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05.31.2008
 

वो रात उस के साथ………
प्रिया सैनी


कमाल की बात है। इस शीर्षक को पढ़ कर हर शख़्स यही सोच रहा होगा कि जाने यह औरत अपने जीवन की कौन सी रात का राज़ यहाँ खोल रही है? अजनबी होने के बड़े फायदे हैं। कहीं भी, कुछ भी कह डालो, कौन सा हमें कोई जानता है? सब सही गलत कह कर भी हम वही के वही,  हमारी सामाजिक छवि पर कोई आँच नहीं। कुछ गलत भी हो जाए तो क्या ?

सब पर्दे में।

खैर। आप कुछ भी समझें परन्तु वो रात मैंने उस के साथ गुजारी है। हालाँकि उसके बाद की कई रातें हम साथ रहें हैं, पर उस पहली रात सी बेचैनी, उद्विग्नता नहीं थी। फिर तो बस आदत सी हो गई। यह जीवन में पहली बार है कि मैंने उसे इतने करीब से देखा है। वरना मैं तो उनसे बहुत डरती हूँ।

गर्मी की शांत, सलोनी, तारों भरी रात को छत पर सोते हुए उन के बिस्तर पर आ जाने का डर न जाने कब से मेरी नींदें उड़ाता रहा है। कई बार तो उनके आने की आहट सुन-सुन कर मैं रात-रात भर जागी हूँ। अरे नहीं, नहीं मैं विशुद्ध रूप से बिल्लियों की बात कर रही हूँ, जो मेरे मुहल्ले मैं अपने काले, झबरीले, पीली आँखों वाले, निराले अंदाज़ में रहती हैं। जिनकी कोई भी करीबी मुठभेड़ मुझे डरा देती है। उनकी गोल पीली सी कंचे जैसी आँखों के बीचों-बीच की काली लकीर पर नज़र पड़ते ही मेरी रीढ़ में सर्द लहर झनझना जाती है। रात को आपस में झगड़ते हुए उनकी बच्चे के रोने सी आऊँ-आऊँ आवाज मुझे नींद में भी डरावने सपने सी प्रतीत होती है।

परमात्मा के खेल निराले होते हैं। कुछ दिन हुए मेरी दिल्ली में रहने वाली मौसी आप्रेशन करवाने हमारे यहाँ आई। अकेली विधवा होने तथा मेरी सेवा-सुश्रूषा पर विशेष विश्वास होने के कारण उन्होंने आप्रेशन मेरे पास आकर करवाना तय किया। उनके साथ आई उनकी बिल्ली। पहली नजर में सफेद, पीली धारियों वाली, हल्की भूरी काँच सी आखों वाली,  छोटी,  पतली, मरगिल्ली सी बिल्ली मुझे किसी भी तरह डरावनी नहीं लगी। आँटी बिल्ली को मेरी देखरेख में रख कर आश्वस्त थीं। परन्तु रात होते-होते जब उसने पहली बार अपना मुँह जम्हाई लेने के लिए अपने मार्जारी अन्दाज से खोला तो मेरे सारे आश्वासन, वचन सूखे पत्ते से काँप उठे। शंकाएँ कांग्रेस घास की तरह अपने दमघोंटू अन्दाज में खड़ी हो गईं।

ऊपर से आँटी का आदेश कि बिल्ली हमारे साथ डबल बैड पर सोएगी। मैं भीतर तक सहम गई। पर बड़ी दिलेरी से मैंने अपना तकिया, चादर लगाया। हालाँकि छत्त पर भी अपना बिस्तर मम्मी से कह कर लगवा लिया। रात बढ़ने लगी। बिल्ली और आँटी मज़े से सो रहे थे। पर मेरी नींद आने से झिझक रही थी। फिर सोचा ---यह छोटी, मरगिल्ली सी बिल्ली मेरा क्या कर लेगी ? लिहाज़ा मैं सो गई।

रात का दूसरा प्रहर होगा शायद, मुझे मेरी जाँघ पर दो काँटे चुभने का अहसास हुआ। मैंने नींद में शायद हाथ मारा, कुछ हुआ तो नहीं पर मेरी नींद झटाक से खुल गई। बिल्ली शायद बिस्तर से नीचे उतरने की कोशिश में मुझ पर चढ़ गई थी। पर मेरे हिलने से वह भाग कर अपनी जगह चली गई। बहुत छोटी होने के कारण मेरा हाथ उसके ऊपर से निकल गया था। अब तो मेरी नीं काफ़ूर हो गई।

बेचारी नन्हीं सी बिल्ली के लिए मेरी देहयष्टि किसी पहाड़ से कम न थी। मुझे पार करना उसके लिए दुष्कर रहा होगा। परन्तु अगर वह इस तथाकथित पहाड़ के आकार-प्रकार की जाँच करने निकल पड़ती तो उसके शोध का क्या परिणाम होता यह सोच कर मेर गला सूख गया। हँसी भी आई कि अगर उसे मेरे मुँह से खाने की खुश्बू आ गये होती तो…???  आँटी ने बच्ची है, नई जगह पर रास्ता भूल गई होगी कह कर उसे अपने साथ सटा कर सुला लिया और खुद भी सो गई। अब तो मेरी नींद बागी हो गई। दोबारा कहीं बिल्ली मेमसाहब का घूमने का मन हुआ या नई जगह का मुआयना करने निकल पड़ी तो मेरा क्या होगा ? मैं तो पहाड़ सरीखी फिर वहीं की वहीं रास्ते में थी।

अंतत: मौके से पलायन के अतिरिक्त कोई चारा न रहा। मैं अपना तकिया उठाकर छत्त पर भागी और जंगली बिल्लियों के आवागमन क्षेत्र में बेखौफ़ सो गई।


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