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01.27.2015


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

Kailash

अट्ठाइसवाँ दिन/ उनतीसवाँ दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

धारचूला से जागेश्वर
01/7/2010 अट्ठाइसवाँ दिन
धारचूला>मिरथी>पाताल-भुवनेश्वर>जागेश्वर

धारचूला से जागेश्वर

सुबह साढ़े चार बजे आँख खुल गयी। मैंने बाथरूम में गीजर ऑन कर दिया, और लगेज खोलकर दो जोड़ी कपड़े निकाल लिए एक तभी पहनने के लिए और एक अगले दिन के लिए क्योंकि अब लगेज दिल्ली जाकर ही मिलना था।

स्नान-ध्यान करके उतारे हुए कपड़े और अन्य सामान रेनकोट इत्यादि भी बैग्स में पैक कर दिए। नलिना नहाने गयीं तो मैं उनके और अपने लिए नीचे भोजन कक्ष से चाय लेने चली गयी।

वहाँ मेरा पोर्टर भी काम कर रहा था। मुझे देखते ही नमस्ते की और चाय लेकर मेरे साथ कमरे तक पहुँचाने आ गया। मैंने उससे लगेज के बोरों को रस्सी से बंधवाकर नीचे रिसेप्शन-हाल में पहुँचवा दिया।

थोड़ी देर में मैं, नलिना, स्नेहलता और वीना मैसूर नीचे आए, भोजन-कक्ष में और भी कई यात्री चाय पी रहे थे हम भी दोबारा चाय लेकर वहीं कुर्सियों पर बैठ गए। थोड़ी देर में नाश्ता लग गया। छोले-आलू की चटपटी सब्जी, दही, अचार, पूरी और मीठी सैवैंयाँ – सभी ने छ्ककर खाया अब कोई डर नहीं था बीमार होने का।

नाश्ता करके हमने देखा कि कुछ यात्री रिसेप्शन-काऊँटर पर कुछ खरीददारी कर रहे थे, हम भी वहाँ पहुँच गए और तीन टीशर्ट और कुमाऊँ के दर्शनीय-स्थलों के कुछ पोस्टर्स खरीद लिए।

एलओ सहित सभी यात्री बाहर अहाते में एकत्र हुए। गेस्टहाऊस के कर्मचारियों को बुलाया उनका धन्यवाद किया और स्नेह से लिफ़ाफ़े भेंट कर उनसे विदा ली।

भोले के जयकारे लगाए और आते समय की तरह ही अपनी-अपनी बस में बैठ गए। हमारी बस में कु.मं.वि.नि. का गाईड था तो दूसरी में एलओ स्वयं।

बस काली नदी के किनारे चलती हुई मिरथी की ओर जा रही थी।

मिरथी से विदाई

साढ़े आठ बजे हम मिरथी जाते समय एक दोराहे पर पहुँच गए। जहाँ से मिरथी जाने वाली सड़क पर आयटीबीपी की लाल झंडा लगी जीप खड़ी थी। वह जीप हमें लेने आयी हुई थी। हमारे ड्राइवर को अपने पीछे आने का इशारा करके आगे-आगे चलने लगी।

पौने नौ बजे हम मिरथी के आयटीबीपी बेस कैंप में प्रवेश कर गए। गेट से ही रिसीव करने के लिए रास्ते के दोनों ओर सिपाही पंक्तिबद्ध होकर खड़े थे तो कमांडर इन चीफ़ श्री निंबाड़ियाजी स्वयं स्वागत के लिए उपस्थित थे।

स्वागत-कक्ष तक जाने के लिए रास्ते में लाल कालीन बिछे थे। जवान ऐसे भाग-भागकर ध्यान रख रहे थे मानो कोई वीआईपी आए हों। हम सब उनके स्वागत से पुनः बहुत गदगद थे।

सबसे पहले कोल्डड्रिंक, फिर गर्मागर्म जलेबी, पनीर-टिक्का, मिक्स पकौड़े मूंग की दाल का हलवा और चाय-कॉफ़ी सभी कुछ सुंदर ढ़ंग से परोसा गया था। जवान बड़े आदर और स्नेह से ज़िद्द करके खाने को कह रहे थे।

खाते समय वहीं एलसीडी पर हमारी यात्रा के सीडी भी दिखाई जा रही थी। यात्री दोनों का आनंद उठा रहे थे।

जलपान के बाद सभा-कक्ष में एकत्र हुए जहाँ आयटीबीपी के विभिन्न विभागों (जैसे संचार, चिकित्सा, सुरक्षा इत्यादि) के अफ़सरों ने संबोधित किया और अपने-अपने कार्यों की समीक्षा की। प्रत्येक यात्री से निजी अनुभव के आधार पर निश्चित परफ़ोर्मा पर यात्रा-संबंधी फ़ीड बैक लिया।

हम आयटीबीपी के हृदय से आभारी हैं जिंहोने यात्रा-काल में प्रतिदिन हमारे परिवार-जनों को ई-मेल भेजकर हमारी कुशल-क्षेम बतायी।

तत्पश्चात श्री निंबाड़ियाजी ने पूरे दल की यात्रा निर्विघ्न पूर्ण करने की बधाई दी और कै.मा.यात्रा पूर्ण करने पर सभी को अपने हाथों से एक-एक पीतल का बैच, अपनी स्वयं की संपादित पुस्तक "कुमाऊँ और कैलाश एक संस्कृति और सत्य" और दल का ग्रुप फोटो भेंट किया। हम सब उनके हाथों से इतने सम्मान को पाकर फूले न समा रहे थे।

यात्री-अनुभव वर्णन के अंतर्गत मैंने और सहयात्री श्री सिंह ने अपनी बात रखी। मैंने आयटीबीपी के सहयोग को यात्रा पूरी कराने का श्रेय दिया पर यात्रा का रास्ता ठीक कराने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

इसके बाद एलओ ने आभार प्रकट करते हुए आयटीबीपुलिस-बल की सातवीं वाहिनी की सेवा और सहयोग हेतु सराहना की; अपने दल की ओर से कुछ धन राशि जवानों को मीठा मुँह करने के लिए सप्रेम भेंट दी और कुछ राशि उन स्कूली बालिकाओं के लिए भी दी जिन्होंने जाते समय बड़े भावपूर्ण ढंग से हम सब का स्वागत किया था और हमारा हौंसला बढ़ाया था।

अंत में पुनः श्री निंबाड़िया जी ने सभी से पवित्र कैलाश-यात्रा पर जाने के लिए लोगों को प्रेरित करने की सलाह दी और हम सब को ससम्मान विदा किया।

लगभग ग्यारह बजे हम बसों में बैठकर मिरथी से चल पड़े। उतराई और चढ़ाई वाले रास्ते पार करते हुए तीन बजकर पचास मिनट पर हम पाताल-भुवनेश्वर पहुँचे।

पाताल-भुवनेश्वर एक प्राचीन गुफा है, जिसका प्रवेश-स्थान बहुत छोटा है। बहुत मोटे और लंबे-चौड़े या साँस फूलने से परेशान लोग वहाँ घुस नहीं पाते हैं।

हमारे दल से भी कई लोग अंदर नहीं गए, कई को पुजारी ने ही न जाने की सलाह दी।

हम तो अंदर चले गए और लगभग चालीस मिनट अंदर ही पूरी गुफ़ा देखते रहे; सभी के साथ पाताल-भुवनेश्वर की पूजा की और शिवलिंग पर जल चढ़ाया।

पाताल-भुवनेश्वर के पास में ही कुमंवि निगम के गेस्ट-हाऊस में हमारे दोपहर के भोजन का प्रबंध था, जहाँ सुस्वादु ताज़ा गर्मा-गर्म लंच किया और आगे बढ़ चले।

साढ़े चार बजे हमारी बसें जागेश्वर के लिए चल पड़ीं। शुरू में तो सबने खाना खाया था तो सो गए। फिर आपस में बातचीत करते रहे पर बस कहीं भी न रुक रही थी। हम सब सोचते रहे थे कि अब रुकेगी, तब रुकेगी, पर बस वाला गोल-गोल रास्तों पर घुमाए जा रहा था।

आठ बजे के आसपास यात्रियों ने शोर मचाकर बस रुकवायी तब जाकर लोग लघुशंका से निपटकर आए। बस में बैठे-बैठे जी घबराने लगा। सभी बहुत बेचैन होने लगे पर क्या करते थके हारे बैठे रहे। हम सब बार-बार गाईड से पूछते "कितनी दूर और है?" तो वह हर बार "थोड़ी सी दूर और है" कहकर टाल देता।

रात के अँधेरे में ड्राइवर पहाड़ी रास्तों पर लगातार बस दौड़ा रहा था। हम सब की हिम्मत जवाब दे चुकी थी पर ड्राइवर की हिम्मत को देखते हुए मौन थे।

रात को साढ़े ग्यारह बजे जब बस रुकी और गाईड ने कहा "जागेश्वर पहुँच गए हैं, सामने गेस्ट हाऊस है सभी उतरकर पहुँच जाए" हम अपना बैग उठाकर नीचे उतरे तो घुटने बिलकुल जाम हो गए थे, थकान से शरीर निढ़ाल हो रहा था सो एलओ ने जैसे ही कमरे बताए हम खाना बिना खाए ही अपने कमरे में जाकर जूते उतार कर बिस्तर पर पड़कर सो गए।

जागेश्वर से दिल्ली
2/7/2010 उनतीसवाँ दिन
जागेश्वर से दिल्ली
जागेश्वर>अलमोड़ा>काठगोदाम>दिल्ली

सुबह चार बजे आँख खुल गयी, मैं उठी और दैनिकचर्या से निपटकर स्नान हेतु कपड़े निकालने लगी तबतक नलिनाबेन इत्यादि भी जाग गयीं और तैयार होने लगीं।

पाँच बजे के आस-पास हम तैयार होकर लगभग सौ मीटर की दूरी पर बने अति प्राचीन जागेश्वर मंदिर पहुँच गए। वहाँ आरती शुरू होने वाली थी हम भी आरती में सम्मिलित हो गए, प्रभु के चरणों में ध्यान लगाया और प्रसाद ग्रहण किया।

मंदिर में छोटे-बड़े कुल एक सौ आठ देवालय बने हुए हैं। सभी के अलग-अलग पुजारी हैं। मुख्य मंदिर पर दारुकवन ज्योतिर्लिंग लिखा था हमने वहाँ जलाभिषेक किया और चंदन लगाकर भगवान शंकर की आराधना की। समस्त प्रागंण में घूमकर सभी मंदिरों में दर्शन किए।

मंदिर से वापिस गेस्ट-हाऊस आए; आलू के पराठे, अचार और दही का नाश्ता किया और चाय पी।

गेस्ट-हाऊस के रिसेप्शन पर ही कुमविनि की ओर से ऊनी वस्त्रों की बिक्री हो रही थी। हमने जल्दी से वहाँ से तीन स्वेटर और एक शॉल खरीदी और एलओ का इशारा मिलने पर बस में जाकर बैठ गए।

शंकर भगवान की जय के साथ छः बजे बस चल पड़ी। धन्य था वह ड्राइवर जो स्वयं इतना थका था पर बीते कल हुई यात्रियों की परेशानी को समझते हुए सभी के साथ बहुत ही सकारात्मक बर्ताव कर रहा था।

भीमताल से होते हुए हम सभी यात्रियों ने साढ़े सात बजे अल्मोड़ा के बाज़ार में प्रसिद्ध बाल मिठाई और बुरांस के शर्बत की बॉटल्स खरीदी और आगे बढ़ गए।

जैसे-जैसे बस नीचे की ओर आ रही थी तापमान बढ़ता जा रहा था, गर्मी महसूस होने लगी थी।

लगभग डेढ़ बजे हम काठगोदाम गेस्ट हाऊस पहुँचे, जहाँ स्थानीय लोगों ने भोले के जयजयकार के बीच फूलमालाओं से स्वागत किया; शर्बत पिलाकर हम सब को अंदर ले जाया गया, जहाँ कुमंविनि के दफ़्तर से सभी को कैलाश-मानसरोवर यात्रा पूर्ण कर वापिस आने के सर्टिफ़िकेट मिले और भोजन कक्ष में जाकर सुस्वादु भोजन किया।

ढाई बजे एअलो ने सभी से बस में बैठने को कहा। यहाँ से हमें वातानुकूलित डीलक्स बस में बैठाया गया। एक तवेरा गाड़ी भी खड़ी थी, एलओ ने शुभ-कामनाओं के साथ हम सब से विदा ली और उसमें जाकर बैठ गए।

तीन बजे बस चल पड़ी। आरामदायक स्थिति मिलते ही अधिकांश यात्री सो गए। हम खिड़की से बाहर झांक रहे थे।

थोड़ी देर बाद मैंने, जुनेजा, मधुप और बिंद्राजी( चारों दिल्ली से हैं) ने मिलकर सभी सहयात्रियों को शाम की चाय और नाश्ता कराने का कार्यक्रम रखा।

गजरौला पर बस रोकी गयी और सभी को उनके स्वाद और इच्छा अनुसार चाय/कॉफ़ी, और नाश्ता परोसकर आतिथ्य-सुख प्राप्त किया।

साढ़े सात बजे हम गाज़ियाबाद के पास पहुँच गए थे, घर से बार-बार फोन आरहा था पर बस जाम में फंस गयी थी। साढ़े नौ बजे हमारी बस दिल्ली गुजराती समाज में पहुँच गयी। हम जैसे ही उतरे हमें लेने आए परिवारजनों ने हमें गले से लगा लिया।

हम तो पहुँच गए थे पर हमारा लगेज पहुँचने वाला था सो हम सब गुजराती समाज में अंदर चले गए। वहाँ श्री उदयकौशिकजी ने फूलमालाओं से सभी यात्रियों का स्वागत किया।

थोड़ी देर में लगेज आगया। लगेज लेकर हमसब गाड़ी में बैठकर अपने घर आ गए और बाबा कैलाशपति को नमन किया जिन्होंने कृपा करके अपने धाम बुलाया और सकुशल यात्रा संपूर्ण कराकर मेरा सपना सार्थक कराया।

समाप्त
"ॐ नमः शिवाय"


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