अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख पृष्ठ
02.05.2012

वे चाहते
वे मज़ारों पर चढ़ाकर , पुष्प जीना चाहते,
छीन ख़ुशियाँ खुद ख़ुशी का है ख़ज़ाना चाहते।

वार करते खंजरों से, तीर से तलवार से,
शांति के पथ के लिए फिर , वे बहाना चाहते।

दूसरों के सब घरों को , वे सभी देते जला ,
और फिर अपने लिए वे आशियाना चाहते।

आम जनता पर सितम वे रोज़ ही ढाते रहे ,
प्यार का ख़ुद के लिए फिर वे ठिकाना चाहते।

इस जहां से गुम हुए गाँधी, जवाहर, तिलक सब,
और जो पैदा हुए जग को डराना चाहते।

गुम हुई अपनी पुरानी प्यार की जो भूमि थी,
स्वर्ण की चिड़िया इसे हम फिर बनाना चाहते।

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें