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02.13.2009
 

 मेरे हिस्से में ये टूटा हुआ अंजुम क्यों है
प्रेमचंद सहजवाला


मेरे हिस्से में ये टूटा हुआ अंजुम क्यों है
मेरी सब रौशनी तरीकियों में गुम क्यों है

बेरुख़ी तेरी बुरी क्यों नहीं लगती हमको
दर्द में ऐसा पुरकशिश सा तरन्नुम क्यों है

यूँ तो रौन है बहुत मेरे चार सू लेकिन
हाले-दिल हो गया इतना मेरा गुमसुम क्यों है

तुम से उम्मीद नहीं कोई हमें उल्फ़त की
फिर भी यह दिल में उमता सा तलातुम क्यों है


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