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ISSN 2292-9754

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08.04.2014


चुप

मैं
चुप से सुनती
चुप से कहती और
चुप सी ही रहती हूँ

मेरे
आप-पास भी
चुप रहता है
चुप ही कहता है और
चुप सुनता भी है

अपने
अपनों में सभी
चुप से हैं
चुप लिए बैठे हैं और
चुप से सोये भी रहते हैं

मुझसे
जो मिले वो भी
चुप से मिले
चुप सा साथ निभाया और
चुप से चल दिए

मेरी
ज़िन्दगी लगता है
चुप साथ बँधी
चुप संग मिली और
चुप के लिए ही गुज़री जाती है

कितनी
गहरी, लम्बी और
ठहरी सी है ये
मेरी
चुप की दास्ताँ........


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