अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.14.2014


खुला पत्र

सुनो तुम.… ध्यान से सुनो - चंद टुच्चे लोगों की सोच और टिप्पणियों से घबरा कर मैं अपने रहने के तरीके में कोई फेरबदल नहीं करने वाली। भले ही इन बातों से थोड़ी देर के लिए मैं आहत हो गयी थी। ये भी सच है कि कुछ रातें मैंने आँखों में काटीं…कभी-कभी पलकें बरसी भी, लेकिन… इसका मतलब ये बिलकुल नहीं कि मैं डर जाऊँगी। मैं आज़ाद हूँ और आज़ाद ही रहना चाहती हूँ। गुलामी – सोच की, दूसरों के अनुसार जीने की - अब मुझे बर्दाश्त नहीं। जिसे जो कहना है कहता रहे।

तुम ही सोचो… घर से दूर रहते हुए करीब दस साल हो गए, हो गए ना? इन दस सालों में मैंने अपने तरीके से ज़िन्दगी को देखा - जीया, हर परेशानी को अपने तरीके से सुलझाया। क्या मैंने कभी किसी परेशानी की शिकायत की…नहीं ना, फिर तुम्हें ये विश्वास क्यों नहीं होता कि मुझे कभी भी कोई तकलीफ़ नहीं पहुँचा सकता, कि मैं अकेले रह सकती हूँ और बिना बेवक़ूफ़ बने, बिना किसी गलती के सही निर्णय ले सकती हूँ।

मै जैसी भी हूँ …तुम्हारी वज़ह से ही तो हूँ …जो भी अच्छाई है, बुराई है, तुम्हारी ही तो दी हुई है, फिर तुम्हें मुझ पर क्यों अविश्वास हो जाता है? क्यों हर बार मुझे ही कटघरे में खड़ा कर देते हो? ये समझ लो कि जब-जब तुम मुझ पर अविश्वास जताते हो तुम खुद पर भी अविश्वास जताते हो, जब भी तुम मुझे कटघरे में खड़ा करते हो कहीं ना कहीं तुम भी कटघरे में होते हो। फिर क्यों हर बार मुझ से सवाल पूछते हो? सवाल तो उनसे पूछो ना जो मुझ पर ऊँगली उठाते हैं... ये भी तो सोचो जब वे एक ऊँगली मेरी और उठाते हैं तो बाकी की चार उँगलियाँ उनकी ओर भी तो उठती हैं … नहीं, ये कोई डायलॉग नहीं बोल रही मैं, सच कह रही हूँ। तुम्हें पता तो है बचपन से ही मैं ऐसी ही तो हूँ, फिर अचानक ऐसी और इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों? लोगों को जो कहना है कहने दो … मैं लोगों और समाज के भय से अपनी आज़ादी नहीं खोना चाहती, मैं जैसी बिंदास हूँ वैसी ही रहूँगी, हाँ... मैंने अपने लिए एक दायरा बना रखा है ना मैं कभी उसे तोड़ूँगी और ना ही किसी को उसे तोड़ने दूँगी। बस, इतना ही कहना है मुझे। लेकिन तुमने ही तो सिखाया था मुझे कि दायरा बनता ही है टूटने के लिये … तो क्या मौखिक शिक्षा में और लागू किये जाने वाली शिक्षा में अन्तर होता है।

मैंने कभी तुम्हारे विश्वास को तोड़ने की कोशिश नहीं की, फ़िर भी अगर तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं तो तोड़ती हूँ इस झूठे बंधन को जिसमें एक दूसरे के लिए विश्वास तक नहीं है।

इतना लिखने के बाद क्रिया ने निश्चिन्त होकर अपना लैपटॉप बंद किया और बिस्तर पर जाकर लेट गयी। कई रातों की जागी आँखों में आज बेफिक्री वाली नींद थी। रात के दो बज गए थे और क्रिया मीठी नींद सो चुकी थी।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें