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| 01.16.2009 |
| चाहे कितने दीप जलाना। महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश |
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चाहे कितने दीप जलाना।
सुधियों के दीपक न बुझाना।। 1 जो भी तुम से रूठ गये हैं, अनजाने ही छूट गये हैं, उन्हें मनाकर बड़े प्यार से, फिर से अपने पास बुलाना।। 2 जिनका जीवन भार बना है, विषमय यह संसार बना है, सहानुभूति प्रलेप लगाकर, उनके उर के व्रण सहलाना।। 3 रंग न शेष, तरंग नहीं है, मन में रंच उमंग नहीं है, आकर्षण नूतन भर-भर कर, उनका जीवन सरस बनाना।। 4 पंगु हो गईं अभिलाषायें, भ्ांग हुईं जिनकी आशायें, उनको दे सान्त्वना सुहृदयता, सारे सपने सत्य बनाना।। 5 प्यार नाम है त्याग - क्षमा का, जीवन की अक्षुण्ण सुषमा का, आत्मीयता का प्रसाद दे, अपनों को फिर हृदय लगाना।। 6 एक बार जिसको अपनाया, पुलकित होकर कण्ठ लगाया, भ्रान्ति-भ्ांवर में डूब अचानक, उसको कभी नहीं बिसराना।। 7 भूल हुई जो उसे भुलाओ, वर्त्तमान को सुखद बनाओ, जाने अगला पल क्या लाये? जीवन का है नहीं ठिकाना।। 8 दु:ख स्वयमेव दूर जायेगा, पल-पल नव सुख बरसायेगा, निज मन का आंगन विस्तृत कर, पुन: प्यार के दीप सजाना।। 9 मन से सकल मलिनता जाये, जीवन में अमलिनता आये, रोष-घृणा का तिमिर दूर कर, प्रिय! शुभ दीपावली मनाना।। |
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