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01.01.2015


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

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छ्ब्बीसवाँ दिन / सत्ताईसवाँ दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

गुंजी से बुद्धि
गुंजी से बुद्धि
29/6/2010 छब्बीसवाँ दिन
गुंजी=>सीती=>गर्ब्यांग=>छियालेख=>बुद्धि

सुबह पाँच बजे कमरे में ही चाय आ गयी हम उठे और दैनिक कार्यों से निपटकर हाथ-मुँह धोकर तैयार हो गए। बाहर हल्की बूंदाबांदी भी हो रही थी, नहाने के लिए पानी गर्म न हो सका।

नाश्ता तैयार हो गया था, नाश्ते में पोहा और मीठा दलिया था। यात्री भोजन-कक्ष में पहुँच रहे थे। साढ़े छः बजे सभी तैयार होकर अपने बैग के साथ अहाते में खड़े हो गए।

एलओ ने निगम कर्मचारियों को बुलाया और पूरे दल की ओर से सभी का धन्यवाद किया और लिफ़ाफ़े भेंट करके विदा ली।

मैं पोर्टर के साथ काली नदी के किनारे पैदल ही आगे बढ़ गयी। सभी यात्रियों के पोनी वाले मिल गए पर मेरा वाला दिखायी नहीं दिया। मैंने अन्य पोनीवालों से पूछा तो पता चला कि उसका पोनी कहीं दूर पहाड़ी पर भाग गया था वह उसे ढूँढकर पकड़ने गया था। मैं पैदल ही चलती रही। बीच-बीच में कई खाली जा रहे पोनी वाले मुझसे अपने पोनी पर बैठाने की ज़िद्द करते रहे पर मैं अन्य पैदल जा रहे सहयात्रियों के साथ आगे बढ़ती रही।

काली नदी का पुलपार करने के बाद पोनीवाला पोनी को भगाता हुआ आया और मेरे पास रुक गया। मैं पोनी पर बैठ गयी।

साढ़े सात बजे हम सीती गाँव आ गया जहाँ जाते समय हमने लंच किया था। पहले से ही कई यात्री वहाँ बैठे हुए थे। मैं भी पोनी से उतरकर वहाँ बैठ गयी।

पोनी और पोर्टर वालों को मैंने चाय और खाने के पैसे दे दिए वे दोनों खाना खाने चले गए। कुछ यात्री भी अपने पैसे से चाय पी रहे थे, पर मेरा मन नहीं था सो वहाँ बैठी एक छोटी सी डॉगी की क्रिड़ाएँ देखती रही। वह सब यात्रियों के पास आकर कुछ कह रही थी। सभी प्यार से उस पर हाथ फेर देते थे। पोनीवाला और पोर्टर दोनों खाना खाकर जल्दी ही आ गए और हम वहाँ से चल दिए।

मौसम साफ़ था धूप तेज़ थी, खुली धूप में गर्मी भी हो रही थी पर नदी किनारे चलते चलते प्रकृति मनमोह रही थी। चलते चलते हम गर्ब्यांग आयटीबीपी चौकी पर पहुँचे। सिपाहियों ने इशारे से पोनी वाले को मुझे उतारकर साइड में कार्ड चैक कराने जाने को कहा और मुझे बीच में पड़ी कुर्सियों तक ले गए,वहाँ अन्य सहयात्री भी बैठे हुए थे। वहाँ गर्म पानी, चाय और चिप्स सर्व किए गए। वहीं हमें पाँचवें दल के तीर्थयात्री भी मिले, हम सबने उन्हें यात्रा निर्विघ्न पूरी करने हेतु शुभकामनाएँ दीं और हौंसला बढ़ाया।

थोड़ी देर में पोनी और पोर्टर आ गए। मैं पोनी पर बैठकर आगे चल पड़ी। रास्ते में पाँचवें दल के और भी सदस्य मिलते रहे और हम उनसे "ॐ नमःशिवाय" कहकर आगे बढ़ते रहे।

गर्ब्यांग गाँव की गीली गलियों से जाते समय पहाड़ियों पर बने उनके पंक्तिबद्ध घर दर्शनीय थे। जाते समय की तुलना में अब ज़्यादा रौनक थी। शायद मौसम ठीक और यात्रियों की आवाजाही बढ़ने के कारण ग्रामवासी भी गाँव में आ गए थे।

गर्ब्यांग से आगे ऊँची चढ़ाई थी जहाँ बहुत संकरा रास्ता था जहाँ मेरा पोनी फिसल गया था और मैं गिरते से बाल-बाल बच गयी।

और आगे बढ़े तो फिर वही हरियाली से भरी छियालेख घाटी। जाने के समय की अपेक्षा अब कहीं अधिक हरियाली थी। जंगली फूल खिले थे। सौंदर्य मारक था! पैदल चलने वाले सहयात्री रुक-रुककर दृश्यों को निहार रहे थे।

साढ़े बारह बजे बुद्धि गाँव दिखायी देने लगा और एक बजे हम बुद्धि-कैंप पहुँच गए। बुद्धि कैंप की क्यारियों में में बहुत सुंदर हर रंग के फूल खिले थे। पहुँते ही बुरांस का शर्बत पीने को मिला। पहले से पता होने के कारण हम सीधे अपने कमरे में पहुँचे, जहाँ सहयात्री श्रीमती और चंदन पहले से पहुँचकर आराम कर रहे थे।

पूरी यात्रा मे आज पहली बार गर्मी लगी थी, जी उकता रहा था। हमने अपने पोर्टर से नहाने के लिए गर्म पानी का प्रबंध करने को कहा। वह रसोई में गया और निगम के कर्मचारी से पूछ्कर पीछे की ओर बाथरूम के पास ही पत्थर रखकर बनाए गए चूल्हे पर भिगोने में पानी गर्म होने रख गया। पानी गर्म होने पर मैं नहायी जिससे तबियत ठीक हुई। इतने ही नलिना भी आ गयी मैंने उन्हें भी पानी गर्म बता दिया।

धीरे-धीरे सभी यात्री पहुँच गए। दोपहर का खाना तैयार होकर भोजन-कक्ष में लग गया था, खाने में दाल,चावल, कढ़ी, रायता रोटी, अचार इत्यादि सबकुछ था। खाना खाकर हम अपने कमरे में आकर सो गए।

चार बजे कमरे में चाय देने आए निगम कर्मचारी की खटखटाहट से हम सब की आँख खुलीं। दरवाज़ा खुलने पर पता चला कि जब सोए थे तो धूप थी और शाम को तेज बारिश हो चुकी थी। गहरे बादल घिरे हुए थे।

मैं, नलिना और स्नेह कमरे के खुले दरवाज़े से दूर पहाड़ी दृश्यों का आनंद उठाते बातचीत कर रहे थे तभी एक कुत्ता आकर हमारे दरवाज़े पर खड़ा हो गया शायद कैंप में ही रहता होगा, बिलकुल मित्रभाव से हम सब की ओर देखता हुआ पूँछ हिलाने लगा। हमने उसे बिस्किट खाने को डाल दिए; स्नेहलता को डर था कि कहीं ज़्यादा दुलारने पर वह ऊपर बिस्तर पर ही न चढ़ जाए सो वह उसे भगाना चाहती थी, पर मेरे और नलिना के न मानने पर स्वयं मुँह ढककर लेट गयी। तब कुता भी वहाँ से चल गया।

थोड़ी देर में मैं अपना कैमरा लेकर बाहर गयी और कुछ चित्र अपने कैमरे में संजोए। बूंदाबांदी फिर शुरू हो गयी थी सो वापिस अपने कमरे में आगयी।

साढ़े सात बजे भोजन-कक्ष में ही एलओ ने मीटिंग रखी। सभी एकत्र हुए और शिव-वंदना से प्रारंभ करके अगले दिन की यात्रा के विषय में चर्चा की। अगले दिन की यात्रा सुबह छः बजे शुरू होनी थी। नाश्ता मालप में मिलना था।

हमने खाना खाया और रसोई में निगम कर्मचारी से सुबह स्नान हेतु जल्दी पानी गर्म करने का विनम्र आग्रह किया। वह कर्मचारी इतने सहयोगी थे कि क्या बताएँ एकदम बोल उठे- "हाँ-हाँ मैडम हो जाएगा।" हम उनका धन्यवाद करके वापिस अपने कमरे में आकर सो गए।

बुद्धि से धारचूला
30/6/2010 सत्ताइसवाँ दिन
बुद्धि से धारचूला
बुद्धि=>मालपा=>लखनपुर=>जिप्ती=>मंगती=>धारचूला(वाया तवाघाट)

मैं और स्नेहलता चार बजे उठ गए। लाइट नहीं आ रही थी सो हमने कमरे में मोमबत्ती जलाकर रोशनी करली और टॉर्च लेकर बाहर टॉयलेट की ओर चले गए। बाहर अन्य कमरों के यात्री भी दिखायी दिए। बाथरूम के बिलकुल सामने चूल्हे पर पानी गर्म हो रहा था कई यात्री पानी ले जा रहे थे।

हम दोनों ने भी फुर्ती दिखायी और गर्म पानी लेकर नहा लिए। कमरे में जाकर सभी को गर्म पानी की सुविधा बता दी। नलिनाबेन भी जल्दी से नहा लीं। शेष ने गर्म पानी से हाथ मुँह धो लिए।
तैयार होकर हम साढ़े पाँच बजे रसोई के आगे जाकर खड़े हो गए, जहाँ एलओ सहित कई यात्री खड़े रस्क के साथ चाय/कॉफ़ी पी रहे थे। हमने भी चाय पी और वहीं मुँडेर पर बैठ गए। मेरा पोर्टर भी वहीं पहुँच गया था मैं अपना बैग उसे थमाकर निश्चिंत हो गयी।

आकाश में बादल घिरे हुए थे, अब बरसे, तब बरसे जैसे लग रहे थे। सभी यात्री पहुँच गए तो एलओ ने प्रस्थान का इशारा कर दिया था, पर देखते-देखते हल्की-हल्की बारिश शुरू हो गयी। पर कुछ को छोड़कर सभी ने भोले का नाम लेके बुद्धि-कैंप छोड़ दिया।

अभी सौ मीटर भी न गए होंगे कि मूसलाधार बारिश होने लगी। रास्ते में पहाड़ों से बहकर आता पानी इतना तेज बह रहा था कि कोई भी उसके साथ बह सकता था। जो जहाँ था वहीं खड़ा हो गया। आधे घंटे में बारिश हल्की हुई तो पुनः चलना प्रारंभ किया।

बारिश से फिसलन और पहाड़ों से आता बारिश का पानी बहुत कठिनाई उत्पन्न कर रहे थे। बरसाती पहने होने से शरीर तो भीगने से बच गया था पर जूते और मोजे बिलकुल लथपथ थे, मैं एक हाथ में बेंत लिए पोर्टर के साथ-साथ पैर जमा-जमाकर पानी में फचफच करती आगे बढ़ती गयी।

थोड़ा आगे जाकर पोनी वाले खड़े थे जिन्होंने अपने-अपने यात्री बैठा लिए, पर मेरा पोनीवाला आज भी नदारद था। पोर्टर ने चलते रहने की सलाह दी ताकि पोनीवाला आगे खड़ा हो तो मिल जाएगा।

सभी यात्री आगे निकल गए मैं काफ़ी पीछे रह गयी। लमारी से थोड़ा सा पहले पोनीवाला पीछे से मेरे पास आया और कहने लगा कि वह कैंप के पास खड़ा था। पता नहीं झूठ कह रहा थ या सच। मैं पोनी पर बैठकर आगे बढ़ गयी।

धीरे-धीरे मौसम साफ़ होने लगा था पर रास्ते में कींचड़ तो जस की तस थी। बीच छतरी झरना पड़ा पर हम कहीं रुके नहीं हाँ छतरी झरने से पहले की अपेक्षा कहीं अधिक पानी बह रहा था।

रास्ता जाते समय से भी कठिन लग रहा था। जगह-जगह से पगडंडी टूट रहीं थीं किसी-किसी जगह एक-डेढ़ फुट जगह ही पैर रखने की थी और बिलकुल नीचे चिल्लाती काली कालरुपा बनी और भी ज़्यादा उफ़न रही थी तो कहीं पहाड़ों से गिरते झरनों के बीच से जाना पड़ रहा था। हाँ हर कदम पर आयटीबीपी के जवान हम सब की सहायता के लिए अवश्य मिल रहे थे।

शिव का नाम लेते लेते मालपा तक पहुँच गए। वहाँ हमारे दल के नाश्ते का प्रबंध था। हम पोनी से उतरकर नाश्ते वाली जगह पर पहुँचे तो वहाँ एलओ और अन्य यात्री भी नाश्ता कर रहे थे। गर्म-गर्म छोले पूरी। एलओ ने बताया कि जिप्ती से रास्ता बहुत कठिन था। गिरे हुए पहाड़ की चट्टानों पर से उतरना था, सो रश्मि शर्मा और वीना मैसूर जो पैदल बिलकुल नहीं चल सकती थीं, को आगे गाला तक घोड़े पर जाने की सलाह दी उन्होंने उनके लिए निगम से कहकर वहाँ गाड़ी बुलवायी थी।

हम नाश्ता करके पोर्टर के साथ पैदल चल पड़े क्योंकि नदी का पुल पार करके आगे जाकर पोनीपर बैठा जा सकता था।

पुलपार करके कभी पोनी पर तो कभी पैदल चलते हुए लखनपुर की 4444 सीढियाँ चढ़ने पहुँच गए। पोनी वाले ने सीढ़ियों पर ले जाने से मना कर दिया और हमसे अलग चलने लगे। हम सीढ़ी चढ़ते से ही दमा के रोगी से हो गए। साँस घुट रही थी। हालांकि आयटीबीपी के जवान भी साथ-साथ ही चल रहे थे।

मैं, गीताबेन, स्मिताबेन, चंद्रेशभाई और दीपकभाई सभी साथ-साथ थे और हम सब ने पोनी हायर किए हुए थे। पर सभी पैदल चलकर बुरे हाल में थे। तब आयटीबीपी के जवान ने पोनी वालों से हमसब को पोनी पर बैठाकर सीढ़ियाँ चढ़ाने को कहा। एक-एक करके पोनी वाले हमें पोनी पर बैठाने लगे। मेरा पोनी वाला बहुत अनुभवी नहीं था सो पहले तो थोड़ा डर रहा था। बाद में बैठा लिया।

सीढ़ियाँ पार करके कुछ आगे जाकर अस्कोट (जिप्ती) के पास पोनी वालों ने हम सब को उतार दिया। थोड़ा नीचे उतरकर गेस्ट-हाऊस बना था जहाँ हमारे दोपहर के भोजन का प्रबंध था।

एक छोटे से कमरे में एक बड़ी मेज़ के चारों ओर कुर्सी लगीं थीं। हम हाथ धोकर खाना खाने बैठ गए। एलओ, बालाजी और बिंद्राजी भी पहुँच गए।

हमने खाना खाया और सभी साथ पैदल निकल पड़े। कुछ दूर जाकर पोनी वाले ने पोनी से उतार दिया और आगे रास्ता न होने की बात कहने लगा। हमने बिंद्राजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि आगे पोनी नहीं जा सकते थे सो हमने उसका हिसाब चुकता कर कुछ रुपए इनाम बतौर देकर विदा कर दिया।

हमने पोर्टर से रास्ता पूछा तो उसने हमारे सामने फैले गिरे हुए पहाड़ की फैली चट्टानों की ओर इशारा कर दिया। हम देखकर अवाक रह गए क्योंकि वहाँ न कोई पगड़ंडी थी और न कोई रास्ता। यह मंगती जाने के लिए शोर्टकट था। सारे में पहाड़ के बड़े-बड़े पत्थर पड़े हुए थे जिन पर चढ़कर/उतरकर हमे नीचे मंगती तक जाना था पर कोई और विकल्प भी न था। हम मन ही मन सोचने लगे कि एलओ ने सभी को गाला के रास्ते से क्यों नहीं भेज दिया?

मैं और अन्य यात्री अपने-अपने पोर्टर के साथ चट्टानों से उतरने लगे। बड़े-बड़े पत्थर जिन पर पैर रखते ही हिलने लगते। मोड़ पर कई बार फिसलते से पोर्टर ने बचाया। गिरा पहाड़ इतना फैला हुआ था कि समाप्त होने का नाम न ले रहा था। ढाई बजे जब गर्वा का स्कूल दिखायी दिया तो हमें सकून आया कि अब रास्ता हो सकता है। तीन घंटे लगातार बिना रुके उन चट्टानों से उतरना बड़ा कठिन लगा तब कहीं जाकर मंगती की सड़क दिखायी दी जिस पर एक जीप खड़ी थी जिसमें कई सहयात्री बैठे थे। हमारे एलओ भी वहीं साइड में खड़े थे।

हमारा पोर्टर भी धारचूला के पास का ही था सो उसे स्थानीय बस में जाना था हम उसे धारचूला गेस्ट-हाऊस में पहुँचकर मिलने का कहकर लपक कर बिना किसी के कहे जीप में जाकर बैठ गए, इस तरह हमारी पोनी पर और पैदल यात्रा पूरी हुई; आगे तो वाहन से ही जाना था।

मिट्टी से भरी टूटी सड़क पर भागती जीप में बैठकर शरीर और पस्त हो गया। सभी यात्री बहुत कष्टमय थे पर क्या करते।

पाँच बजे जीप धारचूला के गेस्ट-हाऊस के आगे रुकी हम रिसेप्शन से चाबी लेकर अपने कमरे में गए। हाथ-मुँह धोया और बिस्तर पर लेट गए।

थोड़ी देर में नलिना आ गयी जिन्होंने बताया कि नीचे लस्सी और चाय दोनों का प्रबंध था। हमने नीचे किचेन से लेकर चाय पी और बिस्किट खाए। वहीं हमने अपना असली पोर्टर (ज्ञान का पिता) भी मिल गया। हमने उसे अपना कमरा न. बताया और अपना हिसाब कर रुपए लेजाने को कहा।

तभी हमारे लगेज का ट्रक भी पहुँच गया। बारिश के कारण लिखा हुआ सब मिट गया था सो अपना बोरा पहचानने में नहीं आ रहा था। किसी-किसी तरीके से पहचान कर हमने पोर्टर से लगेज अपने कमरे तक पहुँचवा दिया और उसे उसके हिसाब के पैसे के अलावा ग्यारह सौ रुपए बतौर इनाम दिए। वह बहुत खुश हुआ और कहने लगा कि उसका घर बहुत पास ही है वह सुबह विदा करने भी आएगा।

रात को भोजन-कक्ष में सब हंसी-खुशी मिले, शिव-वंदना करके खाना खाया और अगले दिन सुबह साढ़े छः बजे मिनी बस से प्रस्थान करने के लिए कमरे में आकर सो गए।

एलओ ने सुबह छः बजे प्रस्थान समय बताकर शुभ-रात्रि बोल दिया। सभी यात्री अपने-अपने कमरे में चले गए।

 क्र्मशः

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