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01.16.2009
 
 नवल वर्ष की मंगल कामनाएँ
महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश

बीता पिछला वर्ष, आ गया नूतन वर्ष सुहाना।
जिसको जाना है, जाता है, चले न एक बहाना।।

काल एक गति की संज्ञा है, पल भर नहीं ठहरता।
संसृति बनती है, मिटती है, यह अप्रभावित रहता।।

काल अनादि-अनन्त सृष्टि में, काल नाम परमेश्वर।
प्राकृतिक उपकरणों का भी स्वामी है कालेश्वर।।

पल-पल परिवर्तित होता है, रूप प्रकृति का पावन।
जो इस क्षन, होगा न दूसरे क्षण, है सत्य सनातन।।

सीखो बंधु! समय से "चरैवैति" का मंत्र अनोखा।
निज संकीर्ण हृदय-मेधा का, खोलो अपल झरोखा।।

जो करना तुरन्त कर डालो, कल पर कभी न छोड़ो।
अपने कर्त्तव्यों से जग में कभी नहीं मुख मोड़ो।।

भूलो मत निर्मूल कल्पनाओं या मृदु सपनों में।
मत भटको आकाँक्षाओं के वीहड़ विजन वनों में।।

कार्य करो ऐसे जिनको न छुपाना पड़े जगत से।
विक्रय करो न आत्म-प्रतिष्ठा कदापि स्वर्ण-रजत से।।

छोड़ चले पद-चिन्ह जिन्हें कोई भी मिटा न पाए।
आगामी पीढ़ियाँ देख जिनको अपना पथ पाएँ।।

एक-एक क्षण अति अमूल्य है, इसे न व्यर्थ गँवाओ।
भोग-विलासों की दलदल में, मन-गज नहीं फँसाओ।।

करो आत्म-दर्शन विवेक से, सत्य-असत्‌ को समझो।
नाiस्तकता-पाखण्ड-कुचक्रों में कदापि मत उलझो।।

रखो स्वच्छ तन-मन-निकेत, धरणी को कर दो निर्मल।
जब लौटना पड़े तो मिले स्वच्छ जगती का हर स्थल।।

हो आंतक न किसी भाँति का, सब में हो समरसता।
किसी हृदय पर शासन कर न सके कादापि नीरसता।।

विस्मृत कर गत विषाद, नवल हर्ष भर मोद मनाओ।
नए वर्ष का स्वागत करो, मुदित मन नाचो-गाओ।।

ईश्वर से प्रार्थना, कष्ट हों दूर मिटें चिन्ताएँ।
मिले सभी को अभीष्ट बहें उरों में सुख-सरिताएँ।।

नए वर्ष में पग-पग पर ही हो साफल्य, उत्कर्ष हो।
है मंगल कामना, सभी को सुख-प्रद नवल वर्ष हो।।

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