अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
06.30.2008
 
सच कुछ इस तरह
डॉ. प्रिया सैनी

१.
नाम उसने
कुछ और कहा
मैंने उसी का नाम लिया
उसने तू बस तू कहा
मैंने उसी को थाम लिया !

२.

इक नन्हा नुक्ता
तुम हो
इक नन्हा नुक्ता
मैं हूँ
इक नन्हा नुक्ता
संसार है
यह नुक्ता ही
अपार है
इसी नुक्ते का सारा
भ्रम है
यही नुक्ता ही तो
ब्रह्म है !

३.
मुर्शिद कहते हैं
लोग उसे
गुरवे नमः
पुकारते हैं
मैं कहूँ तो
क्या कहूँ
मेरा ख़ुदा राह
वही है!

४.
इश्क़ हक़ीक़ी
वही है
मेरा माँझी भी
वही है
गहरे पैठ देखा है
वो वही है
बस वही है!

५.
मुझे रँग दिया है
उसने
मैं भीतर बाहर
लाल हूँ
मैंने रँग दिया है
उसको
वो पहले से ही
लाल है
इक उसका है
इक मेरा है
पर लाल लाल
बस लाल है!

६.
वो कहता है पर
कहता नहीं
वो देता है पर
देता नहीं
वो सुनता है पर
सुनता नहीं
वो चाहता है पर
चाहता नहीं
वो पास है पर
पास नहीं
वो दूर है पर
दूर नहीं
वो मेरा है पर
मेरा नहीं
मैं उसकी हूँ
बस
उसी की हूँ !

७.
जन्नत मिलती होगी
शुभ कर्मों के लिए
सोपान होंगे
साधना का सिला
कुछ नहीं हूँ मैं
तेरी मोहब्बत के सिवा
तुम आओगे..........?
मेरी जन्नत का
सोपान बन कर......
मेरी साधना का
निर्वाण बन कर.....
और
मेरी मोहब्बत का
कान्ह बन कर......?

८.
शब्दों के अर्थ
हज़ारों हैं
व्यर्थ तर्क
हज़ारों हैं
सत्य सुन्दर
शिव स्वरूप है
न पास है
न दूर है
बस
अनूप है
अनूप है!

९.
इश्क़ मजाज़ी की
चाहत में
इश्क़ हक़ीक़ी की
समझ पाई है
कुछ तो दिया है उसने
कुछ दिल की मेहनत
रंग लाई है !

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें