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| 10.27.2007 |
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प्रवासी महाकवि आदेश कृत - प्रथम भारतेतर महाकाव्य अनुराग के विषय में
हाई कमीशन ऑफ
इंडिया,
पोर्ट
ऑफ स्पेन,
ट्रिनिडाड |
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पिछले
वर्ष श्री हरि शंकर आदेश ने जब मुझे अनुराग पर कुछ लिखने के लिए कहा,
तब
मैं चुप्पी लगा गया। कारण,
एक तो
में समीक्षक नहीं हूँ और दूसरे प्रबन्ध काव्य जैसी बड़ी कृति को पढ़ने
का धीरज मुझमें अब नहीं है। करीब आठ दस साल पहले मैंने बहुत प्रयत्न
करके श्री सुमित्रानन्दन पंत का "लोकायतन" पढ़ा था और उसके बाद एक
प्रकार से फैसला ही कर लिया था कि महाकाव्य पढ़ना कठिन काम है,
जो
मेरे बस की बात नहीं है। बहरहाल,
ट्रिनिडाड में आकर आदेश जी के अनुरोध का अनुपालन न करना गलत होता। सो
मैंने अनुराग महाकाव्य को पढ़ना शुरू किया। मैं यह स्वीकार करना चाहता
हूँ,
कि
अगर मैंने इसे न पढ़ा होता तो एक बड़े आनन्द से वंचित रह जाता।
इस
प्रकार काव्य को पढ़ना शुरू किया। कुछ ही पंक्तियों के बाद लगने लगा कि
यह तो वीणा पर सधी
êगलियों
से कोई सुन्दर तान बजा रहा है और मैं काव्य में बहने लगा -निरायास।
पूर्व खण्ड में हर छंद में एक बिम्ब बनता जाता है,
जिससे
रसानुभूति पुष्ट होती जाती है। कुछ ऐसे ही बिम्ब हैं -
पण…
पर
गिर गिर कर बूंदें,
तुरत
फिसलतीं ऐसे।
शठ मन
घट पर उपदेशों की,
सुधा
ढुलकती जैसे।।
***
चपल
चंचला चमक रही है,
ऐसे
नील गगन में।
अस्थिर प्यार प्रज्योतित होता,
ज्यूँ
कुलटा के मन में।।
***
झुक-झुक पड़ते तरुवर ऐसे,
फल-फूलों से लदकर।
नित्य
नम्र होकर चलते है,
जग
में ज्यूँ विद्वद्वर।।
पादप-वृन्तों पर खिल उठते,
पुहुप
प्रफुल्लित होकर।
खिल
उठता है संत -हृदय,
ज्यूँ
शील -सौम्य से भरकर।।
इस
प्रकार मैं इस रचना को एक बार नहीं
,
कई
बार पढ़ गया हूँ,।
रचना में धीरे-धीरे शृंगार रस का उद्रेक होता है। इस काव्य का प्रधान
रस ही शृंगार है। परन्तु पर्यवसान तक आते - आते इसमें संसार की असारता
तथा जीवन का नैतिक पक्ष मुखर हो उठता है -
नरक
यहीं है,
स्वर्ग यहीं है,
केवल
मन की माया।
सत
कर्मों का
भोग
सदा ही,
जग
में स्वर्ग कहाया।।
महाभारत के प्रसंगों को लेकर हिन्दी में अनेक साहित्यिक कृतियों का
सृजन होता रहा है। शान्तनु और गंगा,
और
उसके बाद शान्तनु और सत्यवती की कथा से लोग परिचित ही हैं। शान्तनु क
अनुरागी मन ने
,
जाहिर
है,
आदेश
जी को बहुत प्रभावित किया हो। वास्तव में शान्तनु बड़े अनुरागी थे।
उनके जीवन में दोनों स्त्री पात्र अद्भुत हैं। काव्य रचना में शान्तनु
के हृदय की विकलता -आतुरता तथा प्रणय में मनुष्य की अधीरता का सजीव
चित्रण है। जो पात्र और प्रसंग हैं,
उनमें
शृंगार का सहज उद्रेक और परिपाक है। सबसे अच्छी बात है कि पढ़ने में कोई
प्रयास करने की जरूरत नहीं पड़ती।
आदेश
जी में कई गुणों का समन्वय है। वह संगीतज्ञ हैं,
कवि
हैं,
सहृदय
हैं,
और
गायक भी हैं। छन्द,
स्वर,
लय,
ताल
के महत्त्व को उनसे अच्छा कौन जानेगा?
इसलिए,
जैसे
जैसे आवश्यकता पड़ी वैसे वैसे वह छन्दों को बदलते गए हैं। इससे प्रबन्ध
काव्य की बोझिलता एक दम नहीं रही है।
आदेश
जी कई वर्षों से भारतीय संस्कृति का काम कर रहे हैं। उन्होंने अपनी
निजी साधना भी कायम रखी है। "अनुराग" इसका प्रमाण है। मैं आशा करता हूँ
हिन्दी काव्य प्रेमी और सुधीजन इस काव्य-रचना का समादर करेंगे।
टिप्पणी -यह लेख अनुराग महाकाव्य के विमोचन के ऐतिहासिक अवसर पर लिखा
गया था और श्री गिरीश पाण्डेय जी के निर्देश पर कुमारी सुरभि द्वारा
पढ़ा गया। यह विमोचन 28 अगस्त 1985 ई0 को श्री आदेश -आश्रम दीर्घा
ट्रिनिडाड में हुआ था। इसमें अनुराग के भूमिका लेखक विश्वयात्री डा.
कामता कमलेश भी उपस्थित थे। उन्होंने अनुराग की सराहनीय समीक्षा
प्रस्तुत की थी। |
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