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06.03.2012


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

Kailash

कैलाश-मानसरोवर यात्रा

जब मैं कोई दस बारह साल की थी तो उस समय बड़े आकार के धर्मयुग या साप्ताहिक-हिंदुस्तान आते थे (दोनों लगभग एक ही आकार के होते थे) जिसमें मैंने एक यात्रा संस्मरण कैलाश-मानसरोवर यात्रा पर पढ़ा था’ जिसकी तस्वीरों की झलक मुझे आज तक याद है। तब मैंने भी कल्पना की थी कि काश! मैं भी वहाँ जाऊँ। उस सुप्त-इच्छा को कैसे साकार किया यही कहना चाहती हूँ।

जाने का कार्यक्रम कैसे बना

बात २००९ के अगस्त के महीने की है। एक दिन मैं खाली समय में अपनी सखी के साथ बैठी कहीं तीर्थ-स्थल पर जाने के बारे में चर्चा कर रही थी कि तभी पवित्र कैलाश-मानसरोवर यात्रा की बात चली। मेरा मन वहाँ जाने के लिए उड़ने लगा पर मेरे पास पासपोर्ट नहीं था। बस मैंने उसी दिन पासपोर्ट बनवाने के लिए विभागीय औपचारिकताएँ पूरी करने हेतु आवेदन कर दिया। सभी कार्यों को पूरा करते-करते आखिरकार १६ फरवरी २०१० को पासपोर्ट भी मिल गया, पासपोर्ट मिलते ही उसी दिन यात्रा हेतु विदेश-मंत्रालय में ऑन लाइन पंजीकरण भी करा दिया। आवेदन-पत्र की हार्ड कॉपी भी विदेश-मंत्रालय को भेजनी थी जिसके साथ एक अपना पता लिखा पोस्टकार्ड भी पावती के लिए संलग्न करवाया गया था, वह सब भी उसी दिन स्पीडपोस्ट से भेज दिए। कई दिन बीतने पर जब पावती पोस्टकार्ड वापिस नहीं आया तो मैंने संबंधित विभाग में फोन करके पूछा कि मेरा फॉर्म मिल गया कि नहीं, तब खुशी से उछल गयी जब विभागयीय-व्यक्ति ने बड़ी ही सधी भाषा में मेरे आवेदन प्राप्ति की बात स्वीकार की और पोस्टकार्ड-पावती कुछेक दिन में भेजे जाने का आश्वासन भी दिया। फिर दो या तीन दिन बाद पावती पोस्टकार्ड मिल गया। तब जाकर जान में जान आयी कि अब तक की मेहनत सफल रही। पंजीकरण तो बिल्कुल सही हो गया है।

इसके बाद तो और कोई बात सोचने का मन नहीं करता था। बस यही दुविधा रहती थी कि ड्रा में मेरा नाम आएगा कि नहीं।

मंत्रालय ने मात्र ड्रा निकालने की सूचना नेट पर लिख दी। इकतीस मार्च को ड्रा निकला। अगले दिन मैंने फिर मंत्रालय में फोन किया अपने बारे में जानने के लिए। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा जब वहाँ से किन्हीं महिला कर्मचारी ने बताया कि मेरा नाम ड्रा में निकल आया था। मेरा नाम दूसरे बैच के यात्रियों में था जो सात जून को दिल्ली से रवाना होना था।

कुछ दिन में ही विदेश-मंत्रालय से डाक द्वारा दूसरे बैच के यात्रा-दल में मेरा नाम होने की सूचना मिली, साथ ही पाँच हज़ार रुपए का ड्राफ़्ट भी मंगवाया गया था, जो मैंने निश्चित समयावधि में स्वीकृति-पत्र के साथ भेज दिया। (जो लोग यह ड्राफ़्ट निश्चित समयावधि में नहीं भेजते हैं उनकी यात्रा हेतु अस्वीकृति मान ली जाती है) यात्रा-कार्यक्रम चार जून को मेडिकल जाँच से प्रारंभ होकर दो जुलाई को वापिस दिल्ली में समाप्त होना था।

छोटी-छोटी बात पर मन चिंतित सा हो जाता था, कि कहीं किसी ग़लती या भूल से कहीं जाना रुक न जाए। अब सोचती हूँ कि कैसे हम अधीर हो जाते हैं जब मन कुछ ऐसे काम की सोचता है, तभी से तैयारी शुरु हो गयीं। सबसे पहले अपने विभाग से विदेश जाने की आज्ञा ली। उसके बाद विदेश-मंत्रालय द्वारा भेजी गयी लिस्ट के आधार पर सामान इकट्ठा करने लगी। कोई सामान न रह जाए! इतना ही नहीं प्रतिदिन टहलने को दौड़ने में बदल दिया और सुबह-शाम व्यायाम का समय भी बढ़ा दिया, रोज बिना नागा योगा करने लगी ताकि मेडिकल जाँच में फेल न हो जाऊँ...।

यूँ तो विदेश-मंत्रालय की साइट पर संपूर्ण ब्यौरा उपलब्ध था, पर मई में विदेश-मंत्रालय से यात्रा संबंधित रंगीन-चित्रमय पुस्तिका तथा संलग्न कागजातों और कार्यक्रम की विस्तृत सूचना पुनः मिली। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हमें सात जून को जाना था, पर उससे तीन दिन पहले चार और पांच जून को मेडिकल-जाँच होनी थी और छः जून को ग्रुप-वीज़ा मिलने के साथ-साथ अन्य औपचारिकताएँ भी पूरी होनी थीं। एक ओर तो खुशी बढ़ती जा रही थी पर दूसरी ओर मन में डर सा बैठ गया था कहीं उस समय अनफिट न हो जाऊँ। (क्योंकि उस समय अचानक किसी बीमारी से ग्रस्त होने पर भी रोकी जा सकती थी।)

क्रमशः --


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