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| 03.27.2012 |
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"शताब्दी
के स्वर" महाकवि प्रो. हरि शंकर आदेश की एक कालजयी कृति: |
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विश्व के
हर देश की अपनी गौरवमयी विशिष्ट पहचान होती है और उस माटी में जन्म
लेने वाला हर व्यक्ति साधारण या विशिष्ट उसकी सोंध से प्रभावित होता
है। उसकी यह पहचान राष्ट्रीयता,
धर्म,
संस्कृति,
सभ्यता एवं देश के गौरवशाली इतिहास से प्राप्त होती है। साहित्यकार
साधारण व्यक्ति से कुछ पृथक ही होता है। समाज के बीच रहता हुआ
साहित्यकार अपने चारों ओर के वातावरण को साधारण मानव की भांति ही देखता
है,
उसमें रहता है परन्तु उसके अन्तरमन का साहित्यकार घटनाओं,
दुर्घटनाओं की संवेदनशीलता से उद्वेलित हुए बिना नहीं रहता और यही
उद्वेलन कब अपने मन के किवाड़ों को खोल लेखनी के माध्यम से नि:सृत होने
लगे,
कोई नहीं जान पाता। और,
यही वह विलक्षणता है,
जिससे वह साधारण मानव से अलग दिखाई देता है।
महाकवि
प्रो. हरि शंकर आदेश के "शताब्दी के स्वर" पढ़ने का सौभाग्य मुझे डा.
महेश दिवाकर के सौजन्य से प्राप्त हुआ। इतनी सुन्दर काव्य कृति के
रचयिता प्रो. आदेश साहित्य की विभिन्न विधाओं में निष्णात हैं। उनकी
लेखनी निर्बाध गति से काव्य लेखन,
निबन्ध,
कहानी,
संस्मरण के क्षेत्र में चली है और विश्व में अपनी पहचान
बनाई है। उनकी नवीनतम काव्य कृति "शताब्दी के स्वर"
उनके अपने मन में समय-समय पर भोगे हुए पलों की अभिव्यक्ति है।
रचनाकार
ने अपने अन्तर्मन के अनुभूत भावोद्गारों को नाना विधि से रूपायित किया
है। कवि की अनुभूतियों का फलक विराट है,
जिसमें "माँ सरस्वती महान" की वन्दना करते हुए देश - प्रेम,
प्रकृति साहचर्य की उत्कंठा एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का
मार्मिक वर्णन किया है। कवि की आत्मा "नव वर्ष की मंगलबेला" में केवल
यही मंगल कामना" करती है कि-
"प्रीति-प्रतीति-प्रदीप
प्रज्वलित कर पावन प्रान्तर में उर के,
सकल
निषेधात्मक भावों का, हर
अंतर से ही तम हर के,
नव
आशा-आलोक दान कर,
जीवन-जग ज्योतिर्मय कर दे।।" पृष्ठ
3
जो कि
स्पष्ट रूप से उसके अन्दर विद्यमान भारतीय संस्कृति के दर्शन कराती है।
यजुर्वेद
30।
3
में भी कुछ इसी प्रकार के भाव व्यक्त हुए हैं,
"यद्
भद्रं तन्न आसुव" अर्थात् जो कुछ मंगलमय हो,
वह हमारे (प्राणी मात्र) के लिए लाओ।
महाकवि
प्रो. आदेश का शरीर तो निश्चित रूप से साढ़े तीन दशकों से प्रवासी
भारतीय का ठप्पा लगाए हुए है पर मन आज भी अपने देश में छोड़ी हुई अतीत
की परछाइयों को चिह्नित करता रहता है। यथा -
"चलचित्रों
सी चलतीं सुधियाँ,
आतीं याद मिलन की बातें,
कर देता
उदास उजला दिन,
दंशन करें चाँदनी रातें।।" पृष्ठ
11 या
"यौवन
की आकांक्षाओं का,
भर नि:श्वांस हवन करती है।
सावन-भादों
जले ज्येष्ठ सी,
ज्योष्ठ मास घन सी झरती है।" पृष्ठ
11
"ललित
स्वप्न" शीर्षक में अयत्नसाध्यता है। मन की बात को त्यन्त सरल
स्वाभाविक ढंग से बिना शब्दाडम्बर से आच्छादित किए व्यक्त किया है। इस
शीर्षक में कवि के अनिर्वचनीय और दुर्ददमनीय पीड़ा की अनुभूतियाँ
दृष्टिगत होती हैं,
साथ ही अध्यात्म परिक्षित करती कुछ पंक्तियाँ भी िखाई पड़ीं,
जिसमें जगत में पाप-पुण्य जीना-मरना कैसे अंगीकार किया जो,
व्यक्त किया है। कवि के शब्दों में :
"जीने
की इच्छा पाप नही,
है पाप बिना इच्छा जीना।
अन्यायों
का अपमानों का विष सक्षम होकर भी पीना।"
कवि की
मान्यता है कि पाप-पुण्य समय चक्र एवं परिस्थिति-जन्य अनुभूति मात्र
है।
"क्या
पाप और क्या पुण्य,
सभी हठधरमी मात्र समय की है।
हम तो
केवल निमित्त जग में, सब
करनी काल अदय की है।।"
साथ
ही कहीं-कहीं जगत की आपाधापी से कवि में कुछ निराशा भी व्याप्त हुई
है।यथा:
"कुछ
कहना-सुनना व्यर्थ आज,
जो समय कहे करते जाओ।
अपनी
इच्छाओं की समाधि,
अपने हाथों गढ़ते जाओ।।"
महाकवि
प्रो. आदेश के गीतो में अध्यात्म की झलक स्पष्ट उभर कर आई है। "जीवन
नाटक" शीर्षक यूँ तो स्वयं ही अपने में जीवन का सारगम्य दर्शन समेटे
हुए है परन्तु कवि को तो चराचर में एक ही विराट प्रमुख के दर्शन होते
हैं,
जिसको किसी नाम से पुकारो सूत्रधार एक ही है।
"कथा
वही,
संवाद वही बस पात्र बदल जाते हैं,
जिसके
जैसे कर्म,
भूमिका वैसी वे पाते हैं।
कुछ चढ़ते
ही जाते हैं,
कुछ नीचे गिर जाते हैं,
स्वर्ग-नर्क की इस दलदल से,
उतरे पार न कोई।।
जीवन का
यह अद्भुत नाटक,
जिसका पार न कोई।
मैं तो
केवल रंगमंच हूँ सूत्रधार है कोई।।"
कवि के
लिए "सर्वखल्विदं ब्रह्म" है। और इसीलिए उसका कोई गीत बिना उस सत्ता के
नाम के नहीं है। "ऐसा कोई गीत न मेरा
,
जिसमें तेरा नाम न आए।"
ईश्वर के
प्रति कवि आस्थावान है और यही आस्था एवं समर्पण की भावना हृदय में रख
वह कह उठता है:
"कण
कण दर्पण बन जाता है,
तेरा बिम्ब ललाम दिखो"।
कवि एक
सामाजिक प्राणी है। समाज की उठा-पटक से वह विरत नहीं रह सकता। आज का
विश्व जिन हीन स्वार्थपरक मानसिकता से ग्रसित होता जा रहा है,
वह कवि के लिए पीड़ा -जनक है। वह कह उठता है:
"जातिवाद
ने,
प्रांतवाद ने,
भाषा ने बांटा है।
वण-भेद
के विषधर ने मानव मन को काटा है।।"
परन्तु
यह निराशा कवि में स्थायी नहीं है। वह आत्म-विश्वास से ओत:प्रोत है।
तभी तो कवि के शब्दों में :
"मैं
जैसा भी हूँ अच्छा हूँ,
सुख-वैभव अपने पास रखो।
मुझको न
स्वर्ग की अभिलाषा, जग
वालों ! अपने पास रखो।।"
एक स्थल
पर कवि कहता है:
"कहने
को हूँ बिन्दु,
सिन्धु बन,
पल में लहराता हूँ
,
मेरी
भक्ति-शक्ति का समझा पर विस्तार न कोई।।"
कवि में
भारतीयता कूट-कूट र भरी है। अपने अपनो के प्रति वह तन-मन से सदेव
समर्पित प्रतीत होता है। और अपने इन भावों का प्राकट्य भी अपनी विभन्न
रचनाओं में किया है। देखिए "मेरी भाग्य विधात्री" की यह पंक्तियाँ :
"मेरी
श्वांस-श्वांस पर प्रेयसि! है केवल तेरा अधिकार।
तुझ तक
ही तो सीमित है प्रिय ! मेरे जीवन का संसार।।"
यही नहीं
परिवार के अन्य आत्मीय स्वजनो के प्रति भी उसके हृदय में आत्मीयता की
झलक है। यथा : पुत्र के लिए :
"जन्म
हुआ हो गए स्वजन सब ही अशोक,
सफल हुआ
प्यार का पुनीत भाव लोक।।"
कला की
दृष्टि से कवि की भाषा साहित्यिक है। वह स्वयं ही प्राक्कथन में लिखते
हैं - आज के विद्वानों को,
साहित्य-सर्जन में,
विशेषकर काव्य कृतियों में तत्सम शब्दों का प्रचुर प्रयोग करना चाहिए,
जिससे हिन्दी भाषा का ज्ञान साधारण जन को भी हो सकेगा"। कविता
को सड़कछाप श्रोता के लिए बनाना,
उनका लक्ष्य नहीं है। परन्तु साथ ही साथ आवश्यकतानुसार महाकवि
प्रो. आदेश ने अन्य भाषाओं के शब्दों के प्रयोग में कोई हिचक नहीं
दिखाई है।
महाकवि
अपनी सहज प्रांजल भाषा से अपनी अनुभूति प्रकट करने में पूर्णतया सफल
रहे हैं। इस प्रकार कवि के इस गीत संग्रह में भाषा,
भाव,
शिल्प,
अनुभव,
तत्त्वदर्शन,
सूक्ष्म निरीक्षण एवं अभिव्यंजना की मंदाकिनी साथ-साथ प्रवाहित
होती प्रतीत होती है। इस कालजयी पठनीय एवं संग्रहणीय साहिiत्यक
कृति के लिए महाकवि प्रो. हरि शंकर आदेश के लिए शतश: साधुवाद। |
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