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05.31.2008
 
कांगड़ा की लोक कथाएँ
डॉ. प्रिया सैनी

 

लोक कथाएँ हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा हैं। हमारे सभी अँचल इन लोक कथाओं से समृद्ध हैं। ये केवल कहानियाँ मात्र नहीं हैं, बल्कि ये सम्पूर्ण जीवन शैली तथा प्राचीन इतिहास का जीवंत दस्तावेज हैं। यहाँ हम हिमाचल की कुछ लोक कथाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। जो मौखिक रूप में आज भी अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं।

  1. गरली परागपुर

  2. भागसू नाग

  3. कांगड़ा -पौराणिक पृष्ठ-भूमि

  4. चिन्तपूर्णी एवं ज्वालाजी

  5. ग्वाल टीला

गरली परागपुर

हिमाचल में एक स्थान है -गरली परागपुर। इसे सूद बिरादरी की जन्मस्थली भी माना जाता है। कहा जाता है कि गरली का वास्तविक नाम वाणी था। कहानी कुछ यूँ है कि इसके पास ही एक गाँव में एक राणा के घर अति सुन्दर पुत्री ने जन्म लिया। जवान होने पर उसकी सुन्दरता के चर्चे दूर-दूर तक होने लगे। आस-पास की रियासतों के राजा उससे विवाह करने को उत्सुक थे। बात आज से लगभग ३६०-७० वर्ष पुरानी है। राणा जो उस कन्या के पिता थे, ने अपनी पुत्री का सम्बन्ध गुलेर रियासत के राजा मान सिंह से तय कर दिया।

नूरपुर रियासत के नरेश राजरूपसिंह जो उस कन्या से विवाह के लिए उत्सुक था, को विवाह के दिन की भनक लग गई। बस फिर क्या था, उसने सेना सजाई और विवाह से एक दिन पहले बारात के साथ सेना लेकर वाणी पहुँच गया। सेना के बल पर राणा को अपनी कन्या का हाथ उसके हाथ में देने के लिए विवश करने लगा। राजा की सैन्य-शक्ति के सामने राणा को सिर झुकाना पड़ा। किन्तु गुलेर नरेश से वचन तोड़ने की पीड़ा उसे भीतर ही भीतर साल रही थी। इसी पीड़ा और अपमान के वशीभूत होकर उसने बारातियों के भोजन में विष (गरल) मिला दिया।

कहते हैं, भोजन में विष मिलाने की बात का पता बारात में आए एक वाद्ययंत्र बजाने वाले वादक को चल गया। उसने राजा को सारी बात बता दी और अपनी राग-विद्या से विष का असर भी उतार दिया। राजा ने जान बचाने के बदले उसे दहेज में मिले दस गाँव देकर धन्यवाद दिया। दूसरे दिन जब असली दूल्हे गुलेर नरेश की बारात आई तो तब तक सब कुछ सम्पन्न हो चुका था। दोनों राजाओं का आपस में युद्ध हुआ, परन्तु लड़ाई की पूर्व तैयारी रखने के कारण नूरपुर के राजा की जीत हुई।

बारात को गरल (विष) देने के कारण इस स्थान का नाम गरली प्रसिद्ध हो गया। यह स्थान हिमाचल में नादौन नामक स्थान से जो सड़क अम्ब की और जाती है, से १६ किलोमीटर दूर रक्कड़ के करीब है। रक्कड़ से एक शाखा सड़क गरली परागपुर होते हुए धर्मशाला-होशियारपुर रोड से देहरा के पास सुनहेत नामक स्थान पर मिलती है। इसी सड़क पर एक किलोमीटर दूर गरली सूद नगरी है। कहते हैं - खांसी के प्रसिद्ध दवाई विक्स के निर्माता श्री अमरनाथ सूद, कभी आधे शिमले के मालिक श्री पूर्णमल सूद, शिमला के पैट्रोल पम्पों और तेल टैंकर समूह के मालिक लाला मेलाराम जी सूद सभी गरली निवासी थे। यहाँ तक कि लाहौर के प्रसिद्ध वकील रायबहादुर मोहन लाल भी गरली निवासी थे। इन सभी लोगों की शानदार हवेलियाँ कभी गरली की शान थीं। अब इन बडे तथा जीर्ण-शीर्ण हो रहे खाली मकानों में सरकारी स्कूल चल रहे हैं।   

 

भागसू नाग

धर्मशाला के मुख्य डाकघर से ११ किलोमीटर दूर बहुत ही खूबसूरत और चीड़ के वृक्षों से घिरा मैकलोडगंज शहर बसा है। धौलाधार की हरी-भरी ऊँची पर्वत श्रंखलाओं के आँचल में मैकलोडगंज से २ किलोमीटर दूर समुद्र तल से ५२०० फुट की ऊँचाई पर भागसू नाग का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर से एक पौराणिक कथा जुड़ी है।

आज से लगभग ९१०० वर्ष पहले द्वापर युग की बात है। राजस्थान में अजमेर नाम की रियासत थी। जिसमें भागसू नाम का राजा राज्य करता था। सुना है कि राजा भागसू अतीव न्यायप्रिय तथा प्रजापालक राजा था। एक बार उसके शासन काल में तीन साल तक बारिश नहीं हुई। धरती पानी के अभाव में सूख गई, उसमें दरारें पड़ गईं। भीषण अकाल पड़ने के कारण सारी रियासत में त्राहि-त्राहि मच गई। हवन-यज्ञ, पूजा-पाठ किसी काम न आए। अन्ततः राजा भागसू एक कमण्डल लेकर नंगे पाँव पानी की खोज में निकल पड़ा। पूछते-पूछाते वह कांगड़ा प्रदेश में आ पहुँचा। यहाँ आकर उसे पता चला कि १८००० फुट की ऊँचाई पर धौलाधार पर्वत के आँचल में एक झील है, जिसका स्वामी एक नाग देवता है।

कहा जाता है कि वह नाग देवता एक बहुत बड़ा तान्त्रिक था, उसने अपने तन्त्र-मन्त्र के जोर से इस झील का पानी बाँध रखा था। राजा भागसू ने नाग देवता की अनुपस्थिति में अपने तेज व तप की शक्ति से झील के पानी को अपने कमण्डल में भर लिया और अजमेर की और भागने लगा। उधर नाग देवता को पानी की चोरी का जल्द ही पता चल गया। वह भी राजा के पीछे भागा। कहते हैं, मन्दिर वाले स्थान पर नाग देवता ने राजा को पकड़ लिया और राजा से उसका कमण्डल छीनने लगा। जब राजा ने पानी की चोरी का कारण बताया तो नाग देवता द्रवीभूत हो गया और उसने कमंडल से पानी गिरा दिया। ताकि वह पूरी पृथ्वी पर बह सके और लोगों को अकाल से मुक्ति मिल सके। राजा भागसू का अपनी प्रजा के प्रति समर्पण देख कर नागराज ने कहा कि जब तक पृथ्वी रहेगी तब तक इस चश्में का नाम भागसू नाग रहेगा। इस प्रकार आज से लगभग ५०८० वर्ष पहले बने इस मन्दिर में बने इस जल प्रपात का नाम भागसू नाग, दो पराक्रमी राजाओं के नाम पर पड़ा।

 

कांगड़ा -पौराणिक पृष्ठ-भूमि

पद्म पुराण में वर्णित संदर्भ के अनुसार सागर के घर उसकी पत्नी गंगा से अतीव बलशाली पुत्र उत्पन्न हुआ। जिसका नाम जालन्धर रखा गया। इसको शिक्षा - दीक्षा असुर गुरू शुक्र ने द्वारा दी गई और ब्रह्मा ने इसे अमरत्व का वरदान दिया। आरम्भ में तो यह जालन्धर नाम का राजा, जो आकार में दैत्य जैसा था, अत्यन्त दयालु, उदार, प्रजापालक तथा अच्छा शासक था। इतना वीर कि इसने अपने पराक्रम से स्वर्ग के राजा इन्द्र को भी हरा दिया था। परन्तु इसके बाद इसे इतना घमण्ड हो गया कि यह अत्यन्त क्रूर बन गया। इसने भगवान ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव से भी लड़ना शुरू कर दिया।

ब्रह्मा से प्राप्त अमरत्व के वरदान के कारण इसे मारना भी कठिन था, क्योंकि जब कोई योद्धा तीर या तलवार से इसका कोई अंग-भंग करता तो वरदान के कारण इसका अंग स्वयंमेव जुड़ जाता। यहाँ तक कि इसका कटा सिर भी अपने आप जुड़ जाता और यह फिर से जिन्दा हो जाता। कहते हैं, जालन्धर की पत्नी वृन्दा पतिव्रता और सदाचारी स्त्री थी। इन दो शक्तियों के कारण जालन्धर को हराना नामुमकिन था। भगवान शिव तथा अन्य देवताओं ने युक्ति लड़ा कर इस प्रदेश में जगह-जगह पर गढ़े खोद कर रख लिए। जब भी कोई अंग गिरता, उसे पहले से खोदे गढ़े में दबाकर ऊपर से मिट्टी डाल दी जाती, जिससे वह दूसरे अंगों से जुड़ कर जीवित न हो सके। यह युक्ति काम कर गई। इस तरह दैत्यराज जालन्धर से देवताओं ने मुक्ति पाई।    

कहते हैं कि कांगड़ा में दैत्यराज का सिर गिरा था। इस बात की पुष्टि चन्द्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा लिखित कटोच वंशीय इतिहास में निम्नलिखित संस्कृत श्लोक से होती है -

कं गिरा दैत्य राजस्य गड़ितः, पतितः भुवि।

स देशः कंगड़ः प्रोक्तो मृतानाम् मोक्षदो हियः।।

अर्थात् जिस देश में दैत्यराज का सिर गिरा तथा दबाया गया उसे कांगड़ा कहते हैं। क्योंकि इसने असुर के अत्याचारों से देवताओं को मुक्ति दिलाई थी, अतः इसे देव भूमि भी कहते हैं, जो मरे हुए लोगों को मुक्ति देती है।

कुछ लोग मानते हैं कि यहाँ दैत्यराज का कान गिरा था, इस लिए इस स्थान का नाम कानगढ़ पड़ गया। कुछ अन्य कांगड़ा के किले का आकार कान से मिलता-जुलता मान कर इस का नाम कानगढ़ बताते हैं। उन के अनुसार यही कानगढ़ बिगड़ते-बिगड़ते कांगड़ा बन गया।

 

चिन्तपूर्णी एवं ज्वालाजी

चिन्तपूर्णी एवं ज्वालाजी यह दोनों स्थान शक्तिपीठ कहलाते हैं। भारत में जितने भी शक्तिपीठ हैं, उन सब के बनने की कहानी हम सभी जानते हैं। भगवती उमा के अपने पिता के घर यज्ञाग्नि में खुद को जला देने के कारण शिवजी क्रुद्ध होकर उमा के मृत शरीर को उठा कर त्रिलोकी में घूमने लगे। न तो उनका क्रोध कम हो रहा था और न ही उमा के जाने की पीड़ा। ऐसे में त्रिलोकी को उन के क्रोध की आग से बचाने के लिए ब्रह्मा ने ५२ तीर उमा के मृत शरीर पर चलाए। शिवजी के तेजी से भागने के कारण उमा के अंग जिस-जिस स्थान पर गिरे, वह स्थान शक्तिपीठ कहलाए। ऐसे ही दो स्थान हैं- चिन्तपूर्णी एवं ज्वालाजी। चिन्तपूर्णी नामक स्थान होशियारपुर से लगभग २५-३० किलोमीटर दूर है। कहा जाता है कि इस स्थान पर सती उमा के चरण गिरे थे एवं ज्वालाजी में जिह्वा। यह दोनों मन्दिर बहुत पवित्र एवं लोगों की श्रद्धा का केन्द्र हैं। चिन्तपूर्णी में देवी माँ पिण्डी रूप में विराजमान हैं जबकि ज्वालाजी में मन्दिर के अन्दर मध्य भाग में स्थित कुण्ड में दीवार से निकलती नीली ज्वालाएँ माँ का स्वरूप मानी जाती हैं। ये ज्वालाएँ बिना किसी ईंधन के सदियों से जल रही हैं, और आज तक इन्हें कोई बुझा नहीं पाया है। 

एक और बात चिन्तपूर्णी माता के मन्दिर के विषय में प्रसिद्ध है कि यहाँ का प्रसाद (विशेष रूप से हलवा) आगे ज्वालाजी तक नहीं जाता। इस नियम की सत्यता परखने वालों को किसी न किसी मुसीबत का सामना करना पड़ जाता है। हालाँकि ज्वालाजी का प्रसाद चिन्तपूर्णी लाया जा सकता है, पर चिन्तपूर्णी का प्रसाद गलती से भी ज्वालाजी ले जाया नहीं जा सकता। कुछ दुस्साहसी लोग कई बार इस सत्य को चुनौती देते हैं और हर बार इस सत्य की परख करने वाले मुँह की खाते हैं और देवी माँ की शक्ति के सामने नतमस्तक होकर माफी माँगते हुए लौटते हैं।

 

ग्वाल टीला

पालमपुर को हमीर पुर से मिलाने वाली सड़क पर ११ किलोमीटर दूरी पर स्थित भवारना से १७ किलोमीटर आगे जाने पर थुरल नामक स्थान आता है। इसी थुरल से दो किलोमीटर दूर बरसाती नदी के पार स्थित है- ग्वाल टीला। यहाँ इस स्थान का पता इतना विस्तार से बताने का मेरा मकसद केवल इस स्थान की विश्वस्नीयता को सुनिश्चित करना है।

यह घटना कब की है, यह तो कोई नहीं बता सकता। पर यह घटना सत्य है और इस के गवाह हैं इस क्षेत्र के भोले-भाले भेड़ बकरी चराने वाले लोग, जिनकी दंत कथाओं में यह कहानी न जाने कब से शामिल है। कहानी बस इतनी सी है कि इस ग्वाल टीले के पास से एक बारात डोली ले कर गुजर रही थी। पुराने समय के लोग पैदल ही पालकी ले कर जा रहे थे। चढ़ाई चढ़ कर आ रहे लोग और कहार हाँफने लगे थे, सो कुछ देर आराम करने टीले के नीचे पीपल के वृक्ष की छाया में बैठ गए।  साथ आई औरतों ने दुल्हन को ताजी हवा देने के लिए डोली के सब परदे उठा दिए। पास ही टीले के ऊपर एक लड़का गाएँ-भैंसें चरा रहा था। चरवाहे को यहाँ ग्वाला भी कहते हैं।

तो बात कुछ यूँ हुई कि खूबसूरत लाल दुपट्टे का घूँघट काढ़े बैठी दुल्हन को देख कर उस ग्वाले के मुँह से बेसाख्ता निकल गया- आर जरारी पार जरारी, लाल घुंडे वाली मेरी लाड़ी। अर्थात् इधर झाड़ी उधर भी झाड़ी, बीच बैठी लाल घूँघट वाली मेरी लाड़ी (पत्नी)। बात इस तरह कही गई कि नवविवाहिता ने सुना, उस की सखियों ने सुना, और करते करते बात दूल्हे और बाकी बारातियों तक जा पहुँची। उन में नोक-झोंक आरम्भ हो गई। किसी ने ग्वाले को ताना मारते हुए कहा कि इस सुन्दर लाड़ी का इतना ही शौक है तो इस टीले से छलाँग लगा दे। देखें तेरा प्रेम सच्चा भी है या नहीं। बात मजाक में कही गई थी। पर चरवाहे को भी जाने क्या सूझा उसने आव देखा न ताव, झट ऊँचे टीले से गहरी खड्ड में छलाँग लगा दी। जब तक कोई समझ पाता, ग्वाले के प्राण पखेरू उड़ गए थे।

अब तो बाराती घबरा गए। वे अपना डेरा उठा कर वहाँ से भागने की तैयारी करने लगे। लेकिन हद तो तब हो गई जब दुल्हन ने वहाँ से जाने से इन्कार कर दिया। वह कहने लगी कि ऐसे सच्चे प्रेमी को छोड़ कर वह नहीं जा सकती, वह तो उस ग्वाले की लाश के साथ ही सती हो जाएगी। लोग उसे समझाने लगे, परिवार की इज्जत का वास्ता भी दिया। पर लड़की ने तो जैसे जिद पकड़ ली। अभी लोग इस समस्या का हल सोच ही रहे थे कि दुल्हन जरा सा मौका पाकर भाग निकली और जब तक लोग कुछ समझते उसने भी उसी टीले से कूद कर जान दे दी।

अजीब सी बात थी कि दो लोग तो एक दूसरे को जानते तक नहीं थे, जिन्होंने एक दूसरे को देखा भी नहीं था, इस तरह एक दूजे के लिए प्राण दे बैठे जैसे एक दूजे के लिए ही बने हों। बारात का जाना रुक गया। आने जाने वाले भी इन अन्जाने प्रेमियों के सम्मान में रुक गए। उन्होंने इन अपरिचित प्रेमियों का दाह संस्कार एक ही चिता पर रख कर दिया। बाद में उस स्थान पर गोल-गोल पत्थरों की समाधि बना दी गई। जो भी इस राह से गुजरता उन प्रेमियों की श्रद्धांजलि स्वरूप एक पत्थर यहाँ जरूर लगा देता। यह कौन सी परम्परा थी क्या था किसी को नहीं पता, कोई कुछ समझ नहीं पाया......?

क्या आप कुछ समझ पाए...???

 


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