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05.31.2008
 
कहावतों की कहानियाँ
डॉ. प्रिया सैनी

कितनी अजीब सी बात है कि हम चाहे कितने भी बड़े हो जाएँ पर न तो हमें अपना बचपन भूलता है और न ही बचपन की बातें। और एक बार बचपन की बात चल पड़े तो पता नहीं क्या-क्या याद आ जाता है। रात को छत्त पर लेट कर तारे गिनना, तकिए के साथ धमा-चौकड़ी मचाना, नानी की गोद में लेट कर कहानियाँ सुनना, पता नहीं क्या-क्या। मुझे आज भी याद है, हमारी नानी हमेशा कहानी सुनाने से पहले एक कहावत पूछ कर हम से उसका अर्थ पूछती। हम सब चुपचाप पलकें झपकाते तो नानी हँस कर एक चपत लगाती और कहानी सुनाने लगती। पहले तो हम समझ ही नहीं पाते कि अर्थ न बता कर नानी कहानी क्यों सुना रही है? पर जैसे जैसे कहानी खत्म होती हमें कहावत का अर्थ और कहावत के शुरू होने का कारण भी समझ आ जाता। ऐसी ही कुछ कहावतों की कहानियाँ मैं आप को सुना रही हूँ। जो न जाने कब से लोक में प्रचलित हैं।

  1. जिस की लाठी उस की भैंस

  2. खोदा पहाड़ निकली चुहिया

  3. चोर की दाढ़ी में तिनका

  4. देखना ऊँट किस करवट बैठता है

  5. जैसा करै वैसा भरै

 

जिस की लाठी उस की भैंस

तो कहानी कुछ यों है कि एक ब्राह्मण को कहीं से यजमानी में एक भैंस मिली। उसे लेकर वह घर की ओर रवाना हुआ। सुनसान रास्ते में वह पैदल ही चला जा रहा था। बीच रास्ते में उसे एक चोर मिला। उसके हाथ में मोटा डण्डा था और शरीर से भी वो अच्छा तगड़ा था। उसने ब्राह्मण को देखते ही कहा – “क्यों ब्राह्मण देवता, खूब दक्षिणा मिली लगती है, पर यह भैंस तो मेरे साथ जाएगी।

ब्राह्मण ने झट कहा- क्यों भाई?”

चोर बोला- क्यों क्या? जो कह दिया सो करो। भैंस छो कर चुपचाप यहाँ से चलते बनो, वरना लाठी देखी है, तुम्हारी खोपड़ी के टुकड़े- टुकड़े कर दूँगा।

अब तो ब्राह्मण का गला सूख गया। हालाँकि शारीरिक बल में वह चोर से कम नहीं था। पर खाली हाथ वह करे भी तो क्या करे? विपरीत समय में बुद्धिबल काम आया। ब्राह्मण बोला- ठीक है भाई, भैंस भले ही ले लो, पर ब्राह्मण की चीज यों छीन लेने से तुम्हें पाप लगेगा। बदले में कुछ देकर भैंस लेते तो पाप से बच जाते।

चोर बोला- यहाँ मेरे पास देने को धरा क्या है?” ब्राह्मण ने झट कहा- और कुछ न सही, लाठी देकर भैंस का बदला कर लो।

चोर ने खुश हो कर लाठी ब्राह्मण को पकडा दी और भैंस पर दोंनो हाथ रख कर खड़ा हो गया। तभी ब्राह्मण कड़क कर बोला- चल हट भैंस के पास से, नहीं तो अभी खोपड़ी दो होती है।

चोर ने पूछा- क्यों?”

ब्राह्मण बोला- क्यों क्या ? जिस की लाठी उस की भैंस।

चोर को अपनी बेवकूफी समझ आ गयी और उसने वहाँ से भागने में ही भलाई समझी। किसी ने सच ही कहा है कि जिसमें अक्ल है, उसमें ताकत है।

तो अब समझे कि यह कहावत यहीं से शुरू हुई, जिस की ाठी उस की भैंस।

खोदा पहाड़ निकली चुहिया

बहुत दिनों पहले की बात है। एक पहाड़ के पास एक गाँव बसा था। उस पहाड़ से हर रोज अजीब-अजीब सी आवाजें आती थीं। कभी किट-किट, कभी चूँ-चूँ, कभी खुर-खुर। लोगों का डर के मारे बुरा हाल था। न जाने क्या हो, भूत-प्रेत या कोई जंगली जानवर ? एक दिन थक-हार कर गाँव के बड़े-बूढ़ों ने फैसला किया कि डर दूर करने का एक ही इलाज है कि पहाड़ को खोदा जाए। बस फिर क्या था, गाँव के कुछ नौजवान पहाड़ खोदने लगे। बड़ी मेहनत से कई दिनों तक पहाड़ का एक बडा हिस्सा खोदने के बाद जो निकला उसे देख कर तो हँसते-हँसते लोगों के पेट में बल पड़ गये। जी हाँ ! वहाँ से निकली एक छोटी सी चुहिया। तो बस कहावत चल निकली, खोदा पहाड़ निकली चुहिया। मतलब मेहनत बहुत और नतीजा कुछ नहीं।

 

चोर की दाढ़ी में तिनका

बहुत समय की बात है, एक काजी की अदालत में चोरी का एक मुकदमा आया। पुलिस ने शक में कई आदमियों को पकड़ कर हाज़िर किया। काज़ी सबूतों से न समझ पाए कि असली चोर कौन है? तब उन्हें एक तरकीब सूझी। उन्होंने झट से कहा- चोर की दाढ़ी में तिनका।

उनमें से एक आदमी सचमुच चोर था। उसने सोचा, शायद दाढ़ी में तिनका है, चुपके से निकाल लेता हूँ। उसने जैसे ही तिनका निकालने के लिए दाढ़ी टटोली बस काज़ी ने झट से उसे पकड़ लिया। असल में चोर होने के कारण उस के मन में डर तो था ही, इसीलिए डर में वह ऐसा काम कर बैठा कि वह पकड़ा गया। काज़ी साहब ने तो यों ही तीर फेंका था, पर वह ठीक निशाने पर लग गया। अब समझे, चोर की दाढ़ी में तिनका कैसे होता है।

 

देखना ऊँट किस करवट बैठता है

कहते हैं, एक समय में एक बर्तन बनाने वाला कुम्हार और एक फल-तरकारी बेचने वाला कुँजड़ा गाँव में पास-पास रहते थे। एक दिन दोनों को बाजार में अपना सामान बेचने जाना था। दोनों ने एक ऊँट साँझे में किराये पर लिया और ऊँट के एक-एक तरफ अपना-अपना सामान लाद लिया। रास्ते में, जाते-जाते बीच में ऊँट अपनी लंबी गर्दन घुमा कर कुँजड़े के साग-पात में से कुछ खींच लेता। इस पर कुम्हार हँसता। कुँजड़ा कहता- चलो देखते हैं, ऊँट किस करवट बैठता है।

      बाजार पहुँच कर बैठाए जाने पर ऊँट बोझ वाली करवट बैठा। साग-पात वैसे ही हल्का था, ऊँट के खा लेने से वह करवट हल्की हो गई थी। दूसरी तरफ बर्तन होने के कारण करवट भारी थी। ऊँट के बैठते ही कुम्हार के बहुत से बर्तन चूर-चूर हो गए। तो देखा- ऊँट किस करवट बैठता है।

  

जैसा करै वैसा भरै

 बात तो पुरानी ही है। एक बहू अपनी सास को टूटी कठौती में खाना देती थी। संयोग से एक दिन सास के हाथ से कठौती छूट गयी और फर्श पर गिर कर टूट गयी। बुढ़िया का बेटा उसी वक्त कहीं बाहर से घर आया। उसने अपनी माँ को कठौती टूटने पर एक जोर की डाँट लगाई। बुढ़िया इस मामूली से नुक्सान पर बेटे से झिड़की की उम्मीद न रखती थी। बेचारी रो पड़ी। उधर बहू बहुत खुश थी कि अच्छा हुआ, आज बेटे ने माँ की हरकतों को देख कर स्वयं ही उसे बुरा-भला कहा।

जब माँ ने बेटे से डाँटने की वजह पूछी तो उसने आँखे भर कर कहा- माँ, मैंने तुम्हें उस कठौती के फूटने पर डाँटा क्योंकि तुमने कठौती नहीं एक परंपरा तोड़ दी। वह कठौती घर में तब तक रहनी चाहिए थी, जब तक मेरी पुत्रवधु घर न आ जाती। तुम्हारी बहू जिस तरह तुम्हें तुच्छता से खाना देती है, वह मेरी बहू भी देखती। और कल वह वही कठौती अपनी सास के लिए बरतती। उस समय मेरी पत्नी को सीख मिलती कि जैसा करै वैसा भरै।

कहते हैं, यह सारी बात उस समय उस आदमी की पत्नी भी सुन रही थी। उसे अपना दुःखपूर्ण भविष्य सामने नजर आ गया। बस फिर क्या था, उसी दिन से उसने सास के प्रति अपना व्यवहार ठीक कर लिया।



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