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11.15.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

Kailash

बीसवां दिन / इक्कीसवां दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

23/6/2010 (बीसवां दिन)
कुगु में तीसरा दिन
एक सौ आठ कुंड

सुबह उठे बाहर आए तो देखा आकाश बादलों से घिरा था, हल्की फुहारें पड़ रहीं थीं और हवा गतिमान थी। बाहर बहुत ठंड थी। दैनिकचर्या से निपटकर चाय लेकर कमरे में आकर रजाई में बैठ गए।

आठ बजे पुनः बाहर गए तो फुहारें तो रुक गयीं थीं पर बादल डटे हुए थे। एलओ ने सभी यात्रियों को मानस में स्नान न करने की हिदायत दे दी थी।

 हाथ-मुँह धोकर वस्त्र बदलकर रसोई की ओर मुड़ गए। वहाँ स्मिताबेन, नलिनाबेन,गीताबेन और श्रीमती बैठी हुई थीं। नाश्ते में उन्होंने उपमा बनाया था। दोपहर के लिए गुजराती खिचड़ी बनाने का कार्यक्रम चल रहा था। मैंने थोड़ा सा उपमा खाया दोबारा चाय पी और कमरे में आकर बैठ गयी। थोड़ी देर तो त्यागी-युगल और स्नेहलता से बातचीत करती रही बाद में सो गयी।

साढ़े दस बजे के आसपास पुनः कमरे से बाहर आकर देखा तो बादल छँट गए थे, थोड़ी धूप चमक रही थी। कई यात्री मानस में स्नान करने और जल भरने जा रहे थे, पर हम मन मसोस कर रह गए क्योंकि एक तो हमारी तबियत पूरी तरह ठीक नहीं थी दूसरे कोई महिला यात्री किनारे तक भी नहीं जा रही थी। हमने जल भर के लाने को मधुप और जुनेजा को अपनी बोतलें दे दीं।

लंच में खिचड़ी के साथ-साथ स्मिता और गीता बेन ने अपने साथ गुजरात से लायीं पिन्नी (लड्डू) भी मिष्ठान के रूप में खिलायी। खाना खाते समय ही गुरु ने बताया कि बस में बैठकर एक सौ आठकुंड देखने जाना था। उसका अलग से ग्यारह युआन प्रति सवारी दिया गया था।

हम सब तैयार होकर बस में बैठ गए। प्रकाशवीर, सुरेश और राजेश इत्यादि यात्रियों ने अपने कपड़े भी रख लिए थे स्नान करने हेतु।

स के किनारे-किनारे जाते हुए बीस/पच्चीस मिनट बाद एक स्थान पर रुक गयी। सभी यात्री नीचे उतर गए। गुरु सभी को इकट्ठा करके मानस के तट पर ही एक सौ आठ कुंड इशारे से बताने लगा। जिस-जिस स्थान पर लामाओं ने तपस्या की थी वहीं एक सौ आठ कुंड कहे जाते हैं। वहाँ अलग से कुछ नहीं था। किनारे पर दलदल थी और मानस के तट कटे हुए थे। वहाँ मानस थोड़ी अधिक गहरी प्रतीत हो रही थी।

गुरु के साथ कुछ यात्री घूमते रहे, पर हम तो थकान महसूस कर रहे थे सो महिला यात्री तट पर हल्की सी घास पर बैठ गए।

तभी पुनः आकाश में गहरे बादल घिरने लगे। धीरे-धीरे बूँदें पड़ती हुई तेज़ बारिश होने लगी। हम सभी यात्री भीगने से बचने के लिए दौड़कर बस में चढ़ गए, पर बादल खेलकर रहे थे, बारिश बंद हो गयी। हम नीचे न उतरे। सभी ने वहाँ कुछ भी दर्शनीय न होने के कारण वापिस गेस्ट-हाऊस जाने की इच्छा जतायी तो गुरु को भी मानना पड़ा।

चूँकि वह स्थान गेस्ट हाऊस से मुश्किल से चार/पाँच किमी था सो एलओ के साथ चैतन्य और अमर इत्यादि उत्साही युवा यात्रियों ने मानस के किनारे-किनारे पैदल जाने का फैसला लिया। हम दो बजे के आसपास बस से वापिस गेस्ट-हाऊस आ गए। सब ने प्रकाशवीर इत्यादि का बहुत मज़ाक बनाया, "होगया स्नान एक सौ आठ कुंडों में?"

छ देर आराम किया, फिर लगेज संभाला। शाम को चाय पीकर मोनेस्ट्री चले गए। वहाँ थोड़ी देर ध्यान लगाया, मानस को प्रणाम किया, कुछ चित्राकंन किया और वापिस आकर बिस्तर में लेट गए।
शाम को फिर बारिश हो रही थी। हम अच्छा महसूस नहीं कर रहे थे हमें वीकनेस लग रही थी। सो न तो खाना खाया और न एलओ की मीटिंग में गए, अपने पास रखा एनर्जी-ड्रिंक पीकर सो गए।

कुगु से कीहू
24/6/2010 यात्रा का इक्कीसवाँ दिन
कुगु से कीहू
दूरी दस किमी.
शिवधाम कैलाश से विदा

सुबह साढ़े पाँच बजे आँख खुल गयी, उठकर बाहर आकर देखा तो आकाश बादलों से ढका हुआ था, हल्की बूँदा-बाँदी हो रही थी। रात को बारिश हुई थी अहाता गीला था। अन्य यात्री भी अपने-अपने कमरे के दरवाज़े से बाहर झाँक रहे थे।

टॉयलेट बहुत दूर था सो मैं छतरी लेकर दैनिक-चर्या से निपटकर गर्म पानी हेतु किचन में गयी। कुक चाय बना रहे थे। मैं गर्मपानी से हाथ-मुँह धोकर वापिस कमरे में आ गयी। कुक सभी कमरों में चाय दे गया।

आठ बजे के आसपास बारिश बंद हो गयी पर हवा और बादल ठंड बनाए रखने में सहयोगी हो रहे थे फिर भी सभी यात्री बाहर निकल आए थे। एलओ और कुछ यात्री दिखाई नहीं दे रहे थे।

पता चला कि एलओ ने रात मींटिंग में ही बता दिया था कि अगले दिन दस बजे बस से किहू के लिए रवाना होना था पर एलओ और कुछ अन्य यात्री अमर, चैतन्य, मधुप और महेश इत्यादि पैदल अलसुबह ही निकल गए थे।

हमने अपना लगेज पैक किया और एक दिन के लिये सामान बाहर रैकसैक में रख लिया और सामान के बैग बस के पास रख आए। बालाजी इत्यादि लगेज कमेटी गुरु के साथ सामान बस की छत पर रखवा रही थी।

हम मानस में स्नान करना चाहते थे पर अन्य यात्रियों ने मौसम की दुहाई देकर आग्रहपूर्वक मना किया सो मान गए। वस्त्र बदल कर स्नेहलता के साथ यज्ञ वाले चबूतरे की ओर से मानसतट पर जाकर नमस्कार करके अर्घ्य दिया और कैलाश को नमन करके भोलेबाबा से प्रार्थना की।

कुछ यात्री थोड़ा आगे जाकर बॉटल में मानस-जल भरकर ले जा रहे थे हमने भी सुरेश से एक और बॉटल भरवा ली। वहीं ज्योत्सना और रश्मि शर्मा भी घूम रहीं थीं। हम सभी मानस के दिव्य सौंदर्य की चर्चा कर ही रहे थे कि बालाजी अपना हैंडीकैम लेकर आ गए और हम सब का अलग-अलग यात्रा संबंधी अनुभव रिकार्ड किया। बालाजी ने एलओ सहित पूरे दल के सदस्यों के यात्रा के अनुभव रिकॉर्ड कर विडियो-रील बनायी थी।

हम रिकॉर्डिंग कराकर बालाजी को बताकर मोनेस्ट्री में चले गए। मोनेस्ट्री में स्वच्छता और सजावट तो दर्शनीय थी ही। पता चलता था कि काफ़ी धन लगाकर मोनेस्ट्री का प्रबंधन होता है। गुरु ने बताया था कि वहाँ मानस के तट पर बारह मास तीसों दिन लामा लोग रहते हैं। जब सर्दियों में तापमान माइनस से भी बहुत नीचे हो जाता है तब भी मोनेस्ट्री बंद नहीं होती। हम कुछ देर वहाँ बैठकर ध्यान लगाए और वापिस गेस्टहाऊस की ओर आ गए।

वहाँ पहुँचकर पता चला नाश्ता में उपमा बना था। सभी ने अचार, पापड़ और चटनी के साथ मज़े से खाया। गुरु ने सभी को बस में बैठने को कहा तो सहयात्री चंद्रेश पटेल ने और अन्य यात्रियों के साथ यात्री-फ़ंड (हम सब का अपना) से उन तिब्बती-बुज़ुर्ग को सौ युआन भेंट किए जो सुबह कड़कती ठंड से लेकर रात सोने तक बिना चिड़चिड़ाए हमारे कमरों तक गर्मपानी पहुँचाते थे और सफ़ाई-स्वच्छता का पूरा ध्यान रखने के साथ-साथ हमेशा सहायता के लिए तैयार रहते थे। लगभग साढ़े ग्यारह बजे बस में बैठ गए।

बस के ड्राइवर ने जैसे ही बस स्टार्ट की तो यात्रियों ने विदाई-भाव के साथ शिव-धाम कैलाश और देव-सरोवर मानस को नमन किए और "हर-हर महादेव" के जयकारे लगाए। सभी कैलाश से विदा लेते में भावुक थे क्योंकि आगे धीरे-धीरे कैलाश के दर्शन छिप जाते हैं। यही बाबा भोले के धाम के अंतिम दर्शन थे।

हमारी बस मानस के किनारे-किनारे बने रास्ते पर जा रही थी। हम मानस के विशाल रूप को देखकर मुग्ध हो रहे थे। 88 किमी परिधि वाली मानस! कहते हैं कही-कहीं इसकी गहरायी 90 मीटर तक है! स्वच्छ और विशाल जलराशि जिसमें कहीं-कहीं श्वेत बत्तख तैरती भी दिखायी दीं शायद उन्हें ठंड नहीं लगती है। आकाश के बादलों के कारण उस समय मानस बहुत हल्के नीले रंग में दृष्टिगोचर हो रही थी।

मानस के किनारे-किनारे पक्की सड़क का निर्माण हो रहा था। कई-जगह रास्ते में व्यवधान के कारण बीच-बीच में रुकती हुई बस चलती-चलती एक जगह रुकी तो गुरु ने सभी यात्रियों को उतरने को कहा। हमने सोचा ज़्यादा देर का अड़ंगा होगा पर पता चला कि वहाँ एक ओर मानस तो दूसरी ओर पहाड़ों की कंदराओं में मोनेस्ट्री बनी हुयीं थीं जो हमारी यात्रा के दर्शनीय-स्थलों की लिस्ट में थीं, सो गुरु ने उन मोनेस्ट्रीज़ को देखने जाने के लिए कहा।

गुरु के साथ कुछ यात्री चले गए। बाकी हम सब कुछ देर तक तो मानस के तट पर खड़े होकर उसकी अथाह गहराई और विशाल फैलाव को देखते रहे उसके बाद वहीं किनारे पर फैले पत्थरों में "ॐ" लिखे और शालिग्राम जैसे जनेऊधारी पत्थर बीनने लगे। जब सब यात्री उतर आए तो गुरु ने गिनती करके बस-ड्राईवर से चलने के लिए कहा और बस दौड़ने लगी। लगभग तीन बजे हम किहू पहुँच गए।

एल ओ और अन्य यात्री पहले से पहुँचे हुए थे पर वे सब भी किसी स्थानीय बस से पहुँचे थे पैदल नहीं पहुँच सकते थे। एलओ ने कमरा नं० और सहयात्री बताए। हमारा पूरा ग्रुप एक ही कमरे में था।

हम सामान रखकर बाहर आए तो गुरु सभी को सड़क पार कुछ दूर ले गया और मानस से निकली नदी जो सूखी हुई थी जिसमें पानी नहीं था वह दिखाने ले गया। सारे में पत्थर ही पत्थर फैले हुए थे। गुरु ने कहा कि यहाँ ॐ लिखे पत्थर मिलते हैं, पर भाग्यशाली यात्रियों को ही दिखायी देते हैं। सभी पत्थर ढूँढने लगे। दूर प्रकृति के दृशय अद्भुत थे।

हमने लोगों के पत्थर बीनते हुए फोटो खींचे और वापिस स्नेहलता के साथ कमरे में आ गए। कमरा सड़क के किनारे (सभी एक पंक्ति में) बहुत साफ़-सुथरा और हवादार था। कमरे की छत पर भी तिब्बती कला का प्रदर्शन हो रहा था। पर टॉयलेट यहाँ भी वही कच्चे और बहुत ही गंदे थे। लोग कमरों के पीछे जाकर खुले में ही निपट रहे थे।

कुक ने चाय बनायी और कमरे में ही दे दी। हम सब ने अपने साथ लाए खाने के सामान नमकीन, बिस्कुट, सकलपारे इत्यादि निकाले और चाय के साथ खाने लगे।

कुछ यात्री सामने बुद्ध के प्रथम शिष्य स्कंद की पहाड़ की चोटी पर बनी मोनेस्ट्री देखने चले गए तो कुछ मानस के किनारे नेपाल के संत प्रकाशगिरि की तपस्या-स्थली गुफ़ा देखने चले गए।

हम और स्नेहलता भी मानस के तट की ओर जारही सड़क पर चल दिए। यहाँ मानस पूर्व दिशा में है। उस समय बिल्कुल आमने-सामने मानस और सूर्य! सूर्य दैदिप्यमान हो रहा था। हम सड़क के अंतिम छोर पर पहुँच गए। उसके आगे रेतीला और दलदली क्षेत्र था। वहाँ कंटीले तारों की बाढ़ लगी थी। हम उससे आगे नहीं गए। वहाँ कोई भी नहीं था।

किहू में मानस के किनारे से ल्हासा और काठमांडू तक सड़क बनी हुई है। यहाँ प्रायवेट टूर वाले भी तीर्थ यात्रियों को रोकते हैं। उनके गेस्ट हाऊस साथ ही पर अलग बने थे। थोड़ी दूरी पर ही एक सरकारी डिस्पेंसरी बनी हुई थी। हमने क्रॉस के चिह्न से पहचान तो लिया पर फिर भी कुक से पूछकर कन्फ़र्म कर लिया क्योंकि वहाँ अँग्रेजी में कुछ नहीं लिखा था। आसपास थोड़ी दूर पर ग्रामवासियों की झोंपड़ियाँ भी बनी थीं जिनके आसपास स्थानीय बच्चे भी खेल रहे थे।

हम लौट रहे थे कि रास्ते में स्मिताबेन और गीता बेन टहलती मिल गयीं हम चारों एक साथ टहलने लगे। शाम होने के साथ-साथ रेगिस्तान जैसी धूलभरी हवा बहुत तेज चल रही थी। हम वापिस अपने कमरे में आ गए।

शाम को गुरु के सहयोग से एक रेस्टोरेंट के सोफ़ों पर बैठकर भजन-प्रार्थना की और एलओ की मीटिंग अटेंड की। सुबह छः बजे प्रस्थान समय बताया गया।

रात का खाना बालाजी और वीना मैसूर ने तैयार कराया। कर्नाटक में बनाए जाने वाले विशेष विधि से चावल पकवाए गए। हमने बहुत थोड़ा खाना खाया और कमरे में आकर सो गए।

 क्र्मशः

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