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| 06.16.2007 |
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डिवाइडर प्रमोद राय |
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लोग आ रहे थे। लोग जा रहे थे। कुछ खड़े होकर देख रहे थे। दिल्ली पुलिस मुख्यालय के ठीक सामने सड़क के बीचोबीच डिवाइडर से सटी एक औरत कराह रही थी। कप्ड़े मैले थे। शरीर भी गंदा था। आने वाले, जाने वाले और खड़े होकर देखने वाले अधिकतर लोगों की राय थी कि कोई पागल है, जिसे किसी गाड़ी ने टक्कर मार दी है। बिलखती औरत थोड़ी-थोड़ी देर पर अपना सिर उठाती और भीड़ की ओर देखती। मानो कह रही हो अरे कोई तो मुझे उठाओ, अस्पताल पहुँचाओं। लेकिन देखने वाले सिर्फ एक दूसरे का चेहरा देख रहे थे। एक ऑटो वाले ने उसके पास गाड़ी रोकी, लेकिन फिर आगे बढ़ गया। एक बाइक की भी स्पीड वहाँ धीमी हुई, फिर तेज हो गई। काफी समय बीत गया। लोग आते रहे, लोग जाते रहे और लोग देखते रहे। ..। अगले दिन अखबार में मैंने एक खबर पढ़ी। सड़क दुर्घटना में महिला मजदूर की मौत। यह हादसा तब हुआ, जब गणतंत्र दिवस के मद्देनजर सड़क के डिवाइडर को चूने से रंगने का काम कर रही महिला को एक तेजी से जा रही कार ने टक्कर मार दी। |
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