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01.16.2009
 
समय ही नहीं है
महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश

समय ही नहीं है, रुकूँ मुड़के देखूँ,
कहाँ? कौन? कब छुट गया आज पीछे?

कहाँ पर हुआ पंथ में पुष्प-वर्षण,
किया कण्टकों ने कहाँ रक्त-तर्पण।
कहाँ? कब हुआ खण्ड दर्पण हृदय का?
कहाँ? कब?किया किस दिशा ने समर्पण?

पता ही नहीं व्योम की मंत्रणाएँ,
मही ने रचे कितने षडयंत्र नीचे?

पता ही नहीं? कब? कहाँ आए मधुवन?
कहाँ पार करने पड़े मरु विजन वन?
कहाँ पर निशा ने दिया दान तम का,
कहाँ पर उषा ने किया पथ-प्रदर्शन?

कुटिल काल के संग नियति-बीथियों पर,
चला जा रहा हूँ सतत्‌ आँख मींचे।।

कहाँ कितना खोया? कहाँ कितना पाया?
मिला मुझको जो कुछ, विहँस उर लगाया।
न परिवाद कोई, न स्तुति गान कोई,
बिना भेद के प्रेम जग पर लुटाया।

न होने दिया रंच तन-मन प्रमादी,
सदा स्वेद-शोणित से श्रम-स्वप्न सींचे।।

न सुख हैं हँसाते, न दुख हैं रुलाते,
न उपलब्धियों-हानि के भाव भाते।
न आलोचनायें करें चित्त विचलित,
प्रशंसा-पुरस्कार कुछ कर न पाते।

न आता है रुकना मुझे पंथ में अब
भले आग कितनी सकल जग उलीचे।।

नहीं ज्ञात है मैं कहाँ से हूँ आया,
न गन्तव्य स्थल की मुझे ज्ञात माया।
हुआ चेत जब से, मुझे बोध इतना,
स्वयं को सदा पथ में चलता ही पाया।

चला, चल रहा और चलता रहूँगा,
भले भाग्य कितना ही पीछे को खींचे।।

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