आज समय की वर्ष गाँठ है,
युग की उम्र बढ़ गई,
एक वर्ष संयुक्त हो गया उसमें।
एक पृष्ठ जुड़ गया,
समय के वृहद ग्रन्थ में।
पुत्र! उठो तुम,
नव प्रभात की पावन बेला,
सुना रही है नवल प्रभाती।
नये वर्ष ने शासन आज संभाला जग का,
विगत वर्ष की भांति,
’कैलेंडर’ की भी मृत्यु हो गई मानो।
’कैलेंडर’ जो साथ निभाता सदा वर्ष का,
वर्ष जो कि जीवन-साथी है
प्रियतम जैसा,
जिसके बारह मासों का
है भार वहन करता,
जो अपनी भीनी कृश काया पर
क्षीण गात पर।
दीवारों ने भी त्याग दिया
संग जिसका,
फेर लिया है मुख
अस्पृह भावों से भरकर।
वह दीवार कि
जिसकी माँग भरी उसने सिंदूरी तन से,
निज रंगीन छविल छाया से।
यह जग है,
इसमें ऐसा ही होता है नित।
यहाँ किसी से प्रीति
मित्रता,
अब तो बस अपराध गहन बनती जाती है।
उठो वत्स!
भूली भटकी धरती को फिर से,
स्वच्छ प्यार की राह दिखाओ।
किन्तु,
स्वयम की छाया से भी,
सावधान हो चलना जग में।
अवसर मिलने पर दंशन कर
लेती है, अपनी ही छाया,
अपनी माया।
साथ छोड़ देती है
अवसर पाकर पुत्र।
यहाँ अपनी ही तो प्रिय काया।
सिर्फ आत्म विश्वास लिये,
बढ़ चलो,
ज़िन्दगी की अनजानी वक्र डगर में।
एक निमिष भी व्यर्थ न खोना,
रोगी,
दुखी,
दीन,
चिंताकुल जीवों को दे नये प्राण, सद्मार्ग
प्रदर्शित कर,
युग को नव दिशा बताना,
इस धरती को स्वर्ग बनाना।।