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| 01.16.2009 |
| फागुन आया रे!! महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश (साभार - ’शकुन्तला’ महाकाव्य, प्रमोद सर्ग) |
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रंग-बिरंगी लिये उमंगें फागुन आया रे!
फागुन आया रे!! राग-रंग की लिये तरंगें, फागुन आया रे! फागुन आया रे!! बेदर्दी सर्दी का मौसम बीत चला है। गोरी के अधरों पर मादक गीत ढला है। इतराता, बल खाता मलय समीरण आया रे! फागुन आया रे!! चले बसन्ती बयार, मन में प्यार पले रे! नयनों को मृदु सपनों का संसार छले रे! मधुर मिलन के भावों में नवयौवन आया रे! फागुन आया रे!! विरही के तन-मन में विरह अंगार जले रे! हर मन पर ही मदन वीर का वार चले रे! कण-कण पर है आज राग का शासन छाया रे! फागुन आया रे!! उड़ते हैं बादल गुलाल के, होली आई। लिये अबीर रंग घर-घर में धूम मचाई। नया हर्ष लेकर मौसम मन-भावन आया रे! फागुन आया रे!! लगी बदलने प्रकृति बसन, फिर रंग-बिरंगे। जाग उठीं प्रिय! पुन: हृदय में नई उमंगें। हरेक दिशा में आज नया ही जीवन आया रे! फागुन आया रे!! जो हो ली हो ली होली खेलें सुधि खोकर। कामदेव की जय बोलें रोमाँचित होकर। संवत्सर आने-जाने का प्रिय! क्षण आया रे!! फागुन आया रे!!फागुन आया रे!! |
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