किसी अपराधी से उसका गुनाह उगलवा लिया हो। सिपाही ने लड़के का कॉलर पकड़ते हुए बेंच से उठाया और
पूछताछ के लिए एक कोने में ले जाने लगा। लड़की शर्म, गुस्सा और लाचारी का
घूँट निगलते हुए काँपते स्वर में बोली, सूरज के साथ-साथ पार्क का सूनापन भी ढल रहा था। अब
धीरे-धीरे लोगों का आना शुरू हो गया। मेन गेट पर गुब्बारे और आइसक्रीम
वालों का जमघट लग गया। कुछ देर बाद पार्क के ठीक सामने सिगरेट-पान की दुकान
पर एक कार रुकी। आँखों पर काला चश्मा चढ़ाए एक लड़की ने ड्राइविंग सीट से ही
दो कोल्ड्रिंक माँगा। पीछे की सीट पर बैठे युवक ने एक सिगरेट का भी ऑर्डर
दिया। फिर कार पार्क के भीतर घुसते हुए पार्किग लॉन में पहुँची और एक पुलिस
वैन से थोड़ी दूर कई कारों के बीच में खड़ी हो गई। युवक-युवती कुछ देर बाद
बाहर निकले। एक दूसरे की कमर में हाथ डाले थोड़ी देर तक टहलते रहे। फिर गेट
तक गए और आइसक्रीम खाते हुए वापस कार में बैठ गए। एक पेड़ की आड़ लिए पार्क
का चौकीदार उन्हें टकटकी लगाए देख रहा था। थोड़ी देर बाद उन्होंने कार के
शीशे बंद कर लिए। कार के शीशे बंद होता देख चौकीदार कुछ यूँ मचला जैसे किसी
ए-ग्रेड फिल्म का गर्म सीन अचानक काट दिया गया हो। |
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