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05.03.2012
 

सबक
प्रियंवदा देवी मिश्रा


जया नहा धोकर तैयार हुई, माथे तक घूँघट किया, सीढ़ियाँ उतर कर धीरे-धीरे नीचे आ गई। मम्मी जी के पैर छूने जैसे ही नीचे झुकी, वैसे ही मम्मी जी ने हाथ पकड़कर ऊपर उठा लिया।

पैर छूना छुवाना पुरानी बातें हैं, दिल में इज़्ज़त होना चाहिये, इतना ही काफी है। सर पर ये घूँघट क्यों तान लिया है?’

मम्मी जी ने जया के सर से घूँघट उठा दिया,

मेज पर नाश्ता लग गया है, सब लोग तुम्हारा इन्तज़ार कर रहे है, चलो नाश्ता कर लो चलकर’,  मम्मी जी ने प्यार से कहा।

जया ने अपनी भाभियों को ससुर, जेठ के साथ बराबर बैठकर खाते पीते नहीं देखा था, वह थोड़ी सी झिझकी और एक झिझक के साथ जाकर एक कुर्सी पर बैठ गई। पापाजी ने एक पकौड़ी का टुकड़ा मुँह में रक्खा और कहने लगे, शम्भू ने पकौड़ियाँ लिजलिजी सी कर दीं हैं’, जया कुर्सी से उठी और पकौड़ियों की प्लेट किचिन में ले गई। कढ़ाई गैस पर चढ़ाकर धीमी आँच में कुरकुरी पकौड़ियाँ सेंक लाई। पापाजी खुश हो गये।

घनश्याम घंटे भर पहिले फ़्रिज से निकालकर जग भर के रख देता है, जब तक खाओ पियो पानी गरम होने लगता है’, विपिन ने कहा। जया ने पानी का जग उठाया, जग का पानी बाल्टी में उड़ेल कर फ़्रिज से बोतल निकालकर जग में ठंडा पानी भरकर मेज पर रख दिया।

भाभी इतने नौकर घूम रहे हैं, किसी नौकर को आवाज दे देतीं, आप खुद क्यों दौड़ रहीं हैं?’ विभा ने भौंहें सिकोड़कर कहा।

सुधीर प्रथम दिन से ही जया की फ़र्मावरदारी को मिडिल-क्लास-मेंटैलिटी मानकर कुपित था और आज जया के बार-बार स्वयं उठकर नौकरानी की तरह भागने से मन ही मन क्रोधित हो रहा था, अतः विभा के बात समाप्त करते ही फूट पड़ा,

अपने घर में नौकर चाकर देखे हों, तो नौकरों से काम लेना आये  

जया सहम गई, उसे याद आया माँ ने चलते-चलते समझाया था, ‘घर में चाहे कितने भी नौकर चाकर हों, अपने परिवार वालों को अपने हाथ से परसने खिलाने में प्यार बढ़ता है, बड़ों का सम्मान होता है। सुधीर का ताना सुनकर जया के आँसू उतर आये। उसे पता ही नहीं चला कि उसने क्या खाया; सब लोग उठे तो वह भी धीरे से उठ कर कमरे में चली गई।

जया को ब्याह कर ससुराल आये दो हफ़्ते हो गये थे, वह अपने पति सुधीर के साथ एडजस्ट नहीं कर पा रही थी। एक दिन सुधीर के कुछ दोस्त आने वाले थे, जया ने किचेन में जाकर मठरी सेंक कर रख दी। हलवा बनाकर हाट-केस में रख दिया, नौकर से समोसे बाहर से लाने को कहकर जैसे ही बाहर निकली, वैसे ही एक साथ कई आवाजें सुनाई दी, ‘भाभी जी हम लोग आपसे मिलने आये है,  आप कहाँ छिपकर बैठ गईं?’

जया धीरे से बाहर निकली, नमस्ते करके सिटिंग रूम में एक कुर्सी पर बैठ गई।

वाह भाभी जी, हम तो यह सोचकर आये थे, कुछ अपनी कहेगें, कुछ आपकी सुनेगें, मगर आप तो छुईमुई की तरह सिमटी-सिकुड़ी चुपचाप बैठी हैं’, सुनील ने कहा।

छुई मुई तो हाथ लगने से सिकुड़ती है, भाभी जी तो हमारी आवाज़ से ही सिकुड़ गईं’, जतिन ने हँसते हुए जोड़ा।

भाभी जी नई नवेली दुलहिन है, इतनी जल्दी कैसे खुल जायेंगी?’, ललित हँसकर बोला। इतने में घनश्याम चाय नाश्ते की ट्रे लाकर मेज पर रख गया।

हलवा कितना लज़ीज़ बना है’, सुनील ने एक चम्मच हलवा मुँह में रखते ही कहा, ‘और यह मठरी कितनी खस्ता है, लगता है सारा सामान भाभी जी ने ही बनाया है’, ललित ने मठरी तोड़ते हुए कहा।

परंतु सुधीर ने अपने मन की भड़ास निकालते हुए जया को ताना दिया, इन्हें चौका चूल्हे के सिवा और आता ही क्या है?’

अच्छा भाभी जी आपको चौका चूल्हे के सिवा और कुछ नहीं आता?’ कहते-कहते सब लोग ठहाका मारकर हँस पड़े। जया का हृदय अन्दर तक झनझना उठा।

 माहौल को सामान्य बनाने के उद्देश्य से प्रियंक बोला,  भाभी जी सुना है आपके गाँव के पास शारदा डैम बन गया है, बहुत रमणीक स्थल है। आप हम लोगों को बुलाइये, हम लोग पिकनिक मनायेगें, डैम में जल विहार करेगें, बड़ा मजा आयेगा, सुधीर चलने का प्रोग्राम बनाओ।

हाँ इनके पिताजी के खेत खलियान भी देख लेना। सुधीर को जया पर कटाक्ष करने की आदत सी पड़ गई थी।

हाँ-हाँ, आप लोग अवश्य आइये। आप लोग बड़े शहरों में रहते है, आप लोगो ने गाँव नहीं देखे होगें। आपको एक अजीबोगरीब चीज लगेंगे’, जया का स्वर हलका सा कठोर हो गया था।

क्या भाभी जी आपके गाँव में बैलगाड़ी से आते जाते हैं?’, सुनील ने कुछ अज्ञानतावश एवं कुछ व्यंग्यपूर्वक पूछा।

नहीं भाई साहब, हम लोग कस्बे में रहते है, गाँव में हमारा फार्म है, पिताजी के पास जीप है, पिताजी जीप से फार्म देखने जाते है, अगर खुद जाकर न देखें तो नौकर-चाकर भट्टा बैठा दें’, जया के स्वर में दृढ़ता थी।

थोड़ी देर गपशप करके दोस्त लोग चले गये, परंतु सुधीर का असंतोष उसके चेहरे से टपक रहा था।

जया अपने कमरे में चली गई, जया ने कमरे से सुना, सुधीर माँ के पास बैठा बड़बड़ा रहा था।

माँ, आपने कितने दकियानूसी परिवार की लड़की मेरे गले बाँध दी, आखिर मुझमें क्या कमी है? स्मार्ट हूँ, ऊँची पोस्ट पर हूँ, मेरे कोलेज की कितनी लड़कियाँ मुझसे शादी करने को तैयार थीं, परन्तु आपकी ज़िद के आगे मैं झुक गया। जया कितनी पिछड़ी है, न उठने बैठने की तमीज़ है न बोलने का सलीक़ा, चार लोग आये तो सिमिट सिकुड़ कर बैठ गई। बोली तो ऐसे बोली मानो पत्थर मार रही हो। उस दिन एक दोस्त के बेटे की बर्थ डे में लेकर गया, तो सब लड़कियाँ ताली बजाकर हैप्पी बर्थ डे गा रहीं थीं, यह मुँह लटकाये चुपचाप खड़ी थी। कपड़े पहिनने की तमीज़ नहीं, सर्दी में शेफान और गर्मियों में सिल्क पहिनकर चल देती है, हाई हील के सैन्डिल लाकर दिये तो पहिन कर चली और गिर पड़ी। मुझे तो बहुत शर्म आती है, मेरे दोस्त अरुण की शादी अभी हाल में ही हुई है, उसकी बीवी कितनी स्मार्ट है, फर्राटे से अँग्रेज़ी बोलती है, अरुण बता रहा था, लेडीज संगीत में उसकी छोटी बहिन ने ज़बर्दस्ती खड़ा कर दिया। इतना अच्छा डान्स किया जो सब लोग वाह-वाह कर उठे।

सुधीर गुस्से में कहता चला जा रहा था कि माँ ने बीच में टोका, ‘बेटा यह लड़कियाँ फर्राटे की अँग्रेज़ी बोल लेतीं हैं, बढ़िया डान्स कर लेतीं हैं, परन्तु घर गृहस्थी के काम में अक्सर इन्हें कुछ नहीं आता है। अँग्रेज़ी बोल लेना, नाच गा लेना थोड़े दिनों की चकाचौंध है, बाद में घर गृहस्थी ही काम आती है। सामने त्रिपाठी जी के बेटे की बहू को देखते हो, स्मार्ट है, फर्राटे की अँग्रेज़ी बोलती है, संगीत में प्रभाकर की डिग्री ले रक्खी है, परन्तु परन्तु मिसेज त्रिपाठी दिन भर काम में जुटी रहतीं हैं, बहू रानी कमरे में पलंग पर लेटकर स्टीरियो सुनतीं रहतीं हैं- न सास की लाज न ससुर की इज़्ज़त। जया सुन्दर है, पढ़ी लिखी है, घरेलू वातावरण में पली बढ़ी है, शहर में रहकर सब सीख जायेगी’, माँ ने सुधीर को समझाते हुए कहा।

माँ घर गृहस्थी तो एक अनपढ़ लड़की भी कर लेती है, इतना तो मैं कमा ही लेता हूँ जो घर गृहस्थी के काम को एक नौकर रख सकूँ। आजकल शहरों में जगह-जगह रेस्टोरेन्ट व होटल खुल गये हैं, एक फोन कर दो, मनपसन्द खाना घर बैठे आ जायेगा। कुछ सोशल लाइफ भी तो होती है?’, सुधीर की बातें जया कमरे से सुन रही थी, उसका एक-एक शब्द उसका हृदय चीरता चला जा रहा था। जया को अपनी माँ पर भी क्रोध आया कि उन्होंने कितने पुराने संस्कारो में उसे ढाल दिया। उसने महिला कालेज से बी०ए० पास किया था। साइकॉलोजी से एम०ए० करना चाहती थी। साइकालोजी केवल क्राइस्ट चर्च कालेज में पढ़ाई जाती थी, जहाँ सह-शिक्षा थी। लड़के लड़कियाँ एक साथ पढ़ते थे। माँ कितनी मुश्किल से क्राइस्ट चर्च कालेज में एडमिशन को तैयार हुई थीं। जब जया कालेज जा रही थी तो हिदायतों की पूरी की पूरी लिस्ट उसे दी थी- लड़कों के पास मत बैठना। लड़कों से बात मत करना, अगर कुछ पूछना ज़रूरी हो तो नीचे नज़र डालकर धीरे से बोलना। माँ ने कितने उदाहरण दे डाले थे कि सीधी सादी लड़कियों को कालेज के लड़के बरगला कर गलत रास्ते पर ले जाते हैं। लाइब्रेरी में लड़कों के साथ बैठकर पढ़ने की इजाज़त माँ ने कभी नहीं दी। इसी कारण उसकी एम०ए० में डिवीजन बिगड़ गई थी। माँ ने घर से अकेले कभी निकलने ही नहीं दिया। एक दिन माँ के साथ वह पिक्चर देखने गई थी। उसके पास एक लम्बी लड़की ब्वाय कट वालों में जीन्स पहिने बैठी थी। अँधेरे में माँ को शक हुआ कि यह लड़का है। माँ उचक-उचक कर देखने लगीं तो उसे थोड़ा गुस्सा आ गया और यह लड़का नहीं लड़की है’, उसके मुँह से चिल्लाहट निकल गई थी कि आस पास के लोगबाग उन्हें घूरकर देखने लगे थे। माँ तो आश्वस्त होकर बैठ गईं थीं परंतु उसका मन पिक्चर में फिर न लग सका था। अगर इतने पुराने संस्कारों में पाला था तो इतने एडवान्स घर में उसकी शादी क्यो कर दी, जहाँ शालीनता को मूर्खता समझा जावे। एक दिन माँ कह रहीं थीं, ‘तुम्हारे पिताजी चाहते थे कि उनकी बेटी की शादी बड़े घर में हो, जहाँ नौकर चाकर कार बँगला जाते ही मिल जावे। माँ की कितनी निर्मूल धारणा है, ऐसे बड़े घर का क्या करना, जहाँ भौतिक सुख की सारी सुविधायें हो, परन्तु मन को एक पल भी चैन न मिले।

एक शाम कपड़े पहिन कर तैयार होकर सुधीर कहीं जा रहा था। उसने इतना ही तो पूछ दिया था, ‘कहाँ जाने की तैयारी है?’ सुधीर कितनी ज़ोर से बिगड़ पड़ा था, ‘मैं कहाँ जाता हूँ, कहाँ उठता बैठता हूँ, किससे बात करता हूँ, तुम हर समय टाँग अड़ाने वाली कौन होती हो? तुम्हें हाई सोसायटी में उठने बैठने की तमीज़ नहीं है तो क्या मैं भी उठना बैठना बंद कर दूँ?’

जया के संस्कार परम्परागत अवश्य थे, परंतु उसका व्यक्तित्व स्वाभिमानी था। रोज़ रोज़ का अपरोक्ष तिरस्कार तो वह किसी प्रकार सहन कर लेती थी पर इस अनावश्यक प्रताड़ना से उसके मन में विद्रोह जाग उठा। उसने सोच लिया कि वह अपने को बदलकर सुधीर को सबक सिखाकर रहेगी।

 

अगले जाड़ों में दिल्ली में उसकी सहेली लता की बहिन की शादी थी, निमंत्रण पत्र के साथ मम्मी जी के नाम एक विनय पूर्वक पत्र भी लिखा था, जया को इस विवाह समारोह में सम्मिलित होने की आज्ञा दे दें। मम्मी जी ने पत्र सुधीर को दिखाया। सुधीर को छुट्टी नहीं थी। जया के प्रति उसके मन में ऐसी खटास थी कि उसे जया से कुछ दिन दूरी की बात राहत देने वाली ही लगी और उसने उसे अकेले चले जाने को तुरंत कह दिया। जाने के लिये निश्चित हुए दिन सुधीर जया को फर्स्ट क्लास ए०सी० में ट्रेन में बिठा आया। ट्रेन के चलते ही जया ने भी एक स्वतंत्रता की साँस ली। उसके हृदय में एक स्फूर्ति भरती जा रही थी। रास्ते के दृश्य उसे बहुत सुहावने लग रहे थे। नई दिल्ली स्टेशन पर उसकी सहेली लता व उसके पति शैलेन्द्र उसे लेने आये थे। जया के ट्रेन से उतरते ही लता जया से चिपट गई। कालेज छोड़ने के एक अरसे बाद दोनो सहेलियाँ आपस में मिल रहीं थीं। लता के घर पहुँचकर जया को लगा कि वह किसी दूसरी दुनिया में पहुँच गई है। विवाह हेतु घर की सज्जा सुरूचि पूर्ण थी। दूसरे दिन बारात आने वाली थी, केले के पत्तों व फूलों से मंडप सजाया गया था। बाहर पाण्डाल में बारातियों के बैठने व खाने पीने की व्यवस्था थी। मेहमानों से घर भरा था, बारात मेरठ से दिल्ली आ रही थी। दूसरे दिन शाम को बारात खूब धूम धाम से चढ़ी। लड़के व कन्या पक्ष की लड़कियों में खूब हँसी मज़ाक चल रहा था, हँसी के फब्वारे छूट रहे थे। जया इस प्रकार के खुलेपन को आश्चर्य से देख रही थी। रात में विवाह हुआ, दूसरे दिन अपराह्न को बारात विदा होने वाली थी। सुबह चाय नाश्ता के बाद वर पक्ष की कुछ चुलबुली लड़कियों ने कन्या पक्ष के कुछ मनचले लड़कों को घेर लिया। लच्छेदार मीठी-मीठी बातें की और शहर घुमाने का प्रोग्राम बना डाला। लड़कियाँ लड़कों के साथ खूब घूमी, पिक्चर देखी और रेस्टोरेन्ट में खाया पिया। बाद में लड़कों को अँगूठा दिखाकर बारात में आ मिलीं। जया ने आश्चर्यपूर्वक सुना कि लड़कियाँ आपस में ठहाके लगा रही थी, ‘बड़े मजनू बनने चले थे, दो चार हज़ार के चक्कर में तो आ ही गये होगें। सब देहलीपन भूल जायेंगे; याद रहेंगी मेरठ की लड़कियाँ। अब जया सुधीर की तथाकथित स्मार्टनेस का मतलब समझ रही थी।

बारात विदा होने के दूसरे दिन जया का वापस जाने का प्रोग्राम था, परंतु लता ने मम्मी जी को फोन करके जया को हफ़्ते दो हफ़्ते रोकने का आग्रह किया तो मम्मी जी मान गईं। दो दिन में सब महमान विदा हो गये।

 अब जया के मन में सुधीर के कटाक्ष रह-रहकर याद आने लगे थे और उसे सबक सिखाने की भावना बढ़ती ही जा रही थी। लता के साथ जया ने कनाट प्लेस जाकर जीन्स, ट्राउज़र, लो-कट टॉप, कमीज आदि खरीदीं। सैलून में जाकर फ़ेशियल कराया और बाल सेट कराये। फिर लता ने उसे बताया कि जीन्स-टाप पहिन कर जया खूब सुन्दर व माडर्न लग रही थी। शाम को लता के साथ जया क्लब गई। क्लब में जब स्त्री पुरूष एक दूसरे के गले में बाँहें डालकर उन्मुक्त डाँस करने लगे तो कुछ लड़कों ने जया के साथ डाँस करने की इच्छा प्रकट की, तब स्वयं को सिरदर्द होने का बहाना बनाकर जया अपनी कुर्सी पर बैठी रही परंतु वह डाँस करते हुए जोड़ों के हाव-भाव एवं पद-संचालन को भली भाँति देखती रही। आवश्यकता पड़ने पर वह सुधीर के सामने डाँस भी कर सकने हेतु अपने को तैयार कर रही थी। यह क्रम लगभग प्रतिदिन चलता रहा।

पहले दिन से ही जया लता की फ़ेमिली में घुल मिल गई थी और जल्दी ही उसके भाइयों के साथ उसने खुलकर बात करना सीख लिया था। जल्दी ही आधुनिक सोशल लाइफ़ लीड करने को उसने अपने को पूरी तरह तैयार कर लिया।

दो सप्ताह बीत जाने पर लता के पति शैलेन्द ने जया को लखनऊ वापस जाने को ए०सी० में बर्थ रिज़र्व करा दी। लता और उसके पति शैलेन्द्र जया को ट्रेन में बैठा आये।

जया ने बादामी ट्राउज़र व मैंचिंग टॉप पहिना हुआ था, उसके घुँघराले बाल कन्धे तक लटक रहे थे। चेहरे पर हल्का मेकअप था। इस ड्रेस में जया अत्यन्त आकर्षक लग रही थी। ट्रेन में बर्थ पर अधलेटी सी वह इंगलिश का एक नावल पढ़ने लगी थी कि दूसरी बर्थ पर एक नवयुवक कब आ गया, उसने ध्यान ही नहीं दिया।

आप लखनऊ में ही रहती हैं?’ आवाज सुनकर जया चौंक गई।

हाँ, मैं पिछले कई सालों से लखनऊ में ही हूँ। जया ने निर्भीक होकर उत्तर दिया।

मेरा नाम विजयेन्द्र कुमार शुक्ला है, आप चाहें तो मुझे विजय कह सकती है। मैं आर्मी में कैप्टेन हूँ। मेरी पोस्टिंग आजकल देहली में है। एक महीने की छुट्टी पर अपने घर जा रहा हूँ। मेरा घर लखनऊ में गोमतीनगर में है। कहते-कहते विजय ने अपना विज़टिंग कार्ड जया के आगे बढ़ा दिया।

धन्यवाद’, कहकर जया ने कार्ड ले लिया। कैप्टेन शुक्ला उसे कुछ बातूनी तो लगा, परंतु उसका बेझिझक एवं निर्भीक व्यवहार अच्छा भी लगा।     

 क्या आप का परिचय जान सकता हूँ?’, विजय ने पूछा।

मैं सतापुर की रहने वाली हूँ, लखनऊ यूनिवर्सिटी होस्टल में रहकर मैंने एम०ए० पास किया हैं। इस समय अपनी बहिन के पास निरालानगर में रहकर कम्पटीशन की तैयारी कर रही हूँ, इसी सिलसिले में दिल्ली गई थी’, जया ने सफेद झूठ बोला था। आज उसे अपनी वैवाहिक स्थिति छिपाने में बच्चों द्वारा किये जाने वाले खेल जैसा मज़ा आ रहा था।

आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई’, विजय ने प्रसन्न मुद्रा में कहा।

मुझे भी’, जया ने मन ही मन मुस्कराते हुए उत्तर दिया।

फिर रास्ते में विजय तमाम बातें करता रहा और जया उत्सुकतापूर्ण भाव से उसे सुनती रही। तब तक लखनऊ स्टेशन आ गया। ट्रेन रुक गई, जया ने सिर उठाया तो देखा सुधीर डिब्वे के पास खड़ा है, वह उसे लेने आया था।

विजय, तुम्हारे साथ रास्ता कितनी जल्दी पार हो गया, पता ही नहीं-चला। जया ने इतनी ज़ोर से कहा कि सुधीर सुन ले।

अभी तो एक महीने लखनऊ में ही हूँ, मुलाकातें होतीं रहनी चाहिये।’, विजय ने अभी तक सुधीर की तरफ ध्यान नहीं दिया था।

हाँ, आपका फोन नं० मेरे पास है, फोन करती रहूँगी, अब तो मिलना जुलना होता ही रहेगा’, जया जानबूझकर खूब ज़ोर-ज़ोर से बोल रही थी।

जया ने बड़ी आत्मीयता प्रदर्शित करते हुए विजय से हाथ मिलाया और अटैची हाथ में लेकर खटखट नीचे उतर गई। सुधीर आश्चर्य से कभी जया को कभी विजय को देख रहा था, उसके बोलने की शक्ति समाप्तप्राय हो गई थी।

अरे भई जल्दी चलो, क्या सोचने लगे?, बड़ी गर्मी है’, प्लेटफार्म पर आते ही जया ने सुधीर का हाथ खींचते हुए कहा।

सुधीर की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। जया के रंग ढंग देखकर वह भौंचक्का हो रहा था। चुपचाप चल दिया और जया के साथ कार में बैठकर घर आ गया।

जया बेटी दो हफ़्ते में तुम इतनी बदल गई?’ मम्मी जी ने जया को देखकर आश्चर्य में कहा।

और मम्मी इनसे यह पूछो कि ट्रेन में इनके साथ वह कौन युवक था, जिससे ये हँस-हँस कर बातें कर रही थी, और हाथ मिलाकर फिर मिलने का वादा करके आई हैं’, सुधीर गुस्से से बोला।

अरे मम्मी जी, वह विजय बाबू थे, आर्मी में कैप्टन हैं, देहली में पोस्टेड है, यहाँ गोमतीनगर में अपने घर एक महीने की छुट्टी पर आये हैं, मम्मी जी वह एक उत्तम चित्रकार भी है, अपनी बनाई हुई कितनी सुन्दर पेन्टिंग उन्होने मुझे प्रेज़ेन्ट की है। वह प्रतिभावान होने के अतिरिक्त बहुत सोशल हैं, उनके साथ रास्ता कितनी जल्दी कट गया, पता ही नहीं चला।’, यह कहते हुए जया ने कनाट प्लेस से खरीदी हुई एक पेंटिंग मम्मी जी के सामने रख दी।

अच्छा तो अब आप उनकी प्रेजेंट भी लेने लगीं?’ सुधीर अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा था।

अरे भाई, पत्नी तो हम आपकी ही रहेंगी।      घड़ी दो घड़ी किसी से हँस बोलकर मन बहला लिया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?’, जया ने सुधीर द्वारा पूर्व में उससे कहे हुए शब्द ही दुहरा दिये।

सुधीर गुस्से से पागल हो रहा था, उससे आगे कुछ बोला नहीं गया, वह उठकर दूसरे कमरे में चला गया।

 

जया बेटी शम्भू ने खाना मेज़ पर लगा दिया है, नहा धोकर कपड़े चेन्ज कर लो, फिर कुछ खा पी लो’, मम्मी जी ने उस समय बात टालते हुए कहा।

जया बाथरूम में चली गई, नहा धोकर साड़ी पहिन कर बाहर निकली।

तब मम्मी जी उसकी ओर देखकर बोलीं, ‘जया साड़ी पहिन कर तुम कितनी सुन्दर लगती हो, ये माडर्न कपड़े अपनी बहू-बेटियों को शोभा नहीं देते। अपने देश का पहिनावा तो साड़ी ही है।

मम्मी जी मेरी समझ में नहीं आता मैं उनको कैसे खुश करूँ? इतने दिनों से वह मुझे दकियानूसी-अनसोशल कहते रहे, और अब जब कुछ नया सीखा है तो भी खुश नहीं हैं’, जया ने अपने मन की बात कही।

सुधीर आज जया को विजय के साथ घुलमिलकर बोलते देखकर उद्विग्न था और बगल के कमरे में उसकी और मम्मी की बात सुन रहा था। जया की बात सुनकर वह वहीं आ गया और अपनी सफ़ाई सी देता हुआ मम्मी की ओर देखते हए बोला,

मम्मी मेरा मतलब यह थोड़े ही था कि जया जीन्स और लो-कट टाप पहिन कर अल्ट्रा माडर्न बन जावे और गैरमर्दों के साथ दोस्ती करती फिरे।

सुधीर का रुँआसा सा मुँह देखकर जया समझ गई कि सुधीर को अपनी गलती का अहसास हो रहा था। अच्छा मम्मी जी, मझे बड़ी भूख लगी है, थोड़ा खा पी लूँ, तब बात करेंगे, कहते-कहते जया डाइनिंग रूम की ओर चल दी। वह अपनी सफलता पर मन ही मन फूली नहीं समा रही थी।


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