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10.26.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

Kailash

अट्ठाहरवां दिन / उन्निसवां दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

21/6/2010 (अट्ठारहवाँ दिन)
दार्चेन से कुगु फरहंध
(१२०किमी)
मानस के किनारे प्रथम दिन

बह साढ़े पाँच बजे आँख खुली, खिड़की से हल्की-हल्की रोशनी आ रही थी। मैं उठकर कैमरा लेकर बाहर आ गयी। दूर पश्चिम में दर्शन दे रहे हिम-मंडित धवल कैलाश-धाम को प्रणाम किया कुछ फोटो लिए और इधर-उधर टहलने लगी। कई यात्री टहल रहे थे सभी से "ॐ नमः शिवाय" कहा, हालचाल पूछा और कमरे में आ गयी।

कमरे में लगेज ठीक किया और अहाते में खड़ी बस के पास रख दिया। लगेज कमेटी हरकत में थी।

दैनिकचर्या से निपटकर हाथ-मुँह धोकर वस्त्र बदलकर रसोई में चाय नाश्ता लेने चली गयी। नाश्ते में उपमा बना था थोड़ा सा नाश्ता किया, चाय पी और कमरे में आकर सहयात्रियों के साथ बैठ गयी।

वरांडे में हलचल थी। कोई लगेज ले जा रहा था तो कोई लगेज बाँध रहा था। हम बाहर वरांडे में ही आ गए और एक दूसरे की सहायता करने लगे।

सात बजे एलओ की सीटी बज गयी। सभी उनके पास अहाते में उपस्थित हो गए। ग्रुपलीडर्स ने गिनती की और सभी बस में बैठ गए।

यात्रियों के चेहरे उनकी प्रसन्न्ता बयान कर रहे थे। प्रकाशवीर ने जयकारे लगवाए। सभी ने दुगुने उत्साह से जय-जयकार किया और भोले का आभार! जो उन्होंने हमें अपने धाम बुलाया!

बस चलते हुए दारचेन से निकलकर गाँव मैदान और पठार पार करती विशाल मानसरोवर के किनारे-किनारे बनी पक्की सड़क पर दौड़ रही थी। हम बस की खिड़की से मानस सरोवर को निहार रहे थे। कभी पास लगती तो कभी दूर! झील के पार कैलाश-पर्वत भी साथ-साथ दर्शन दे रहे थे।

कई जगह रास्ते में सड़क-निर्माण हो रहा था। चीनी और तिब्बती मज़दूर काम करते दिखायी दिए।

लगभग सवा ग्यारह बजे मानसरोवर के किनारे बने कुगु के गेस्टहाऊस के प्रांगण में बस रुकी। सभी शीघ्रता से नीचे उतर आए।

गेस्टहाऊस में दो ओर आमने-सामने पंक्तिबद्ध कमरे बने थे। सभी के दरवाज़े प्रांगण में खुलते थे पर एक पंक्ति की खिड़कियाँ मानसरोवर की ओर खुलती थीं तो दूसरी पंक्ति की मान्धाता पर्वत की ओर।

अन्य दो साइड्स में एक ओर दरवाज़ा बना था मोनेस्ट्री की ओर, तो दूसरी ओर खुला क्षेत्र था, उसी ओर दो टॉयलेट बने थे। दोनों ओर से मानसरोवर झील के किनारे तक पहुँचा जा सकता था।
एलओ ने कमरे और सहयात्री बताए। मैं, स्नेहलता और त्यागी दंपत्ती मान्धाता पर्वत वाली साइड के कमरे में ठहरे।

कमरा बहुत बड़ा था। साफ़-सुथरा और सज्जित। दरवाज़े के बिलकुल सामने पूरी दीवार की चौड़ाई में बड़ी खिड़की जिसपर काँच के डबल दरवाज़े थे।

मौसम साफ़ था। धूप खिली थी सो पहले यात्रा पर आ चुके यात्रियों से सलाह करके एलओ ने निश्चय किया कि मानस में डुबकी उसी दिन लगा ली जाए क्योंकि अगले दिन मौसम अनुकूल हो या न हो। सभी प्रसन्न्ता से चिल्ला उठे! यही तो सब चाहते थे।

एक पल भी बिना गँवाए अपना लगेज कमरे में रखा, आवश्यक सामान निकाला और खुले क्षेत्र की ओर से मानस की ओर चले गए।

स्त्रियों और पुरुषों के स्नान हेतु अलग-अलग स्थान निर्धारित किए गये थे मैं, स्मिताबेन, गीताबेन, नलिनाबेन और हेमलता एक कि.मी. चलकर बताए हुए स्थान पर जाकर रुक गए। हमारे से कुछ पीछे ज्योत्सना शर्मा, रश्मि खंडूरी और रश्मि शर्मा भी पहुँच गयीं। इतनी पास से मानस!!! अनेक झील देखीं हैं पर यह दिव्य झील मानो नीलमणि पिघलकर बह रही हो!!! कहते हैं ब्रह्मा ने देवताओं के लिए इसे रचा! स्वच्छ जल! आकाश जिसमें डूबता सा लगता था लहरें मानों अनुशासन में नापकर दूरी तय करती हों और सामने भव्य कैलाश का दर्शन! क्या कहें लिखने में भी रोमांच होता है!

देखने में ही इतने खो गए कि स्नान याद ही नहीं रहा। तब ज्योत्सना ने स्नान करने को कहा। हम सामान का बैग दूर किनारे पर सूखे में रखकर (क्योंकि लहरों के आने से बहुत दूर तक किनारे का क्षेत्र गीला था।) बेंत लेकर आगे गए। पहले झुककर नमस्कार किया और पिघली बर्फ़ से ठंडे जल को दोनों हाथों में लेकर मस्तक से लगाया। स्वच्छ जल के नीचे तलहटी साफ़ नज़र आ रही थी।

जैसे ही जल में जाने के लिए पैर आगे बढ़ाए नीचे बैठी गाद पानी पर आगयी और जल मटमैला सा हो गया। गहरायी दिखायी देनी बंद हो गयी।

कुछ सहयात्री वहीं बैठकर हाथ से जल लेकर शरीर गीला करने लगीं पर हम- स्मिताबेन, नलिनाबेन और स्नेहलता बेंत के सहारे झील के अंदर थोड़ा आगे तक गए, बैठकर सिर तक कई डुबकी लगायीं। कैलाश-पर्वत की ओर मुँह करके अर्घ्य दिया और शिवशंकर से प्रार्थना की।

तेज़ धूप में भी ठंड लग रही थी सो जल्दी ही वापिस आ गए। गेस्टहाऊस पहुँचने पर अशोककुमार जी ने बताया - "हवन भी अभी होना है, सामग्री लेकर पीछे निर्धारित स्थान पर पहुँचो।"

हम सब अपने साथ लाए पूजा की सामग्री लेकर पीछे मोनेस्ट्री की ओर मानसरोवर के किनारे चबूतरे पर बने हवन-कुंड की ओर चले गए।

वहाँ अशोककुमार और कई यात्री हवन की वेदी तैयार कर रहे थे। स्मरण रहे दिल्ली में प्राईवेट संस्था ने मेडिसिन के साथ-साथ पाँच किलो पूजा-सामग्री भी हमारे दल को उपहार में दी थी।

हम भी उनके साथ सामग्री तैयार कराने में जुट गए। धीरे-धीरे करके सभी यात्री वहाँ पहुँच गए।

मानस के तट पर सम्मुख दृष्टिगोचर कैलाश-धाम की ओर मुख करके एक साथ सभी ने मंत्रोच्चार के बीच सभी देवताओं के नाम लेकर १०८ आहूतियाँ दीं। गौरीशंकर और गणेशजी की आरती की गयी। अपने साथ लाए पंच मेवा के प्रसाद का भोग लगाया और यज्ञ-अग्नि को मानस के जल से ठंडा करके प्रभु को धन्यवाद किया जो उन्होंने हमें बड़भागी बनाया इतने पवित्र-स्थान पर पहुँचने का! सभी ने यज्ञ की राख को अपने मस्तक पर लगाया, दंडवत किया और अपनी अनजान त्रुटियों के लिए क्षमा-याचना की।। इस तरह प्रथम दिन देव-सरोवर पर पूजा संपन्न हुई।

कुछ यात्री चबूतरे से उतरकर नीचे रेत में चले गए तो कुछ (जिनकी ड्यूटी थी) भोजन का प्रबंध करने चले गए। मैं और स्नेहलता चबूतरे पर मौन बैठे आकाश के रंग के साथ मानस के बदलते रूप को निहारते रहे।

थोड़ी देर में कुक सभी को खाना खाने के लिए बुलाने आया। निलय बनर्जी ग्रुप ने दाल-रोटी, सब्जी, चावल और खीर बनवायी थी। खुले आँगन में धूप में खाना - गर्म-गर्म रोटी! और भाव से परोसी जा रहीं थी सभी ने स्वादानंद उठाया।

भोजन के पश्चात आधे घंटे आराम करके हम पास में ही बनी मोनेस्ट्री में चले गए। बाहर से बिलकुल साधारण सी लगने वाली लकड़ी से निर्मित दुमंज़िला मोनेस्ट्री अंदर से बहुत भव्य थी। सामने ध्यान-कक्ष में स्वर्ण-मूर्तियाँ विराजित थीं। एक दीपक जल रहा था। विलक्षण शांति पसरी हुई थी। कुछ देर आँखें बंद करके मन एकाग्र किया और ध्यान लगाया।

बाहर आकर दूसरी मंज़िल पर गए जहाँ लामा लोगों का निवास स्थान था। वहाँ एक सेटेलाइट फोन भी था पर वह निश्चित समय पर ही चालू किया जाता था सो हम नीचे उतर आए।

शाम होते ही शीत-लहर सी फैल गयी थी। हम ठीक महसूस नहीं कर रहे थे सो अपने कमरे में आ गए और रजाई में दुबक गए। कमरे में ही चाय आ गयी।

रात का भोजन रश्मि खंडूरी ग्रुप ने तैयार कराया। आइटीबीपी के कमा. इन चीफ़ ने हमें उपहारस्वरूप उबले आलू का पाऊडर दिया था। रश्मि ने उसी को मिलाकर आलू के परांठे बनवाए थे। हमारी तबियत ठीक न होने के कारण हमने रात का खाना नहीं खाया और नहीं एलओ की मीटिंग में गए बस आराम करते रहे।

रात को स्नेहलता ने बताया कि गुरु ने बस को मोनेस्ट्री के पास मानस के तट पर खड़ा करा दिया था ताकि तीर्थयात्री रात में ठंड से बचते हुए बस में बैठकर ब्रह्मसरोवर में स्नान हेतु उतरते देवगणों के दर्शन कर सकें।

मैंने स्नेहलता से रात को बस में बैठने जाने के लिए जगाने को मना कर दिया और अपने बिस्तर में ही सोती रही। आगे अभी दो दिन और मानसरोवर के सान्निध्य में रहना था।

कुगु में दूसरा दिन
22/6/2010 यात्रा का उन्नीसवाँ दिन
मानस के किनारे कुगु में दूसरा दिन

रात को जल्दी सो जाने से सुबह पाँच बजे आँख खुल गयी, पर चुपचाप बिस्तर पर पड़ी रही क्योंकि सहयात्री सोए हुए थे, दरवाज़ा खोलती तो उन सब की आँख खुल जाती। अभी सोच ही रही थी कि किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। मैंने उठकर देखा तो दरवाज़े पर एक तिब्बती बुज़ुर्ग हाथ में गर्म पानी का थरमस लिए खड़े थे। मैंने उन्हें अंदर आने दिया वे टेबल पर रखा खाली थरमस उठा ले गए और गर्म पानी से भरा थरमस रख गए। उनके जाते ही मैं भी बाहर निकल गयी।

वे तो अन्य कमरों में पानी रख रहे थे पर मैं अहाते में खड़ी हो गयी। कुछ यात्री जागे हुए थे वे रात को बस में बैठने की चर्चा कर रहे थे। किसी ने कुछ नहीं देखा बस आकाश में रोशनी सी अवश्य दिखायी दी। मैं ठीक रही अपनी नींद खराब न करी।

अहाते में दूर दायीं ओर टॉयलेट बना था। टॉयलेट था तो गड्ढे के ऊपर ही, पर था साफ़, पानी भी था। मैं दैनिकचर्या से निपटकर रसोई की ओर गयी वहाँ कुक और बिंद्राजी बगैरह चाय बना रहे थे। मैंने मुँह-हाथ धोने के लिए गर्म पानी लिया और बाहर आ गयी।

थोड़ी देर बाद सभी यात्री जाग गए और चहल-पहल हो गयी।

गुजराती महिला यात्रियों ने नाश्ते में पकौड़े बनाए। सभी ने उनके सेवा-भाव की हृदय से प्रशंसा की। उस दिन एकदशी थी मेरा व्रत था। मुझे कुछ खाना-पीना नहीं था सो अपने पलंग पर बैठ कर स्नेहलता से बातचीत करती रही।

थोड़ी देर बाद मैंने और स्नेहलता ने मानस के किनारे बैठने की सोची सो हैंड बैग में अपने-अपने कपड़े रखकर मानस-तट की ओर चले गए।

वहाँ नलिना, स्मिता और गीताबेन पहले से ही पहुँची हुई थीं। वे तीनों मानस के तट पर बिखरे गोलाकार पत्थरों में "ॐ" लिखे पत्थर ढूँढ रही थी। हम दोनों भी उनके साथ-साथ घूमते बातचीत करते काफ़ी आगे निकल गए। जब थक गए तो वापिस होने लगे।

वे तीनों तो गेस्ट हाऊस की ओर चली गयीं, हम वही धूप में पत्थरों पर बैठकर मानस के रूप को निहारते रहे। सूर्य की किरणें और मानस की लहरें क्रीड़ा करते हुए सुंदर दृश्यावलि भेंट कर रहीं थीं। हम उन्हें देखने में खो गए।

थोड़ी दूरी पर ही एक विदेशी सैलानी लड़की चटाई पर बैठी हुई थी, नेपाली टूर-हेल्पर उसके लिए टेंट लगा रहे थे। स्नेहलता उसके पास गयीं और परिचय लिया-दिया तो पता चला वह यूके से आयी थी। मांधाता और गुरिल्ला पर्वतों पर चढ़ाई करके कुछ घंटे मानस के तट पर बैठकर शाम को चले जाना था।

जब धूप में कुछ तेज़ी आ गयी तो मैंने स्नेहलता से मानस-स्नान के लिए कहा। हमने देखा कि उस दिन सहयात्री स्नान करने नहीं गए थे। इक्का-दुक्का सहयात्री दूर आगे जा रहे थे, हमारे कुक मानस-तट से दूर हटकर अपने कपड़े धो रहे थे, पर हमने वहीं थोड़ा अंदर जल में जाकर डुबकी लगायी और बाहर आ गए।

कुछ देर और मानस पर बैठकर पूजा-ध्यान करके हम वापिस गेस्ट-हाऊस आ गए। हमने देखा कि कुछ सहयात्री मोनेस्ट्री की ओर वाले दरवाज़े से जाकर कपड़े धो रहे थे, हम भी अपने पुराने पहने हुए वस्त्र और वाशिंग-पाऊडर लेकर उधर ही चले गए।

गीता-बेन और स्मिताबेन भी अपने कपड़े लेकर आ गयीं। वहाँ पीछे पहाड़ों से जल बहकर आ रहा था जिसे एक गड्ढा करके आगे जाने से रोक दिया गया था उसी जलधारा पर टूटा हुआ डिब्बा लगाकर पानी का निकास सही कर रखा था, बाल्टी और लोहे का तमिया भी पड़ा था। हम सभी ने वही अपने कपड़े धो डाले और मोनेस्ट्री के आगे बने गोम्फ़ा के चबूतरे पर सुखा दिए। स्वयं हवन वाले चबूतरे पर बैठकर कैलाश-मानसरोवर को देखते रहे। हवा और धूप बहुत तेज़ होने कारण कपड़े जल्दी सूख गए।

लंच तैयार होने वाला था सो सभी अहाते में बैठे बातचीत कर रहे थे। उस दिन सुबह से एलओ किसी ने नहीं देखे थे सो सभी उनके बारे में पूछ रहे थे कुछ मज़ाक कर रहे थे कि उनपर फ़ाईन होगा वह अपने बडी को बिना बताए गए थे।

अभी सब बात कर ही रहे थे कि सामने से एलओ और चंदन आते दिखायी दे गए। उन्होंने बताया कि वे सुबह एक दो लोगों को बताकर सामने मांधाता पर्वत पर चढ़कर वहाँ से कैलाश-मानसरोवर के मनोरम दृश्य देखने गए थे। सभी ने लंच किया। हम गेस्ट हाऊस आकर अपने कमरे में सो गए।

तीन बजे अशोककुमार जी ने कमरे में आकर बताया कि मंगलवार होने के कारण उनके कमरे में सुंदरकांड का पाठ किया जाना था। हम उठकर हाथ-मुँह धोकर वहाँ चले गए। काफ़ी सारे सहयात्री वहाँ बैठे हुए थे। सभी ने मिलकर पाठ किया और भजन गाए।

पाठ के बाद हम अपने कमरे में आ गए। कमरे में ही शाम की चाय आ गयी हमने अपने पास रखे ड्राईफूट के साथ चाय पी। यूँ हमसे बिंद्राजी ने व्रत के लिए आलू उबलवाने के लिए पूछा था पर हमने मना कर दिया था। हम थकान सी महसूस कर रहे थे सो पुनः मुँह ढककर सो गए।

शाम को सभी लोग बाहर घूम रहे थे पर हम बिस्तर से न उठे। तबियत फिर खराब सी होने लगी थी। हम लेटे रहे। रात को एलओ की मीटिंग में भी न गए। हमारे ग्रुप-लीडर हमें बुलाने आए पर हमारी हिम्मत न हुई, हम सोना चाहते थे सो सो गए।

 क्र्मशः

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