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01.16.2009
 
जलजात
महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश

"गुरदेव! युवराज ज्ञानसिंह परिणय योग्य हो गए।"

"परिणय की व्यवस्था करो।"

"कन्या का चयन?"

"युवराज पर छोड़ दो।"

"युवराज इस खोज में अयोग्य, अनानुभवी तथा अबोध शिशु सिद्ध होंगे।"

"यह तुम्हारी भ्रान्ति है। प्रत्येक आत्मा अपनी जीवन-संगिनी आत्मा को पहचान लेती है। तुम अवरोध मत बनो।"

महाराज मृत्युंजय को गुरुदेव की आज्ञा शिरोधार्य करनी पड़ी।

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"वसुधा का भोग कौन करता है?"

"वीर।"

"वीर किसे कहते हैं?"

"जिसकी भुजाओं में शक्ति हो।"

"शक्ति से शान्ति हो सकती है?" युवराज ने पुन: प्रश्न किया।

"अवश्य, सर्वथा।" शक्तिनगर की राजकुमारी ने उत्तर दिया। युवराज अग्रसर हुए।

"जातियों की रचना किसने की?" युवराज ने प्रश्न किया।

"मानव ने।" ब्रह्मदेश की राज-तनया ने उत्तर दिया।

"जातियाँ कितनी हैं?"

"ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।"

"कोई उपजाति भी है?"

"अनेकों।"

युवराज पुन: अग्रसर हुए।

"रूप किसे कहते हैं?" युवराज का प्रश्न था।

"शरीर के गुण को।" रूपनगर की युवराज्ञी ने कहा।

"रूप सत्य है?"

"क्षणभंगुर।"

इड़ा देश, ज्ञानदेश, रतिनगर, कामरूप, वृत्ति नगर, वणिकपुर आदि किसी भी देश की अतीव रूपवती राजकुमारियाँ भी युवराज को सन्तुष्टि न दे सकीं। विवाह नहीं हो सकेगा। महारज मृत्युंजय चिन्तित थे।

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"आपका आतिथ्य-भार वहन नहीं कर सकूँगी।" अचानक श्मशान की ओर आ जाने वाले किसी भद्र आगन्तुक को अपनी कुटी के द्वार पर विद्यमान लक्ष कर प्रेमवती ने कहा।

"क्यों?"

"मैं अन्त्यजा हूँ।"

"तृषित को जल तया क्षुधित को आहार देना क्या तुम्हारी संस्कृति में नहीं है भद्रे?"

"है, परन्तु लोक-दृष्टि में अस्पृश्य हूँ। अत: .."

"तो तुम यह जानती हो?"

"यह तो साधारण सी बात है।"

"उपवेष्ठन हेतु स्थान तो दो।"

"आप अस्पृश्य हो जाएँगे।"

"इससे उत्तम मुक्ति अन्यत्र कहाँ उपलब्ध होगी? अस्पृश्य भगवान की संज्ञा है न!"

"आप परिहास कर रहे हैं।"

"सत्य यदि परिहास होता है, तो तुम्हीं बताओ कि सत्य क्या होता है।"

"युग-युग से चलती आई अपरिवर्तित सृष्टि-शृंखला को सत्य कहते हैं।"

"तो तुम यह जानती हो? इस संसार में सत्य क्या है?" आगन्तुक ने प्रेमवती-प्रदत्त आसन पर आरूढ़ होते हुए प्रश्न किया।

"सत्य है केवल ब्रह्म, जीव, प्रकृति।"

"कतिपय वेदान्ती तो ऐसा नहीं मानते।"

"यह उनकी भ्रान्ति है। केवल ब्रह्म को ही सत्य स्वीकार कर संसार में अनाचारित और स्वच्छन्दता का प्रादुर्भाव हो जाता है। विश्व-शान्ति स्वप्न बन जाती है। वसुधा उपभोग्य नहीं रहती, आत्मा यदि परमात्मा है तो आत्मोपलब्धि का कोई प्रयोजन ही नहीं रह जाता।"

"क्या तुम बता सकती हो वसुधा का उपभोग कौन करता है?"

"प्रेमवीर।"

"शक्ति के अभाव में विश्व-शान्ति नहीं हो सकती, तुम भी यही स्वीकार करती हो?"

"नहीं।"

"तो फिर?"

"शक्ति से शान्ति की स्थापना स्वप्न है। शान्ति की प्रतिष्ठा केवल प्रेम से ही संभव है। सम्पूर्ण जीव-जाति विशेषतया मानव जाति प्रेम की ही पिपासु है।"

"जाति किसने बनाई?"

"परमात्मा ने।"

"...." युवक अवाक था।

"नि:सन्देह!"

"कितनी?"

"तीन।"

"कौन-कौन सी?"

"मानव, पशु तथा पक्षी।"

"कोई उपजातियाँ भी हैं?" विस्मित युवक की ध्वनि पुन: प्रश्नवती हुई।

"हाँ। उपजातियाँ भी तीन हैं -- स्त्री, पुरुष, नपुंसक।"

"रूप की परिभाषा बता सकोगी?"

"दृष्टि द्वारा हृदय-गम्य आत्मा की अनुपम अनुभूति ही रूप है।" साँवरी षोडशी ने उत्तर दिया।

"तुम रूप को सत्य मानती हो?"

"सत्य की अनुभूति सत्य ही होती है।"

"....!"

"तुम कौन हो युवक!"

"तुम्हारा जन्म-जन्म का साथी।" युवक ने बढ़कर अपना हीर-हार कन्या की ग्रीवा में प्रतिiष्ठत कर दिया।

"यह क्या अनर्थ कर रहे हैं युवराज!" बाह्यागमित कन्या के जनक ने दूर से चरणों की रज लेते हुए करबद्ध विनय की।

"हम चाण्डाल हैं प्रभु!" जनक ने आवेदन किया।

"संसार के इस अद्‍भुत रंगमंच पर हर जीव अपना-अपना अभिनय एक ही महानिर्देशक के अधीन पूर्ण कर रहा है। वर्ण-जाति समस्त भेद केवल बाह्य-भेद हैं। आभ्यंतर में सभी समान हैं। चाण्डाल वे नहीं जो चाण्डाल के अपेक्षित कृत्य करते हैं। चाण्डाल वे हैं जो उन्हें अज्ञान-वश चाण्डाल समझते हैं। स्वयं निर्मित वर्ग-विभेद के आधार पर पारस्परिक घृणा को प्रश्रय देते हैं। आज ज्ञान को प्रेम की आवश्यकता है। ज्ञान और प्रेम मिलकर वसुन्धरा पर स्वर्ग की रचना कर सकते हैं। अपनी कुटी का जलजात मुझे दान दे दो बाबा!" युवराज ने युग-पाणि प्रसारित करते हुए निवेदन किया।

"युवराज!" भोली शाविका-सी बालिका अवाक्‌ निर्निमेष निहार रही थी।

तत्पालित मूषक, मार्जार तथा श्वान त्रयी भी उसका साथ दे रही थी।



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