नए वर्ष का नया सवेरा,
नष्ट करे घनघोर अँधेरा,
मनव के मन का।
घृणा-द्वेष मिट जाए सारा,
आलोकित हो प्रांगण प्यारा
मानव-जीवन का।
1
क्षमा-दान की लेकर क्षमता,
जीवन में आए समरसता।
हर उर में सौहार्द्र व्याप्त हो,
हर दृग से हो प्रेम बरसता।
खिलखिलाए हर पुष्प सुवासित,
निर्विकार निर्दोष अयाचित्
आशा-उपवन का।।
2
दृष्टि-दोष का हो निराकरण,
जन-जन का ही हो सदाचरण।
संशय की हो मूल जर्जरा,
उठ जाए मति से भ्रमावरण।
किसी भाँति का भय न शेष हो,
पल-पल ही सुखकर अक्लेश हो,
मान हो सज्जन का।।
3
कटु आतंकवाद का क्षय हो,
सत्य-न्याय की सदैव जय हो।
धरणी के आँचल में उपजा,
हर प्राणी ही मित्र, अभय हो।
आत्म-भाव सर्वात्म भाव हो,
कहीं न कोई भी अभाव हो,
अन्न और धन का।।
4
पुरुष करे उत्पन्न न बाधा,
नारी नहीं तजे मर्यादा।
शैशव, जरा तथा यौवन में,
सम्यक् प्यार हो सीधा-सादा।
चढ़ कर प्रेम-प्रगति की सीढ़ी,
मान करे पीढ़ी का पीढ़ी,
स्वजन औ परिजन का।।
5
अनजाने ही भूल हुई हो,
भ्रम-भँवर-ग्रसित कूल हुई हो।
सहज उक्ति वक्रोक्ति बनी हो,
भ्रान्तिमान बन शूल हुई हो।
त्रुटि करना है मनुज-सुलभ ही,
कर देना प्रिय क्षमा सहज ही,
दोष प्रिय स्वजन का।।
6
हर अपूर्ण साधना पूर्ण हो।
हर अतृप्त कामना पूर्ण हो।
प्रभु से विनय, सदैव तुम्हारा,
हर पग सद्भावना पूर्ण हो।
लक्ष्य सिद्धि हो, जग-प्रसिद्धि हो,
प्राप्त तुम्हें हर ऋद्धि-सिद्धि हो,
सुख हो त्रिभुवन का।।
7
पल-पल हो नव हर्ष तुम्हें प्रिय!
मिले सदा उत्कर्ष तुम्हें प्रिय!
कहता मेरा हृदय उमड़ कर,
शुभ हो नूतन वर्ष तुम्हें प्रिय!
हो हर निमिष सदा सुखदायी,
तुम पर कृपा करे विषपायी,
स्वामी त्रिभुवन का।।