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| 01.16.2009 |
| वर्ष तो गया महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश |
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वर्ष तो गया सकल विषाद ले,
किन्तु विश्व की व्यथा न जा सकी। उदित हुआ अरुण नव प्रभात ले, पर प्रमाद की निशा न जा सकी।। त्रस्त है निसर्ग का प्रत्येक कण, मनुष्य है मनुष्य से डरा हुआ। त्रस्त वर्तमान वर्तमान से, भविष्य से भविष्य है डरा हुआ।। विश्व में अशान्ति धूम्र उठ रहा, शान्ति का प्रगीत है मरा हुआ। धर्म-ज्योति मन्द हो चली, गहन अधर्म-अन्धकार है भरा हुआ।। आज अणु हुआ अधिक महत्वमय, पद दलित हुआ सुशीर्ष व्योम का। ज्योति-वर्ग का घटा महत्व, और बढ़ रहा दुराज्य तिमिर तोम का।। नाश की प्रवृत्ति जहाँ मुख्य है, सत्य-ओट में छिपा असत्य है। जहाँ अधम अशक्तियाँ अभीष्ट हों, अनन्त अनाचार का महत्व है।। जहाँ महान सृष्टि के महासृजक, अनादि ब्रह्म का प्रताप क्षीण है। जहाँ न राजनीति धर्म-आश्रित, प्रपंच-पूर्तिकार ही प्रवीण है।। शक्ति का चरम विकास ही जहाँ, एकमात्र शान्ति का सुगीत है। स्वार्थ, छल, प्रपंच वासनादि ही, मनुष्यत्व की महान जीत है।। फिर कहो कि किस प्रकार शान्ति हो, क्यों न सर्व सृष्टि में अशान्ति हो। योग्यता-अयोग्यता समान जब, क्यों न फिर उदित नवीन क्रान्ति हो। स्वार्थ-शून्य-वृत्ति, त्याग-कामना, विश्व-बन्धु भाव-भरी भावना। आत्मवत्र समस्त जीव प्रेम से, शक्य शान्ति की समर्थ साधना।। परन्तु जुट सके अभी न उपकरण, न रुक सका इसलिए मनुज मरण। समस्त लोक कर रहा प्रयास है, परन्तु रुक रहे न युद्ध के चरण।। इसीलिए प्रशान्ति-रागिनी मधुर, काँपती वसुन्धरा न गा सकी। और विश्व की व्यथा न जा सकी।। |
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