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12.18.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

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चौबीसवाँ दिन / पचीसवाँ दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

तकलाकोट से कालापानी
तकलाकोट से कालापानी
(स्वदेश वापिसी)
चौबीसवाँ-दिन 27/6/2010
तकलाकोट=>लिपुलेख=>नवींढांग=>कालापानी

तकलाकोट से लिपुलेखपास (अपने देश की सीमा में प्रवेश)

प्रातः दो बजे मेरी आँख खुल गयी। मैंने नलिनाबेन और स्नेहलता जी को भी उठा दिया। हम तीनों जल्दी-जल्दी दैनिकचर्या एवं स्नान करके तैयार हो गए। हम सोच ही रहे थे कि दरवाज़ा खोलकर गैलरी में देख लें कि क्या चल रह है तभी दरवाज़े पर खटखटाहट हुई, बाहर देखा तो के.के.सिंह और अशोककुमारजी चाय की केतली और गिलास हाथ में लिए खड़े थे। हमने उनसे चाय लेकर आभार प्रकट किया और अपने स्नैक्स के साथ चाय पीने लगे।

बाहर से हलचल की आवाज़ें आ रहीं थीं, हम तीनो भी अपने हैंड-बैग और बेंत लेकर बाहर निकल गए। मेन गेट पर भी कई यात्री खड़े थे। हम भी वहीं जाकर खड़े हो गए। एक टैंपू में हम सब का लगेज चढ़ाया जा रहा था। बराबर में ही बस खड़ी थी पर अभी कोई उसमें बैठा नहीं था।

रात्रि-मिश्रित सुबह के तीन बजे थे। आकाश पूर्ण स्वच्छ तारों से भरा था। वायु शीत-प्रकोपी का अवतार धारण करे हुए थी ऐसा लगता था जैसे आकाश से शीत झड़ रहा हो।

पूर्णिमा से अगली सुबह थी। बिलकुल सामने आकाश में दीप्त पूर्ण चंद्रमा हमारी विदाई का साक्षी था। हमने अपने कैमरे में तकलाकोट के गेस्ट-हाऊस के प्रांगण से आकाश से अलविदा कहते चंद्रमा को अपने कैमरे में उतार लिया।3:30 पर जब सारा सामान रखा गया और सभी यात्री वहाँ आ गए तो एलओ ने गुरु से सभी यात्रियों को बस में बैठाने को कहा।हम सब तो तैयार ही थे सो भगवान शंकर के स्मरण करके जयकारों के साथ लपककर बैठ गए ड्राइवर से पीछे की सीट पर। नलिना हमारे साथ बैठीं। अन्य यात्री भी बैठ गए। देरी का कारण था हमारे अति युवा तीर्थयात्री जो बड़ी मुश्किल से इतनी सुबह उठ पाए।

चार बजे एलओ ने सभी यात्रियों की स्वयं गिनती की और पास में ही खड़ी टैक्सी में बैठ गए। स्मरण रहे सैक्रेटरी लेवल रैंक का सरकारी कर्मचारी ही एलओ बन सकता है सो चीन सरकार उन्हें सम्मान के साथ टैक्सी में सुरक्षित मिलट्री कस्टडी में अलग भेजती है।

बस में भी दो पुरुष और एक महिला पुलिस कर्मी साथ बैठे थे। बस चल पड़ी और सीधी कस्टम ऑफ़िस के दरवाज़े पर जाकर रुक गयी। कई सुरक्षाकर्मी बस में सर्च करने आए और सभी यात्रियों को नीचे उतारा गया और डिटेक्टर-मशीन के आगे से निकालकर बस में बैठाया गया।

उसके बाद बस सुनसान पहाड़ी क्षेत्र में चली जा रही थी, धीरे-धीरे पौ फटने लगी आकाश में दिन निकलने से पहले का प्रकाश छाने लगा। बर्फ़ की चमक स्पष्ट दिखायी देने लगी थी।

पाँच बजे हमारी बस पहाड़ों से घिरे एक सुनसान स्थान पर जाकर रुक गयी। एलओ की गाड़ी भी वहाँ खड़ी थी।

गुरु और कई यात्री नीचे उतर गए। कई पुलिस कर्मी और मिलट्रीमैन खड़े थे। दो/तीन छोटी गाड़ियाँ भी खड़ीं थीं।

पता चला कि आगे बस का रास्ता नहीं था सो पोनी और पोर्टर्स का इंतज़ार हो रहा था, ठंड की वज़ह से यात्री बस में बैठे थे। असल में तीर्थ-यात्रियों को सीमा तक पोनी पर पहुँचाने की ज़िम्मेदारी चीन सरकार की है, इसका खर्चा पहले दिए गए सात सौ डॉलर में ही सम्मिलित होता है।

कुछ देर में गुरु ऊपर आया और किसी-किसी महिला यात्री से नीचे खड़ी छोटी गाड़ी में जाकर बैठने के लिए कहने लगा। उसने मुझसे भी कहा पर मैं मना करने लगी क्योंकि मैं पोनी पर आराम से बैठ जाती हूँ पर जुनेजा ने मुझसे नीचे जाकर गाड़ी में बैठ जाने का आग्रह किया सो मैं नलिनाबेन और ज्योत्सना के साथ जाकर बैठ गयी।

गाड़ी में बैठते ही तिब्बती ड्राइवर ने झटके से गाड़ी को स्टार्ट किया और इतनी तेज गति से चलाने लगा कि लगता था गाड़ी अब लुढ़की और तब लुढ़की। एक दो बार हमने उसे इशारे से मना भी किया पर वह कहाँ सुनने वाला था। आधे घंटे दौड़ने के बाद एक ऊँची चढ़ाई पर उसका इंजन पीछे भागने लगा सो वह हम तीनों को अकेले जहाँ कोई न था पहाड़ों के बीच नीचे उतारकर हाथ के इशारे से ऊपर चढ़ाई पर रास्ता बताकर स्वयं अन्य यात्री लेने चला गया। हम तीनों वहीं खड़े रहे। हमने अकेले इतनी खड़ी और फिसलन भरी चढ़ाई पर जाना ठीक नहीं समझा।

थोड़ी देर में दूसरी और तीसरी गाड़ी भी यात्री उतार गयी तो हम सब लोग आगे पहाड़ी पर चढ़ने लगे पर मेरे पास बैग भी था सो मैं चढ़ नहीं पा रही थी। मैं आगे न गयी और वहीं खड़ी रही। मुझे दूर नीचे पोनी आते दिखायी दिए, मैं समझ गयी कि हमारे दल के यात्री ही पोनी पर बैठकर आ रहे थे। मैं इंतज़ार करने लगी। इतने ही गुरु और डिक्की चीन-सरकार के अफ़सरों के साथ छोटी गाड़ी से नीचे उतरे। उन्होंने मुझसे आगे जाने को कहा पर मैंने डिक्की से साफ़ मना कर दिया पैदल जाने को। डिक्की मेरे साथ खड़ी हो गयी। वह पोनी वालों से यात्री छोड़कर वापिस आकर मुझे ले जाने के लिए बोल रही थी।

मैं वहाँ खड़ी ठंडी हवा से ठिठुर रही थी, मेरी साँस फूल रही थी, तभी अन्य यात्रियों के साथ जुनेजा पोनी पर आता दिखायी दिया, वह मुझे देखते ही पोनी से उतर गया और डिक्की से मुझे बैठाने को कहकर स्वयं पैदल चला गया।

मैं पोनी पर बैठकर आगे बढ़ गयी। बहुत खड़ी चढ़ाई थी। आते समय यहाँ कई फुट बर्फ़ जमी थी। पोनी तक का साँस फूल रहा था। और आगे बढ़े तो अभी भी सारे में बर्फ़ जमी थी। पोनी की आधी-आधी टाँगें बर्फ़ में धँसने लगीं तो पोनी वाली ने डिक्की से कहलवाकर मुझे उतार दिया। मैं अपना बैग लेकर पैदल चल नहीं पा रही थी बार-बार फिसल जाती थी सो डिक्की ने पोनी वाली से मेरा बैग पकड़कर मेरे साथ जाने को कहा।

पोनी वाली मेरा बैग लेकर साथ चलने लगी। हम 5534 मीटर की ऊँचाई पर थे। मेरी साँस फूलने के अलावा गला सूख रहा था।

सात बजे तक लगातार बिना रुके पहाड़ों पर चढ़कर हम बोर्डर पर पहुँच गए। मैंने पोनीवाली को धन्यवाद के साथ पचास युवान इनाम दिए और वापिस भेज दिया।

सीमा पर चीनी अधिकारी और सैनिक वहाँ खड़े थे। उधर हमारी सीमा में हमारे आयटीबीपी के जवान हमें लेने और चौथे दल को छोड़ने पहुँचे हुए थे।

ठीक सात बजकर पाँच मिनट पर एलओ और हमारे दल के सभी सद्स्यों ने भारतमाता की जय के साथ अपने देश की मिट्टी को अपने मस्तक पर लगाया और स्वदेश की सीमा में प्रवेश कर गए। हमारे सिपाही हमारे स्वागत के लिए खड़े थे। हाथ पकड़कर सभी को बुला रहे थे। वह पल हमारे लिए गर्व के पल थे। हम अपने देश में लिपुलेख दर्रे पर खड़े थे।

लिपुलेख से नवींढांग
लिपुलेख से नवींढांग
(स्वदेश वापिसी )
चौबीसवाँ-दिन 27/6/2010

लिपु बोर्डर पर खड़े यात्री अपने-अपने पोर्टर ढूँढने लगे। मैं भी चारों ओर देख रही थी पर मुझे पोर्टर और पोनी नज़र नहीं आए। मैं थोड़ा आगे बढ़ने लगी तभी मुझे नलिनाबेन मिलीं, उन्होंने मुझे रोककर मेरा पासपोर्ट दिया और बताया कि तकलाकोट में बस से उतरने पर चीनी अधिकारियों ने पासपोर्ट वापिस किए थे पर हम दोनों छोटी गाड़ी में बैठकर आ गए थे इसलिए एलओ को सौंप दिए गए थे। एलओ ने रास्ते में नलिनाबेन को दे दिए और उन्होंने मुझे।

सीमा से थोड़ा सा ही पीछे पोनी और पोर्टर्स की भीड़ जमा थी; ये वह सब थे जो चौथे दल को और उनके लगेज छोड़ने आए थे। पोनीवाले अपने-अपने पोनी पर बैठाने की ज़िद्द कर रहे थे। मैं अपने पोर्टर की तलाश में थोड़ा आगे आकर खड़ी हो गयी और दूसरे पोनी वालों से पूछ रही थी, "धीरेंद्र (मेरा पोनी वाला) किधर है"? तभी एक बीस/इक्कीस साल का युवक पोर्टर मेरे पास आकर पूछने लगा – "आप प्रेमलता मैडम हैं"? मैंने उसे प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा और पूछा - "हाँ क्यों?" उसने अपना परिचय ज्ञानप्रकाश के रूप में देकर बताया कि वह मेरे पोर्टर का बेटा था। उसके पिता की तबियत खराब थी सो वह मुझे लेने आया था।

मैंने उसे अपना बैग दे दिया और हँसकर पूछा कि उसने मुझे कैसे पहचाना। तो उसने बताया कि उसके पिता ने जो मेरा हुलिया बताया था बस उसी के अनुसार उसने मुझे ढूँढ़ लिया।

मैं पोनी वाले को ढूँढने लगी तो ज्ञान ने ही बताया कि अगर पहलेवाला पोनी वाला न मिले तो किसी भी पोनी वाले के पोनी पर बैठकर जाया जा सकता है क्यों कि हमने पोनी का अनुबंध ठेकेदार से किया था न कि किसी पोनी वाले से; सारे पोनी वाले ठेकेदार के अधीन चल रहे थे। इसके अतिरिक्त जाते समय लिपुलेख पर सीमा पार करते समय पोनी और पोर्टर का एक ओर का सारा पैसा चुका दिया गया था। मैंने ज्ञान की सहायता से एक पोनी वाला बुलाया और पोनी पर बैठकर अन्य यात्रियों के साथ आगे बढ़ गयी।

सीमा पर ही हमें चौथे दल के सदस्य मिले जो हाथ जोड़कर अभिवादन कर रहे थे। कई यात्री तो पैर छूकर आशीर्वाद ले रहे थे। हम सभी ने उनकी यात्रा सकुशल होने की शुभकामनाएँ दीं। एक यात्री नंगे पैर जा रहे थे, हम सभी ने उनसे और उनके ग्रुप से उन्हें जूते पहनाने का आग्रह किया पर पता नहीं वह माने या नहीं माने। हम आगे बढ़ गए थे।

रास्ता उतराई का था सो पोनीवाला लगाम कसकर धीरे-धीरे चला रहा था। सिपाहियों के ग्रुप भी यात्रियों के साथ-साथ चल रहे थे। हम सकुशल यात्रा पूरी करके स्वदेश वापिसी के सुखद भाव में भरे प्रकृति के सुंदर बिछावन को देखकर मोहित हो रहे थे जिन्हें जाते समय अँधेरा होने के कारण देख भी न सके थे। क्या दृश्य थे! उन्हें देखकर मुझे लग रहा था कि वह कोई विशाल पोस्टर है। मैंने सुंदर दृश्यों को कैमरे में उतारा और ललचायी सी चारों ओर देखती आगे बढ़ती गयी।

बीच में उसी स्थान पर जहाँ बर्फ़बारी से ध्वस्त आयटीबीपी का वार्ता-कक्ष था, सिपाहियों ने हम सब को रोककर गर्म-गर्म चाय और चिप्स खिलाए। सुबह से इतनी ठंड में चलने पर मिली वह चाय नहीं अमृत थी। शरीर को गर्मी और स्फूर्ति मिली। हम अपने उन जवानों की निस्वार्थ सेवा के ऋणी हैं।

सवा नौ बजे हम नवींढांग-कैंप पहुँचे। कुमंविनि के कर्मचारियों ने अभिवादन के साथ स्वागत किया और बुरांस का शर्बत पिलाकर यात्रा पूरी होने की बधाई दी।

बाथरूम जाते समय पता चला कि एक कमरे में फोन सुविधा चालू थी, बस सारे यात्री घुस गए उस कमरे में और लाइन से खड़े हो गए। हम सभी ने अपने घर बात की। फोन वाला कर्मचारी बहुत सहयोगी था।

फोन करके हम सब डोम में नहीं गए क्योंकि वहाँ हमें ठहरना नहीं था बल्कि खाना खाकर कालापानी पड़ाव के लिए निकलना था सो यात्री आते जा रहे थे और बाहर खुले में ही धूप में बैठकर बातचीत करते खाना तैयार होने का इंतज़ार कर रहे थे।

बायीं ओर "ॐ" पर्वत था पर वह पूरी तरह बादलों में छिपा हुआ था लेशमात्र भी झलक न दिखायी, फिर भी कोई निराश न हुआ क्योंकि हम जाते समय बहुत लंबे समय तक उसके पूर्ण दर्शन कर चुके थे।

साढ़े दस बजे निगम के कर्मचारी ने बताया कि खाना लग चुका था। सारे यात्री भूख से व्याकुल थे सो बच्चों की तरह दौड़ पड़े उस कक्ष की ओर। तुअर की दाल, दो प्रकार की सब्जी, कढ़ी, रायता, रोटी, आचार, पापड़, चावल और खीर सब गर्मागर्म!

सभी अपना-अपना खाना थाली में परोसकर खाने के लिए बाहर आ गए। हम सब की सकुशल वापिसी की खुशी में बनाया गया भोजन। सभी यात्री उन कर्मचारियों की प्रशंसा करते-करते पेट-पूजा कर रहे थे।

खाना खाने के पश्चात एलओ ने सभी को एकत्र किया और नवींढांग कैंप के इंचार्ज और समस्त कर्मचारियों को बुलाया और इतनी आत्मीयता के साथ सहयोग और सेवा के लिए पूरे दल की ओर से आभार प्रकट किया और इंचार्ज की उपस्थिति में अपने दल के प्रायवेट-फ़ंड से सभी को कुछ-कुछ राशि इनाम बतौर दी और विदा ली।

नवींढांग से काला पानी

भोले के जयकारे के साथ सवा ग्यारह बजे हम कालापानी के लिए चल पड़े। सुबह से थके हुए थे, खाना खाने के बाद शरीर और आलस्य से भर गया था; पोनी पर बैठे-बैठे ही नींद आ रही थी। बड़ी मुश्किल से पोनी पर बैठी हुई थी। पोर्टर और पोनीवाला बड़ी उत्सुकता से यात्रा का हाल पूछ रहा था, मैं बार-बार उबासी लेती हुई उन दोनों से बात करती अपनी नींद को भगा रही थी।

नदी किनारे दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और घाटी तेरह दिन में ही मौसम अपना रंग दिखा चुका था। हरियाली पनपने लगी थी, कहीं-कहीं पहाड़ों के ढलान पर रंगबिरंगे छोटे-छोटे फूल भी खिल रहे थे। जिनको देखकर भी मैं अपना आलस्य भूल जाती थी।

डेढ़/दो बजे के करीब हम कालापानी पहुँच गए। काली माँ के मंदिर में दर्शन किए और मस्तक झुकाया जिनकी कृपा से यात्रा निर्विघ्न पूरी हुई। शाम को मंदिर में भजन और आयटीबीपी के जवानों की ओर से हमारे दल के लिए रात्रि-भोजन (बड़ा खाना) का आयोजन था। सो शाम को पुनः आने की सोचकर जल्दी कैंप में आ गए।

जाते समय जैसे ठहरे थे उसी अनुसार कमरों में ठहर गए। थकान के कारण हालत पस्त थी हालाँकि चाय आयी थी पर मना करके बिस्तर में पड़कर सो गए।

चार बजे गर्म सूप लेकर निगम कर्मचारी आया तो सबकी आँख खुलीं। सूप पीकर ताज़गी आयी तो उठे और बाहर पड़ा लगेज अंदर रखा। हाथ-मुँह धोकर तैयार होकर बाहर आए तो देखा मौसम बदल चुका था। गहरे घिरे बादलों ने अँधेरा सा कर रखा था। बूँदाबाँदी भी होकर चुकी थी।

मैं, स्नेहलता, नलिना, गीताबेन, स्मिताबेन इत्यादि मंदिर जाने के लिए बाहर आ गए, थोड़ी देर खड़े होकर बराबर में बहती नदी के अनियंत्रित वेग को देखते रहे। ढलान पर बहने के कारण नदी बहुत तेज़ बह रही थी।

साढ़े पाँच बजे मंदिर चले गए। जैसा कि हम पहले भी उल्लेख कर चुके हैं मंदिर को देखकर सुखद आश्चर्य होता है! कितनी मेहनत नज़र आती है वहाँ! इतनी असामान्य परिस्थितियों में इतना प्रबंधन!

मंदिर में भजन-संगीत बज रहा था जो पूरे पर्वतीय क्षेत्र में गूँज रहा था, पूजा की तैयारी चल रही थी। एक जवान आरती सजा रहा था तो दूसरा जल का कलश भरकर ला रहा था, बाहर बड़े-खाने की तैयारी में कई सारे सिपाही जुटे थे। इस तरह बहुत से जवान लगे थे तैयारी में।

मंदिर में फ़र्श पर लाल कालीन बिछा था। पास में ही ढोलक, मंजीरे, चिमटा और माइक रखे थे। हमसब जाकर कालीन पर बैठ गए। धीरे-धीरे सभी यात्री और एलओ भी पहुँच गए। कई सिपाही भी आकर बैठ गए। और स्वयं डिप्टी कमांडर इन चीफ़ भी आकर बैठ गए।

देश की रक्षा में बंदूक तानने वाले जवानों को ढोलक, मंजीरे और चिमटा बजाकर भजन गाते देखकर मन ख़ुशी से भर जाता है। कोई माने या न माने पर हमने मन ही मन भगवान गौरी-शंकर से उन सभी जवानों को यूंही हँसते गाते रहने की कृपा करते रहने की प्रार्थना की। बड़े भाव और चाव से सिपाही तनमय होकर भजन गा रहे थे। कुछ यात्रियों ने भी भजन सुनाए। गुजराती बहनों ने मिलकर नृत्य भी किया।

साढ़े सात बजे आरती हुई। श्री चौधरी और एलओ के बाद सभी यात्रियों ने आरती उतारी और प्रभु को नमस्कार किया। उसी समय सभी यात्रियों ने अपनी-अपनी श्रद्धा से मंदिर में रखी गुल्लक में धन राशि डाल दी थी। जवानों द्वारा तैयार सूजी के हलवे का भोग लगाया गया। श्री चौधरी ने प्रत्येक तीर्थयात्री को स्वयं प्रसाद बाँटा।

मंदिर के बिलकुल बाहर काली नदी के तट पर बड़ी रौनक थी। लाइटिंग की गयी थी और कुछेक कुर्सियाँ लगीं थीं। सामने ही डाइनिंग रूम था जहाँ बड़े मेज़ पर खाना लगाया गया था। पूरी, कचौड़ी, छोले, पनीर, सब्जी-दाल, नान, पुलाव खीर और न जाने क्या-क्या!!!

जवान स्वयं परोसकर दे रहे थे। आतिथ्य करना तो कोई उनसे सीखे। शब्द नहीं है मेरे पास उनके सेवा-भाव वर्णन करने के लिए। बस महसूस किया जा सकता था।

खाना खाते-खाते नौ बज गए थे। रात के साथ ठंड भी बढ़ रही थी। हम सब ने हाथ जोड़कर जवानों का आभार प्रकट किया और शुभकामनाएँ देकर उनसे विदा ली और अपने कैंप की ओर मुड़ गए।

अगली सुबह सात बजे निकलना था सो निश्चिंत होकर आराम से रजाई में घुसकर सो गए।

कालापानी से गुंजी
पच्चीसवाँ दिन 28/6/2010
कालापानी से गुंजी

सुबह पौने छः बजे चाय वाले की आवाज़ से आँख खुली तो उठकर ब्रश लेकर बाहर गयी। मौसम साफ़ था। डोम के समीप ही पत्थरों से बनाए चूल्हे पर लकड़ी जलाकर बड़े भिगोने में पानी गर्म हो रहा था।

कई यात्री नहाने के लिए पानी ले जा रहे थे हमने भी सोचा पहले नहा लें चाय तो रसोई से ले ही लेंगे। सो लौटकर आयी और बैग से धुले कपड़े निकाले और स्नान कर लिया। तैयार होकर अपना बैग अपने पोर्टर को संभलवाकर स्वयं रसोई की ओर जाने वाली थी कि एक कर्मचारी सभी को नाश्ते के लिए बुलाने आ गया। (गुंजी के बाद लगेज धारचूला में ही मिलना था सो दो जोड़ी कपड़े रकसक में ही रख लिए थे)

सभी यात्री नाश्ता करके निकलने के लिए तैयार खड़े थे, तभी एलओ ने कालापानी के निगम कर्मचारियों को बुलाया और उनका आभार प्रकट किया। करतल ध्वनि के बीच पूरे दल की ओर से उन सभी सेवादारों को अलग-अलग लिफ़ाफ़े (कुछ धन राशि) भेंट कराए और विदा ली।

सात बजे के आसपास हम सभी मंदिर की ओर चल पड़े। मंदिर में माँ काली की पूजा और दण्डवत करके आगे बढ़ गए। पोर्टर नदी पार पोनी वाले के पास मिलने की कहकर आगे बढ़ गया था।

काली नदी पार करके कुछ दूर पैदल चलने के बाद पोनी वाले खड़े थे। वहाँ पहुँच कर मैं पोनी पर बैठकर आगे बढ़ गयी।

कालीनदी के किनारे-किनारे चलते-चलते साढ़े नौ बजे के आसपास हमें रोका गया और आयटीबीपी वालों की ओर से चाय और चिप्स सर्व किए गए। उन्हीं के सौजन्य से थोड़ी देर पहले भी एकबार चाय पी चुके थे सो अब मन नहीं था पर सभी को रोका जा रहा था सो रुकना पड़ा।

बातचीत में पता चला कि वहाँ आगे रास्ता समतल था सो मैंने पैदल चलने का निर्णय लिया और अपने पोनी वाले को अगले दिन सुबह मिलने की कहकर अकेले भेज दिया। मैं अन्य यात्रियों और अपने पोर्टर के साथ आगे बढ़ चली। रास्ता कठिन नहीं था।

ग्यारह बजे के आसपास हम गुंजी चौकी के पास पहुँच गए जहाँ आयटीबी का टेलीफोन-बूथ था। मैंने वहीं से अपने घर बातचीत करली क्योंकि गुंजी गेस्ट-हाऊस में अपराह्न में ही सैटेलाइट फोन चालू होता है।

गेस्टहाऊस में सभी को पहले के अनुसार ही कमरों में ठहरना था सो हम अपने कमरे में चले गए। हम तो कालापानी से ही नहाकर चले थे सो बाहर नल पर हाथ-मुँह धोकर बुरांस का शर्बत पिया और बिस्तर पर पसर गए; पर जो नहीं नहाए थे वे गर्मपानी के जुगाड़ में लग गए।

वीना मैसूर और मैं दोपहर के भोजन के बुलावा आने तक गहरी नींद में सोए रहे। उठकर खाना खाया और कुछ देर बाहर चहल-कदमी की।

कुछ यात्री कपड़े धो रहे थे तो कुछ अन्य कार्यों में व्यस्त थे। आज यहाँ पर छोटा कैलाश जाने वाले तीर्थयात्री भी आए हुए थे जिनमें गाज़ियाबाद की "अखिल भारतीय कैलाश-मानसरोवर समिति" के संरक्षक श्री महेंद्र कौशिक भी थे जिन्होंने दिल्ली से निकलते ही हमारा स्वागत किया था। हमारे दल के सदस्यों ने भी उनसे बातचीत की।

खाना खाकर हम सुबह के उतारे हुए कपड़े और वाशिंग पाऊडर लेकर कपड़े धोने चले गए। कुछ यात्री आराम कर रहे थे तो यात्रियों में यंगस्टर्स पुलिसजवानों के साथ फ़ुटबाल खेलने चले गए थे।

कपड़े धोकर सुखाते-सुखाते देखा तो पता चला कि सैटेलाइट फोन भी चालू हो गया था पर यात्री सोए हुए थे सो एक दो लोग ही फोन कर रहे थे। हम फटाफट फोन करने पहुँच गए और शायद पहली बार थोड़े बिस्तार से लगभग दस मिनट अपने घर बातचीत की। फोनसेवा पर बैठे श्री जोशीजी भी हँसने लगे हमारे मौके का फायदा उठाने पर।

फोन करके हमने अपने कमरे में आकर धीरे से फोन चालू होने की बात बता दी ताकि जो जागा हुआ हो वह जाकर फोन कर आए। तभी स्नेहलता और वीना मैसूर निकल गयी फोन करने और हम पुनः रजाई में बैठ गए।

साढ़े चार बजे कमरे में ही चाय आ गयी। छः बजे सूप सर्व हुआ। सूप पीकर सभी का मंदिर जाने का निश्चित था सो हम सब मंदिर चले गए।

कालापानी की तरह यहाँ भी मंदिर में बहुत रौनक थी। जवानों के अतिरिक्त छोटा-कैलाश जाने वाले तीर्थयात्री भी एकत्र थे। भक्ति-भाव से भजन संध्या हुई और आरती के साथ प्रसाद वितरण हुआ। भक्ति रस में डूबे हम सब वापिस कैंप आ गए।

भोजन तैयार था सभी भोजन कक्ष में पहुँच गए। अशोक कुमार जी ने हमेशा की तरह शिव-वंदना करायी और सभी ने भोजन किया। भोजन बहुत वैरायटी वाला था। कई पकवान थे पर हमें भूख नहीं थी सो बहुत थोड़ी सी मीठी सैवैंयां खा लीं, ताकि यह न लगे कि खाना नहीं खाया।

एलओ ने सुबह छः बजे प्रस्थान समय बताकर शुभ-रात्रि बोल दिया। सभी यात्री अपने-अपने कमरे में चले गए।

 क्र्मशः

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