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| 01.16.2009 |
| मयन जाग जाए महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश (साभार- शरद: शतम्) |
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मरुत यूँ न चल तू महक मन-अजिर में,
कहीं फिर न सोया मयन जाग जाए।। न भर लें तुझे पाश में प्राण मेरे, उठा दें न घूँघट कहीं कामनाएँ। मचलकर कहीं साध कर लें न पूरी, दृगों से तृषित मधु-मिलन-साधनाएँ। न भरकर कहीं छवि तुम्हारी अचंचल, विकल हो अपल युग-नयन जाग जाएँ।। न हों शेष पल में कहीं नीति-बन्धन, न जागे कहीं मुक्ति-अभिलाष मन में। न टूटें कहीं आज संयम-शिलाएँ, न हो प्रज्वलित पुनि मदन-ज्वाल तन में। सिसकता रहा जो सदा देख तुझको, न वह कामना का अयन जाग जाए।। मरुत यूँ न चल तू महक मन-अजिर में, कहीं फिर न सोया मयन जाग जाए।। |
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