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ISSN 2292-9754

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05.31.2017


 इंसान की इंसानियत

गाँव से शहर को जाते मुख्य रास्ते पर एक घना एवं छायादार आम का पेड़ लगा हुआ था, जिसके नीचे एक बड़ा चबूतरा बन हुआ था। उस रास्ते से गुज़रा हर मुसाफ़िर कुछ समय के लिए इस वृक्ष की छाया का आनंद ज़रूर लेता। पेड़ के नीचे बने आरामदायक चबूतरे पर बैठकर अपने सफ़र की थकान मिटाता, सुस्ताता और फिर अपने रास्ते चल देता।

अक्सर लोग इस पेड़ के नीचे बैठकर घण्टों बातें किया करते। एक दूसरे की पीठ पीछे बुराई करते किन्तु पेड़ सदैव उनकी सेवा में तत्पर रहता। उसे इंसान की बातों से कोई वास्ता नहीं था। वह स्थिर खड़ा अपनी शाखों से निरंतर अतिथियों को हवा एवं अपने पत्तों से छाया देने में कोई कसर नहीं छोड़ता।

वैसे तो पेड़ को लोगों की बातें सुनने का कोई शौक़ नहीं था। ऊपर से वह "प्राईवेसी" का भी समर्थक था।

एक दिन एक तोता काफ़ी समय से उस पेड़ पर बैठा यह सब दृश्य देख रहा था। किस प्रकार से आम का पेड़ मुसाफ़िरों की सेवा में समर्पित था। तोते को एक हरकत सूझी, उसने पेड़ को छेड़ते हुए पूछा- "क्यों भाई बड़े भले बनते फिरते हो। लोगों को छाया देते हो, शीतल हवा देते हो, थके मुसाफ़िर को दो पल सुकून के देते हो।"

"तो क्या हुआ?" तोते की बात सुन पेड़ ने उसकी तरफ़ ध्यान दिये बिना ही कहा।

"सुना है मनुष्य बड़ा कृतज्ञ प्राणी है, तो तुम्हारी सेवा के बदले कृतज्ञता से तुम्हारा भण्डार तो भर देता होगा?" तोते ने सर खुजलाते हुए पूछा।

"तुम कहना क्या चाहते हो "मिट्ठू"?" पेड़ को तोते का इस तरह मज़ाक उड़ाना पसंद नहीं आया। उसने भी तपाक से तोते को "मिट्ठू" कह कर अपना कलेजा शांत किया।

"लगता है लोगों को शीतलता देते-देते तुम बड़े चिड़चिड़े हो गये हो यार। मैं तो मज़ाक कर रहा था।" तोते को इस प्रकार से पेड़ द्वारा चिढ़ना अज़ीब लगा। उसने सोचा चलो छोड़ो कही ज़्यादा चिढ़ जायेगा तो अपनी डालें हिलाकर मुझे ही भगा देगा।

पेड़ ने भी स्वयं को सँभाला। अक्सर आस-पास के पेड़ों की बिरादरी में इस पेड़ की बड़ी इज़्ज़त थी। सभी पक्षी उसके धैर्य की प्रशंसा करते थे। यहाँ तक कि सभी वृक्षों ने उसे अपना नेता भी चुन लिया था।

"ऐसी बात नहीं हैं प्यारे," पेड़ ने शांत होकर लंबी साँस लेते हुए कहा, "लोग यहाँ आकर अपनी सारी मुसीबतें भूल जाते हैं। शांति से बैठकर कुछ पल बिताते हैं। ख़ुश हो जाते हैं। यही मेरे लिए पर्याप्त है," पेड़ ने कहा कि इतने में गाँव के दो बुज़ुर्ग उसके नीचे चबूतरे पर आकर बैठ गये।

पेड़ एवं तोता दोनों ही चुप हो गये। पेड़ अपना पूरा ध्यान उन्हें अच्छी से अच्छी छाया देने में लगाने लगा। अपनी डालों से उन तक शीतल हवा पहुँचाने लगा। पेड़ भूल गया था कि तोता अभी भी बैठा हुआ है।

तोते ने सोचा "आखिर ये इतनी शिद्दत से मुसाफ़िरों की सेवा करता हैं। भला आज मैं भी रुक कर देखूँ, लोगों की क्या प्रतिक्रिया होती है।"

नीचे बैठे दोनों बुज़ुर्ग आपस में बातें करने लगे - "आजकल मौसम का कोई ठिकाना नहीं। कब सर्दी, कब वर्षा, कब गर्मी पड़ने लग जाती है?" एक बुज़ुर्ग ने अपनी जब से पुरानी आधी जली हुई बीड़ी निकालते हुए कहा।

"हाँ! हमारे ज़माने में क्या दिन हुआ करते थे। जब सर्दी पड़ती थी तो सिर्फ़ सर्दी ही पड़ती थी। अब देखो ना, कल ही बारिश आयी थी और आज कितनी तेज़ गर्मी पड़ रही है," दूसरे बुज़ुर्ग ने अपनी जेब से माचिस निकाल कर पहले की तरफ़ कर दी।

"पेड़ भी अब वैसी छाया कहाँ देते हैं? अब इसे ही देख लो कितना मोटा हो गया है परन्तु ठीक से छाया तक नहीं दे रहा," पहले वाले बुज़ुर्ग ने बीड़ी सुलगाकर धुआँ पेड़ की तरफ़ छोड़ते हुए कहा।

दोनों की बातें सुन पेड़ ने अपने पत्ते जल्दी-जल्दी हिलाने शुरू कर दिये।

"हाँ!" दूसरा बुज़ुर्ग उस पेड़ की तरफ़ देखते हुए बोला, "देखो तो सही कितना घना है फिर भी ठिक से छाया नहीं दे रहा। ऐसे पेड़ तो धरती पर बोझ हैं।"

"इसको तो काटकर लकड़ी जलाने के काम में लाना चाहिए, कितना मोटा पेड़ है?" दूसरे ने पेड़ के तने की तरफ़ देखते हुए कहा। पेड़ ने जैसे ही यह बात सुनी उसके दिल की धड़कन बढ़ गयी किन्तु उसने हवा करना जारी रखा।

दोनों बुज़ुर्ग कुछ देर तक उस पेड़ की बुराई करते रहे। तोता उनकी बातें ध्यान से सुनता जा रहा था। फिर कुछ देर बाद दोनों वहाँ से उठे। उनमें से एक बुज़ुर्ग उस पेड़ की डाल की तरफ़ बढ़ा जो काफ़ी नीचे तक लटकी हुई थी।

तोते को लगा अब शायद यह बुज़ुर्ग जाते-जाते इस पेड़ को कुछ तो धन्यवाद दे सकता है किन्तु दूसरे ही पल उसने देखा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं।

उस बुज़ुर्ग ने पेड़ की वह टहनी यह कहते हुए मोड़कर तोड़ दी कि "मेरी बकरियों को खिलाने के काम आयेगी।"

कुछ ही देर में दोनों बुज़ुर्ग वहाँ से आगे निकल गये। पेड़ उनकी बातें सुनकर थोड़ा उदास हो गया किन्तु अभी तक धैर्य बनाए रखा। उसे अभी भी नहीं पता था कि तोता चुपके से यह सब सुन रहा था।

तभी अचानक एक पुरुष व एक महिला मुसाफ़िर जो दिखने में पति-पत्नी लग रहे थे, उस पेड़ के नीचे आकर बैठे, महिला बोली - "अपनी माँ को समझा देना मुझसे ताने में बातें नहीं करे!" महिला की आवाज़ थोड़ी तेज़ थी, "मैं जब से ब्याह के आई हूँ तब से महारानी साहिबा के बड़े ठाठ हैं। बना-बनाया खा-खाकर इस पेड़ की तरह मोटी होती जा रही है। ऊपर से ताने मारना नहीं छोड़ती," बोलते हुए औरत की साँसें फूल गयीं।

"तुम तो शांत हो जाओ शांता की माँ। तुम क्यों इस पेड़ की तरह अकड़ू बन रही हो? घर-परिवार में छोटी-बड़ी बातें होती रहती हैं," आदमी ने पत्नी की बातों का रटा-रटाया जवाब देते हुए पेड़ की तरफ़ देखा।

उसे एक आम नीचे लटकता हुआ दिखाई दिया। उसने खड़े होकर उस डाल को पकड़ा जिस पर आम लटक रहा था। ज़ोर लगाने से आम समेत पूरी डाल टूट गयी और आदमी नीचे गिर पड़ा। उसकी इस हरकत को देखकर औरत बोली- "कितने बड़े हो गये हो पप्पू के पापा पर अभी तक अक़ल नहीं आई। डाली टूटी तो कोई बात नहीं पर अपने हाथ-पैर तोड़ देते तो।"

आदमी ने गिरा आम उठाते हुए विजयी मुस्कान में कहा, "अरे तुम तो पगला गयी हो। किसी ज़माने में हमने पत्थर के एक निशाने से इसी पेड़ से कई आम तोड़े थे, किन्तु अब इस पेड़ में वह बात नहीं रही।"

पेड़ निरंतर उनकी बातें सुनते हुए अपने पत्तों से हवा करते जा रहा था। बगल में बैठा तोता यह दृश्य चुपचाप देख रहा था। उसने स्वयं को छुपाये रखा। क्योंकि अगर पेड़ को पता चल जाये कि तोता यह सब सुन रहा है तो पेड़ कब का तोते को उड़ा दे।

कुछ देर पति-पत्नी लड़ते रहे, फिर उठकर वहाँ से चल दिए। उनके जाते ही पीछे से कुछ लड़कों का झुण्ड उस पेड़ की तरफ़ आया। सभी ने आस-पास से पत्थर उठाये एवं चुन-चुन कर पेड़ पर लगे आम के फलों पर प्रहार करना शुरू किया। एक पत्थर का किनारा तोते को छूकर निकला। तोते के "तोते उड़ गए" किन्तु आज उसने ठान रखी थी कि वह अंत तक डटा रहेगा।

लड़कों के चले जाने के पश्चात् एक चरवाहा अपनी भेड़ों को चराते हुए आया। कुछ देर तक पेड़ के नीचे बैठा। जब देखा कि उसकी सारी भेड़ें वहीं आस-पास पेड़ की छाया में सुस्ता रही हैं तो चरवाहा भी सो गया। पेड़ की शीतल छाया में उसकी झपकी लग गयी। तोते ने सोचा यह ज़रूर पेड़ का धन्यवाद देगा, इसी प्रतीक्षा में छुपकर बैठा रहा।

जब चरवाहे की आँखें खुली तो उसने स्वयं को तरो-ताज़ा महसूस किया। आस-पास चरती अपनी भेड़ों को देखा फिर आम के पेड़ की तरफ़ देखा। तोते ने सोचा बस अब शुक्रिया अदा करने ही वाला है तभी अचानक चरवाहा उठ खड़ा हुआ।

उसने बाँस की लकड़ी हाथ में ली जिसके ऊपरी छोर पर एक दराती बँधी हुई थी। लकड़ी से पेड़ के नीचे वाली टहनियों को काटने लगा एवं ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ देकर अपनी भेड़ों को पास बुलाने लगा।

तोते से यह दृश्य देखा नहीं गया। उसने सोचा चलो जाते-जाते ही सही चरवाहा पेड़ को कृतज्ञता तो अर्पित करेगा। जब चरवाहा रवाना हुआ तो एक बार फिर पेड़ की तरफ़ देखा। अब तोता ख़ुश था क्योंकि उसे पूरा यक़ीन हो चला था कि यह इंसान धन्यवाद ज़रूर देगा।

चरवाहे ने एक पत्थर उठाया एवं ज़ोर से आम पर निशाना लगाया। आम नीचे गिर गया, उसने उठाया एवं मुँह लगाकर चखा, तो वह अभी भी खट्टा था। चरवाहे ने ग़ुस्से में आकर वही आम उसी पेड़ पर दे मारा एवं आगे बढ़ गया।

तोते ने देखा पेड़ की आँखों से आँसू बह रहे थे पर वह अभी भी चरवाहे को हवा कर रहा था। तोते से भी अब रहा नहीं गया, वह भी रो पड़ा। इंसान की इंसानियत को देखकर।


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