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01.16.2009
 
स्वस्थ और सुखी जीवन का प्रतीक पर्व :  दीपावली
महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश

साधारण अर्थों में दीपावली का अर्थ दीपों की पंक्तियाँ होता है। दीवाली शब्द दीपावली शब्द का ही अपभ्रंश रूप है। दीवाली भारत के प्रमुख राष्ट्रीय पर्वों में से एक है, जो अनादि काल से भारतीयों के द्वारा मनाया जाता रहा है। भारतीय काल निर्णय कैलेंडर के अनुसार यह प्रतिवर्ष कार्त्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। कार्त्तिक मास की अमावस्या वर्ष की बारह अमावस्याओं में अपेक्षाकृत सर्वाधिक अंधेरी होती है। इसके घने अंधकार के विषय में "मृच्छकटिक" के रचiयता संस्कृत के प्रसिद्ध कवि शूद्रक का यह श्लोक स्मरणीय है:

लिम्पतीव तमों --गानि, वर्षतीवांजनं नभ:।

असत्पुरुषसेवेव दृष्टिर्विफलतां गता।।

अर्थात्‌ "ऐसा विदित होता है कि अंधकार अंगों पर पुत सा गया है; गगन अंजन सा बरसा रहा है। दर्शन-शक्ति इस प्रकार निष्फल हो गई है, जिस प्रकार असज्जन व्यक्ति की सेवा निष्फल हो जाती है।"

इसी अंधकारमयी अमावस्या के आंगन में जगर-मगर दीप जल-जल कर शरद ऋतु का स्वागत करते हैं। दीपावली किस उपलक्ष्य में मनाई जाती है? इसके विषय में विभिन्न विचार धारायें हैं; जिनमें से कुछ का उल्लेख मैं अपने एक लेख में पूर्व ही कर चुका हूँ। यहाँ पर इतना कथन ही अभीष्ट है कि दीपावली भारत ही नहीं अपितु संसार के प्रमुख पर्वों में से एक है। विश्व के प्रत्येक धर्म एवं जाति के लोग इसे किसी न किसी रूप में अवश्य मनाते हैं। मैं इस लेख में दीपावली से सम्बन्धित एक विशेष दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहा हूँ। यदि कभी अवसर मिला तो अन्य समस्त दृष्टिकोणों को भी प्रस्तुत करने का प्रयास करूँगा।

यह सर्व विदित और सर्वमान्य तथ्य है कि दीपावली लक्ष्मी पूजन का पर्व है। लक्ष्मी ऐश्वर्य एवं समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। स्मरण रहे, लक्ष्मी केवल उसी व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र के पास रहती है. जो स्वस्थ और सशक्त होता है। जिस देश या समाज की जनता रोगी, अस्वस्थ और आलसी होती है, लक्ष्मी वहाँ कादापि नहीं ठहरती है। इसीलिए दीपावली का पंच प्रमुख दिवसीय पर्व धन्वन्तरि त्रयोदशी से आरंभ होता है। धन्वन्तरि त्रयोदशी से सम्बन्धित एक विचारधारा यह भी है कि इस दिन धन्वन्तरि वैद्य का आविर्भाव हुआ था। अत: धन्वन्तरि त्रयोदशी धन्वन्तरि वैद्य की स्मृति में मनाया जाता है। धन्वन्तरि देवताओं का प्रमुख वैद्य तथा आयुर्वेद का आदि-कर्त्ता माने जाते हैं।

इनके विषय में पौराणिक कथा प्रसिद्ध है कि जब देवताओं तथा असुरों ने मिलकर सागर का मन्थन किया तो चौदह रत्नों की शृंखला में सर्वान्त में धन्वन्तरि वैद्य अपने हाथों में अमृत-कलश लिए हुए प्रकट हुए। उस अमृत को बचाने के लिए भगवान विष्णु को मोहिनी रूप धारण करना पड़ा। उसी के कारण सूर्य तथा चन्द्रमा को आज तक ग्रहण का ताप झेलना पड़ता है।

इस अमृत का शब्द प्रयोजन पर विचार करना है। अमृत शब्द का अर्थ केवल सुधा या पीयूष ही नहीं प्रत्युत्‌ जल घी तथा स्वादिष्ट मिष्ट पदार्थ भी होता है। जल मानव के जीवन का सब से बड़ा मित्र है। अतएव उसे जीवन भी कहा जाता है। घी का समुचित प्रयोग भी मानव के स्वास्थ्य के लिए हितकारी होता है। सरिताओं का जल एवं गाय का घृत सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसीलिए दीपावली पर सरिताओं की पूजा दीप-दान से की जाती है। साथ ही धेनुओं और वृषभों आदि गृह पशुओं को भली प्रकार सजा कर पूज कर उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है। गोबरधन पूजा भी इसी तथ्य का समर्थन करती है।

धनतेरस के विषय में एक कथा प्रसिद्ध है, जो हमारी इस विचारधारा की संपुष्टि करती है। कहते हैं, एक दिन यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि जब-जब तुम मेरी आज्ञानुसार प्राणियों के प्राण हरण करने गये हो तब तुमको आज तक क्या कभी किसी पर दया आई? दूतों ने उत्तर दिया कि इन्द्रप्रस्थ का राजा हंस एक बार वन में मृगया के लिए गया। वहाँ वह अपने साथियों से बिछड़ कर हेम राजा के राज्य में जा पहुँचा। हेमराजा ने राजा हंस का उचित स्वागत-सत्कार किया। उसी समय हेमराज के यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ। परन्तु उसी समय भविष्यवाणी हुई कि हे राजन्‌! तुम्हारा यह पुत्र चार दिन के पश्चात्‌ सर्प-दंश से मर जायेगा। राजा हंस ने हेमराज के पुत्र को मृत्यु से बचाने के लिए यमुना की एक खोह में छिपा कर रखा। राजकुमार किसी प्रकार बड़ा हुआ। विवाह के योग्य होने पर उसका विवाह बड़े समारोह पूर्वक सम्पन्न हुआ। किन्तु विवाह के उपरान्त चौथे दिन हम लोगों ने उसका प्राण हरण कर लिया। हे स्वामी! मांगलिक समारोह में ऐसी घटना का घटित हो जाना अत्यन्त खेद जनक कार्य था, परन्तु आपकी आज्ञा के कारण हम विवश थे। अत: हे यमराज! कृपा कर के ऐसी विधि बताइये, जिससे प्राणी इस प्रकार की आकस्मिक मृत्यु से बच सके। कहते हैं, दूतों की यह प्रार्थना सुनकर यमराज ने विधि पूर्व धन तेरस के पूजन और दीपदान का महत्त्व बता कर कहा जो लोग धन त्रयोदशी के दिन मेरे लिए दीप-दान और व्रत करेंगे, उनकी कभी असामयिक मृत्यु नहीं होगी। धन तेरस और नर्क चतुर्दशी के दिन के व्रत-महात्म्य तथा विधि में यह भी उल्लिखित है कि व्यक्ति को उस दिन व्यायाम और प्राणायम सहित अभ्यंग स्नान करना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक मनुष्य को नित्य प्रात:काल व्यायाम, प्राणायाम करने के पश्चात्‌ शरीर पर तैल मर्दन कर कार्त्तिक स्नान करना चाहिये। साथ ही इसकी पूजन विधि में यह भी बताया गया है कि दीपावली के दिनों में प्रदोष के समय में मठ, मन्दिर, कूप, बावली, कोट, उद्यान, मार्ग, गोशाला, अश्वशाला तथा गजशाला आदि स्थानों में निरन्तर दीपक जलाकर रखना चाहिए। यदि सूर्य तुला राशि का हो तो एक जली लकड़ी या मशाल लेकर उसको ऊपर चारों और घुमाकर पितरों को भी मार्ग दिखाने का विधान है। यदि ध्यान से देखा जाए तो ये सारी बातें निरर्थक नहीं हैं। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि कार्त्तिक का कृष्ण पक्ष सर्वाधिक अंधेरा होता है और वर्षा ऋतु की समाप्ति के कारण सर्प आदि विषाक्त प्राणी स्वच्छ वायु ग्रहण करने अपने बिलों से बाहर आते हैं। अत: अंधकार में कोई भी दुर्घटना होने की अधिक आशंका रहती है। इसीलिए सर्व उपयोगी स्थानों पर दीपक जलाकर रखने का विधान है।

नर्क चतुर्दशी की कथा दीपावली के स्वास्थ्य संबन्धी दृष्टिकोण को और भी अधिक स्पष्ट करती है। विष्णु पुराण में नरकासुर वध की कथा का उल्लेख मिलता है। इस कथा में कहा गया है कि इन्द्र की प्रार्थना पर भगवान कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर की नगरी पर अपनी पत्नी सत्यभामा और साथी सैनिकों के साथ भयंकर आक्रमण किया। इस युद्ध में उन्होंने मुर, हयग्रीव और पंचजन आदि राक्षसों का संहार करके नरकासुर का वध किया। यह कथा सार-शून्य नहीं है। अपितु एक रूपक भी है। जिसका अर्थ इस प्रकार किया जा सकता है। नर्क के लक्षणों में कहा जाता है, जहाँ गंदगी हो; घृणित वस्तुयें हों; रुदन हो; हाहाकार हो; रोग हो उस सलि को नर्क कहते हैं। नर्क का मूल गंदगी; इसीलिए गंदगी को भी नर्क कहते हैं। इसके साथ ही जो व्यक्ति अपनी दुष्पवृत्तियों का दास होता है, जिसका स्वभाव व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र का अकल्याण करना ही होता है, असुर कहलाता है। जिसकी माता भूमि ही होती है। कृष्ण शब्द कृ धातु से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है: इच्छा पूर्वक कार्य करने वाला। अर्थात्‌ कर्मठ व्यक्ति ही कृष्ण कहलाता है। एक सच्चा कर्मठ व्यक्ति कभी अपनी इन्द्रियों का दास नहीं हो सकता। समाज का कल्याण करना उसका प्रमुख ध्येय होता है। इसलिए ऐसा व्यक्ति ही कृष्ण कहलाता है। सत्यभामा का अर्थ है: सच्ची स्त्री, जो सच्चे अर्थों में स्त्री होती है। स्त्री दया, ममता, करुणा, वात्सल्य और प्रेम की प्रतिमूर्त्ति होती है। वह समाज का अमंगल होते नहीं देख सकती। वह अपने घर, गाँव, नगर तथा राष्ट्र को स्वच्छ और उन्नतिशील देखना चाहती है। मुर, हयग्रीव और पंचजन आदि विभिन्न आकृतियों वाले मल कीटों को कहा जा सकता है। मुर वे कीट होते हैं जो मुड़-मुड़ कर चलते हैं। हयग्रीव का अर्थ है, वे कीट जो ऊपर को सर उठाकर चलते हैं अथवा जिनकी आकृति अश्व की ग्रीवा की भांति हो। पंचजन भी पंच मुख या पांच अंग विशेष वाले कीटों को कहा जा सकता है। इन प्रतीकों को निम्नलिखित विवरणों से सम्बन्धित किया जा सकता है। लगता है। आवासों में छतें टपकने लगती हैं। खोलों में मकड़ी जाले पूरती है। भांति-भांति के विषैले कीड़े, दीमक, साँप, गिजाई, मच्छर तथा वृश्चिक आदि जीव स्वयं उत्पन्न हो जाते हैं; जिनसे मनुष्यों को किसी समय भी हानि पहुँच सकती है। चारों ओर गंदगी ही गंदगी एकत्रित हो जाती है। विविध प्रकार के रोग मलेरिया, टायफ़ॉयड, डेंगू आदि मनुष्य पर आक्रमण करते हैं। जीवन नर्क बन जाता है। विजयादशमी से वर्षा समाप्ति पर आने लगती है और दीपावली तक बिल्कुल समाप्त हो जाती है। वातावरण स्वच्छ और निर्मल हो जाता है। घर घर सफाई की जाती है। भारत में भवन श्वेत चूने से पोते जाते हैं और उन पर नए-नए रंग चढ़ाए जाते हैं। इस नर्क को दूर करने का काम न अकेले पुरुष ही कर सकता है और न नारी। इसलिए इन्द्र (मन) की प्रेरणा से कृष्ण (कर्मठ पुरुष) सत्यभामा (गृहवधु) की सहायता से नरकासुर  (गंदगी) का विनाश करता है। भूमि उन्हें विभिन्न प्रकार के बहुमूल्य रत्न - अन्न आदि प्रदान करती है। इस प्रकार सोलह सहस्त्र नारियाँ (मनुष्य की शरीरगत नाड़ियाँ रोगादि से मुक्त होकर) स्वतंत्र होकर सुखी जीवन व्यतीत करती हैं।

कहा जाता है कि कार्त्तिक मास की कृष्ण चतुर्दशी को सूर्योदय से पूर्व ही स्नान करना चाहिए। जो व्यक्ति इस दिन अरुणोदय के पश्चात्‌ स्नान करता है, उसके वर्ष भर के शुभ कायका विनाश हो जाता है। इस भय भरी उक्ति का प्रयोजन केवल यह है कि सूर्योदय के पश्चात्‌ सोने वाले लोग सदा रोगी, दुखी और आलस्य ग्रस्त रहते हैं। चतुर्दशी तक हरेक घर भली भांति साफ सुथरा हो जाना चाहिए। क्योंकि, जहाँ सफाई होती है, वहाँ आरोग्य होता है। कहावत है कि लक्ष्मी साफ-सुथरे घर में निवास करती है। तभी रात्रि में यम दीप जलाने की परंपरा है। वैसे त्रयोदशी और चतुर्दशी दोनों दिन ही दीप जलाना चाहिये। त्रयोदशी के दिन धन्वन्तरि और जल देवता के लिए दीप जलाकर सरिता में प्रवाहित करना चाहिए। चतुर्दशी को यमराज के लिए तथा त्रेता युग में श्री रामचन्द्र जी के अयोध्या लौटने पर रामानुज भरत जी द्वारा आरंभ की गई परंपरा का निर्वहण करने के लिए एक दीप जलाना चाहिए।

भारतीय षड्‌ ऋतुओं में तीन ऋतुयें प्रधान मानी जाती हैं; जाड़ा, गरमी तथा बरसात। दीपावली जैसे महत्वपूर्ण पर्व का आगमन वर्षा ऋतु के पूर्णतया समाप्त होने पर ही होता है। वर्षा ऋतु में कहीं बाढ़ आती है, कहीं कोई भवन धराशायी होता है तथा यत्र-तत्र गढ़ों में जल एकत्र होकर सड़ने

सुगंधित द्रव्यों की मालिश करके स्नान करना, मिट्टी के दीपक विभिन्न क्रमों में सजाना और संबन्धियों के साथ स्वादिष्ट भोजन करना तथा मनोरंजन दीपावली के प्रमुख कार्यक्रमों में माने जाते हैं। दीपावली पर दीपक ही क्यों जलाये जाते हैं? इसमें भी एक रहस्य है। अग्नि का गुण है कि वह वस्तु की अपवित्रता को समाप्त कर देती है। गन्दगी रूपी नरकासुरों को मार कर गृहों को पवित्र और सुरक्षित करने के लिए अग्नि की अत्यन्त उपयोगी और आवश्यक होती है। अंधेरी रात में दीपक से अधिक उत्तम अग्नि कोई नहीं दे सकता। दीपकों की अग्नि गृहों की अपावनता को तो दूर करती है है, साथ ही अन्य अवशिष्ट विषैले जीव-जन्तुओं ग्रहों, ग्राम और नगरों तक आने से रोकती है। दीपावली का पर्व स्वस्थ, सुखी और समृद्ध जीवन का प्रतीक है। आज के दिन हमार कर्त्तव्य है कि हम केवल अपने-अपने घरों, नगरों तथा शरीरों को ही निर्मल आलोक प्रदान न करें अपितु अपने मन के अंधेरों को भी नष्ट करके विश्व प्रेम, एकता, सौहाद्र|, सहानुभूति, सम्मान तथा भ्रातृभाव के उज्ज्वल दीपों को जलाकर स्वयं को तया संसार को स्वस्य, सुख और समृद्धिशील बनायें। इस महान पर्व पर समस्त ज्योति प्रेमियों को जीवन-ज्योति परिवार की ओर से हार्दिक बधाई।

इस लेख का अंग्रेज़ी रूपान्तर ट्रिनिडाड एक्सप्रेस नामक राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र में 1968 दो लेकर आज तक प्रत्येक वर्ष प्रकाशित होता रहा है। इसे विश्वजाल पर अंग्रेज़ी में केवल दीवाली खोज करने पर पढ़ा जा सकता है।



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