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10.14.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

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सोलहवां दिन / सत्राहवां दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

डेरापुख से जुथुलपुक (Zonzerbu)
कैलाश-परिक्रमा का दूसरा दिन
डेरापुख से जुथुलपुक(19/6/2010 सोलहवाँ दिन)
दूरी 22.9 किमी
वाया डोलमा-ला पास (कठिनतम और उच्चतम चढ़ाई)
डोल्मा-ला पास ऊँचाई 5750मीटर/19500 फी.

 यह यात्रा-भाग पूरी यात्रा का सबसे कठिन और ऊँची चढ़ाई वाला भाग था। यहाँ मौसम पर निर्भर थे। कब बर्फ़ पड़ने लगे तो कब तेज़ बारिश! सो सुबह साढ़े तीन बजे कमरों में हलचल शुरू हो गयी। मैं उठी और टॉर्च और ब्रश इत्यादि सामान लेकर बाहर जाने लगी तो नलिनाबेन भी मेरे साथ चल पड़ीं। हम दोनों दैनिक-चर्या के लिए स्थान ढूँढ रहे थे पर हर जगह कोई न कोई था सो असमंजस्य में थे तभी गीताबेन ने हमें पीछे जलधारा के पास जाने को कहा वहाँ डेरापुख गाँव के लोगों ने जलधारा से पाइप जोड़कर पानी निकालने की जुगत लगा रखी थी।

हम दोनों अँधेरे में डरते-डरते गए और फ़्रेश हो आए। पानी क्या बस बर्फ़ पिघली हुई थी। जैसे-तैसे कंपकंपाते हुए मुँह-हाथ धोकर तैयार हुए और रसोई में आकर चाय और रस्क खाए। हॉट-चाकलेट भी थी।

एलओ और अन्य यात्री तैयार खड़े थे। पोर्टर्स भी आ गए थे, मैं अपनी पोर्टर को पहचान न पायी। ठंड के कारण सभी मुँह ढके हुए थीं। पर उसने मेरे पास आकर मेरा बैग ले लिया।

एलओ और गुरु जल्दी मचा रहे थे। परिक्रमा पर जाने वाले सभी यात्रियों के आने पर एलओ ने सीटी बजाई और जयकारे के साथ सभी को आगे बढ़ने को कहा।

कुछ लोग यात्रा कठिन होने के कारण सब की सहमति से वापिस दारचेन जा रहे थे। गुरु ने उनको वहाँ पहुँचाने का प्रबंध कर दिया था।

हमने सवा चार बजे डेरापुख कैंप छोड़ दिया। मैं अपनी पोर्टर के साथ छड़ी के सहारे काफ़िले के साथ आगे बढ़ गयी।

शिवस्थल (यम का दरबार -यहाँ बैठकर यम सबका हिसाब करते हैं)-

जलधारा पार करके एक ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर बिलकुल सुनसान निर्जन स्थान पर जहाँ हवा का वेगवान थी, पहुँच गए। वहीं पोनी भी खड़े थे। यात्रियों की साँस बुरी तरह फूल रही थी। सभी कहीं-कहीं दूर मिट्टी के टीलों पर बैठकर अपने को सामान्य बना रहे थे।

इतने ही मेरी पोनी वाली मेरे पास आकर मुझे पोनी पर बैठने का इशारा करने लगी। मैं उसे देखकर अति प्रसन्न हो गयी और तत्परता से उसके साथ जाकर पोनी पर बैठ गयी।

आगे कोई रास्ता या संकेत नहीं था। पठार और पर्वत का मिलाजुला विस्तार-क्षेत्र था। चारों ओर ऊँची-ऊँची विशाल पर्वत मालाएँ फैली थीं। पहाड़ी और पठारी बड़े-बड़े टीलों/ढेरों के बीच कहीं-कहीं कंटीली झाड़ियाँ थीं, निकलने की बिलकुल जगह न थी, पोनी भी बहुत कठिनाई से निकल रहा था। पोनीवाली लड़की बड़ी मुश्किल से नियंत्रण कर रही थी बार-बार पोनी रुक जाता था या अपनी मर्जी से इधर-उधर मुड़ जाता था। मैं चुपचाप पोनी पर बैठी रही।

जब पोनी बहुत परेशान करने लगा तो उसने अपने साथ दूसरे पोनी वाले से कुछ कहा और सुना। उसके बाद वह पोनी को पोनी की मर्जी से चलाने लगी। वह अन्य खच्चरों से हटकर अलग रास्ता पकड़ लेता था। शायद भूखा भी था बार-बार झाड़ियों में से हरे पत्ते टूंगने लगता था। लड़की उसकी लगाम कसती तो आगे बढ़ता।

हम लगभग साढ़े पाँच हज़ार मीटर ऊँचाई पर बहुत ही दुर्गम रास्ते को पार करते जा रहे थे। हमें वहाँ कोई भी स्थानीय व्यक्ति या जानवर न मिला, पर इन टीलों में लोगों के पुराने कपड़े यहाँ-वहाँ फैले पड़े थे। कहते हैं यह शिव-स्थल है। यहाँ यमराज हमारे कर्मों का हिसाब करते हैं।

तीर्थयात्री अपने पुराने कपड़े यहाँ छोड़ जाते हैं। बड़ी संख्या में कपड़े और प्लास्टिक की बॉटल इधर-उधर फैली पड़ी थीं। बड़ा अफ़सोस हुआ यह देखकर! पर हमारे दल के किसी भी व्यक्ति ने कुछ भी सामान नहीं फेंका। हम सब प्रकृति को गंदा न करने की शपथ लेकर आए थे।

सवा दो घंटे तक ठंडी और तेज हवा के बीच उन पठारी टीलों को पार करके हम साढ़े छः के आसपास खड़ी ऊँची पहाड़ी पर चढ़ने लगे। चढ़ाई मानों किसी दीवार पर चढ़ रहे हों। पोनी बार-बार पीछे को आता मैं बड़ी मुश्किल से, पोनी की गर्दन तक अपना सिर झुकाए हुए संतुलन बनाए बैठी थी।

पोनीवाली का साँस फूल रहा था वह रुक-रुककर गहरी साँस लेती मैंने उससे उतरने की पेशकश की तो वह इशारे से मुझसे बैठे रहने को कहने लगी। साथ चल रहा गुरु भी बैठे रहने को कहने लगा।

डोलमा-ला पास (लगभग 4 किमी)

सात बजे हम 5750 मीटर की ऊँचाई पर पहुँच गए। थोड़ा सा ही आगे जाने पर लड़की ने मुझे पोनी से उतार दिया और स्वयं अन्य पोनी वालों के साथ चली गयी। पोर्टर मेरे साथ रही।

मैं कुछ पल के लिए खड़ी देखती रही। चहुँ ओर से उच्चतम पर्वत-मालाओं से घिरा, फैली हुई विशालाकार चट्टानों/शिलाओं से पटा पड़ा विशाल दर्रा – डोलमा-ला पास!!!

शिलाओं और चट्टानों के बीच-बीच में बर्फ़ जमीं थी। बर्फ़ पर बहुत फिसलन थी। हवा बर्फ़ीले तूफ़ान के रूप में थी। साँस घुट रही थी। कोई जगह चलने के लिए नहीं थी।यात्री बर्फ़ से बचते हुए वहीं-कहीं बड़ा सा पत्थर देखकर उसपर बैठते जा रहे थे। मैं भी वहीं बैठ गयी। भगवान को प्रणाम किया और अपने बैग से ड्राई-फ्रूट का पैकेट निकालकर खाया और थोड़ा पोर्टर को दिया।

पोर्टर आगे बढ़ने की जल्दी मचा रही थी। वह बार-बार मेरा हाथ पकड़ती और उठने का इशारा करती उसके साथी पोर्टर उसे बुला रहे थे। मैंने भी सोचा आगे बढ़ ही लिया जाए। सो एक हाथ में बेंत और दूसरे से पोर्टर का हाथ पकड़कर एक चट्टान से दूसरी चट्टान पर पैर रखती चलने लगी।

अब हम नीचे की ओर जा रहे थे। प्रकृति के अनोखे-दृश्य देखते चट्टानों/शिलाखंडों पर छलांग लगाते उतरते जा रहे थे। कुछ दूर जाने पर दाँयीं ओर नीचे घाटी में चारों ओर से पर्वत मालाओं से घिरा हिम-मंडित "गौरी कुंड" दिखायी दिया। कहते हैं मां पार्वती का स्नान-स्थल है वह, जहाँ पर्वतीजी ने अपने मैल से गणेशजी को उत्पन्न किया और पहरेदारी करने बैठा दिए। जब गणेशजी ने भगवान शंकर के प्रवेश पर ही रोक लगा दी तो शिव ने उनके सिर को धड़ से अलग कर दिया। तत्पश्चात पार्वती के रुदन से द्रवित होकर शिव ने गणेश के गज का मुख प्रत्यारोपित करके उन्हें गजानन बना दिया।

हम नतमस्तक हुए और प्रभु का स्मरण करके आगे बढ़ गए।

पत्थरों पर चढ़ते-उतरते पैर और घुटने बिलकुल बेहाल थे पर प्राकृतिक-छटा का दिव्य रूप मन मोह लेने वाला था।

वतों की चट्टानों के प्राकृतिक-डिजाइन पच्चीकारी स्तब्ध कर रहीं थीं, मंत्र-मुग्ध कर रही थी। कहीं-कहीं चट्टानें पताका रूप में पर्वत-शिखर पर लहरा रहीं थीं!

पथरीले मार्ग से उतरने का अंत मिट्टी के सूखे टीलों से उतरने के साथ था। बिल्कुल रेतीले पठारी मिट्टी के खड़े उतार से उतरने में मैं बार-बार फिसल जाती। संतुलन बन ही न रहा था। मेरी पोर्टर इतनी छोटी थी कि अगर मैं उसका सहारा लेती तो वह भी मेरे साथ ही गिर जाती:)

उसने एक अकेले जाते पोर्टर से मुझे हाथ पकड़कर उतारने के लिए कहा तब कहीं जाकर मैं नीचे ल्हाचू घाटी में पहुँची।

नीचे विश्राम हेतु समतल स्थान था। कई सहयात्री आकर बैठे हुए थे। गुरु ने कुछ समय निश्चित किया था वहाँ से निकलने का। मैं भी एक ऊँची सी जगह पर बैठ गयी।

वहाँ एक छोटी सी दुकान भी थी जिसमें कोल्डड्रिंक, पानी के बॉटल और चाक्लेट इत्यादि मिल रहे थे। तिब्बती दुकानदार तीर्थयात्रियों को सामान दुगुनी क़ीमत में दे रहा था जबकि अपने पोनीवाले और पोर्टर्स को कम क़ीमत में। मैंने पोर्टर से कोल्डड्रिंक की तीन बोतल मंगवायीं। एक अपने लिए और दो पोनीवाली और पोर्टर के लिए। पोर्टर अपने लोगों के साथ खाना खाने चली गयी वही मुझे अपनी पोनी वाली भी बैठी दिखायी दी।

थोड़ी देर में पहले बैठे यात्री चल पड़े, उसके कुछ देर में मेरी पोर्टर भी आ गयी और मुझे खींचकर ले जाने लगी। रास्ता गीला था, तभी पोनी वाली आयी और उसे डाँटकर (बोलने के टोन से पता चल गया) मुझे आराम से पकड़ कर थोड़ा आगे ले गयी जहाँ पोनी चर रहे थे। उसने मुझे बहुत आराम से अन्य पोनी वाले की सहायता से पोनी पर बैठाया और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।

हम मिट्टी के ढेरों वाली उबड़-खाबड़ उतार-चढ़ाव रहित घाटी में चल रहे थे। बायीं ओर मंद-मंद बहती नदी थी जिसकी लहरों पर सूर्य की किरणें मानों छटपटा रही हों।

दायीं ओर कैलाश-धाम के दर्शन हो रहे थे। भूरे रंग के पहड़ों के बीच कत्थई धारियों से सुसज्जित धवल कैलाश मानों वलयपूर्ण हों।

हम उस सुनसान निर्जन, वनस्पति-विहीन घाटी में जहाँ जीवन के संकेत के नाम पर नदी थी, में चलते-चलते उबते हुए एक बजे के आसपास जुलुत्पूजुथुलपुक कैंप पहुँचे।

नदी किनारे थोड़ी दूर पर सामने एक लाइन में कई कमरे बने थे प्रत्येक कमरे में पाँच बिस्तर लगे थे। पीने के लिए गर्मपानी का जग रखा था पर यहाँ भी टॉयलेट या बाथरूम नहीं थे। कमरों के पीछे खुले में एक ओर महिलाएँ और दूसरी ओर पुरुष टॉयलेट की तरह जा सकते थे।

ऊपर की ओर एक बौद्ध-मठ था जहाँ पोनी वालों और पोर्टर्स के ठहरने के लिए टैंट लगे थे।

एलओ अभी पहुँचे नहीं थे पर कुछ यात्री पहुँच चुके थे सो किसी भी कमरे में आराम कर रहे थे। मैं भी एक खाली कमरे में बिस्तर पर लेट गयी। कुछ ही देर में एलओ ने पहुँचकर कमरे एवं सहयात्री बताए। मैं, श्रीमती-दंपत्ती और त्यागी दंपती एक कमरे में ठहरे।

एक टेंट रसोई के लिए था। कुक ने आकर बर्तन इत्यादि खोले और चूल्हा सेट करके चाय पिलायी। रश्मि खंडूरी और ज्योत्सना शर्मा ने रेडीमेड राजमा-चावल के पैकेट्स से सभी को लंच कराया। सभी थके हारे थे चुपचाप सो गए।

प्रकाशवीर और सुरेश इत्यादि ने शाम की चाय बनायी और तीनों कुक द्वारा सभी के कमरों में सर्व करा दी।

आज सभी बहुत प्रसन्न थे क्योंकि शिव की कृपा से यात्रा का कठिनतम भाग भी निर्विघ्न पूरा हो गया था। सभी सकुशल रहे और मौसम हमेशा अनुकूल बना रहा। सारी यात्रा मौसम पर ही तो निर्भर थी।

शाम को फिर वही राजमा-चावल के पैकेट्स गर्मपानी में डाले और सर्व किए गए पर कुछ यात्रियों से वह न निगले गए तो स्वयं आधी रात में मैगी बनाकर खा गए।:-)

शाम को अशोक कुमार, के.के.सिंह और मधुप इत्यादि ने अपने कमरे में सुंदरकांड का पाठ किया और एलओ ने मींटिंग की। सुबह पाँच बजे प्रस्थान का समय बताया और हमारे ग्रुप को सुबह के चाय-नाश्ते की ज़िम्मेवारी सौंपी।

नलिनाबेन, श्रीमती दंपत्ती और मैंने रात को ही कुक को सुबह के नाश्ते और चाय के बारे में समझा दिया। वापिस आकर हम सुबह तीन बजे उठने के लिए बिस्तर पर सो गए।

ज़ौंग्ज़ेबू/जुलुत्पू से दारचेन
20/6/2010 सत्रहवाँ दिन
ज़ौंग्ज़ेबू/जुलुत्पू से दारचेन
कैलाश-परिक्रमा का तीसरा दिन
(दूरी 11.6किमी और ऊँचाई 4790किमी )
Zidulpuk/Zulthulpuk/Dzultripuk /Zongzerbu
(हमें नहीं मालूम कि कौन सही नाम और वर्तनी है)

सुबह तीन बजे उठकर दैनिकचर्या से निपटकर मैं सीधे रसोई वाले टैंट में पहुँच गयी। वहाँ श्रीमती और उनके पति (हमारे ग्रुप के लीडर थे) पहले से पहुँचे हुए थे। हमने कुक की सहायता से पहले दोनों चूल्हों पर बड़े भिगोनों में पानी गर्म होने रखवा दिया। एक में चाय-चीनी इत्यादि डालकर चाय बनने रख दी दूसरे का पानी सहयात्रियों को पीने के लिए छोड़ दिया। जब चाय बन गयी तो दो कुक केतलियों में चाय लेकर कमरों में ही सर्व करने चले गए।

इतने ही नलिनाबेन भी वहाँ पहुँच गयीं। हमने नाश्ते में मैगी और मीठी सैंवैंया बनवायीं थीं। अभी यात्री ठीक से तैयार भी न हुए थे कि भाई प्लेट और चमचा लेकर अहाते में बजाने लगे – "नाश्ता तैयार है" कुछ यात्री तो नाश्ता करने लगे पर कुछ ने "बहुत जल्दी है" कहकर टाल दिया।

एलओ और अन्य यात्री हमारे ग्रुप की तत्परता पर बहुत खुश थे। उन्होंने सभी यात्रियों को जल्दी करने को कहा।

पाँच बजे सभी यात्री तैयार थे। नाश्ता हो चुका था। रसोई का सामान पैक किया जा चुका था पर गुरु नहीं पहुँचा था। हम कमरे में जाने लगे तो देखा कि मेरी पोर्टर इतनी जल्दी आकर ठंड में मेरे कमरे के बाहर खड़ी मेरी इंतज़ार कर रही थी। मैंने उसे कमरे में बुला लिया और बैग देकर बैठने को कह वह बाहर चली गयी और अन्य पोर्टर के साथ मिल गयी।

इतने ही गुरु आता दिखायी दे गया। कुक ने बचाकर रखी चाय और नाश्ता उसे दिया और एलओ ने सीटी बजा दी। सभी यात्री प्रांगण में खड़े थे। सभी के चेहरे खिले हुए थे कैलाश-परिक्रमा निर्विघ्न पूरी जो हो गयी थी।

अशोककुमार जी ने शिव-वंदना करायी और प्रकाशवीर ने प्रत्येक दिन की तरह जयजयकार करवाया और सभी चल पड़े। दस मीटर पर ही पोनीवाली ने मुझे पोनी पर बैठा लिया और आगे बढ़ चले।

आकाश में बादल छाए हुए थे। सूर्य उदित नहीं हुए थे पर उनकी लालिमा बादलों को भी चमका रही थी। हवा बहुत ठंडी थी। नदी पर कहीं-कहीं मलाई की तरह बर्फ़ की पपड़ी जमी हुई थी। नदी पार सामने गिद्ध के आकार में पर्वत शांत खड़ा विदाई दे रहा था। सभी अति प्रसन्न थे और चलते-चलते भोले शिव का नाम उच्चरित करते जा रहे थे। तभी हल्की-हल्की फुहार पड़ने लगीं और शीघ्र ही छोटे-छोटे तुषार के मोती के रूप में परिवर्तित होकर झड़ने लगीं। हम तो वाटर-प्रूफ़ जैकेट पहने हुए थे जिन्होंने नहीं पहन रखीं थी वे रुककर पहनने लगे। यात्री ज़ोर-ज़ोर से भोले के जयकारे लगा रहे थे।

कार्य पूर्ण होने पर मंद-मंद तुषार की वर्षा मानों शिव-शंकर प्रसन्न होकर मोती वर्षा रहे हों!! पैदल यात्री नाचने की सी मुद्रा में आगे बढ़ने लगे।

आधे घंटे में ही वर्षा और बर्फ़ पड़नी रुक गयी। आकाश बादलों से ढका रहा।

हम जोंगज़ेर्बू नदी के किनारे-किनारे दूसरी ओर कच्चे पहाड़ों के बीच समतल घाटी में प्रकृति के रूप को निहारते बढ़ते जा रहे थे। आज पोनीवाली भी निश्चिंत थी। उसने लगाम मुझे थमा दी थी और एक लड़के के साथ बातें करती चल रही थी। पोर्टर का तो अता-पता न था दौड़कर आगे निकल गयी थी। बहुत बचपना था उसमें।

साढ़े सात के आसपास पोनी वाली ने मुझे पोनी से उतार दिया। ऊँचाई पर नदी कि बिलकुल ऊपर रास्ता बहुत संकरा था सो सभी को पैदल चलना था क्योंकि लगभग डेढ़/दो किमी के फासले पर हमारी बस खड़ी थी। हम तेज़ी से चलकर वहाँ पहुँच गए।

उस जगह पर काफ़ी भीड़ थी। पोनीवाले पोर्टर और प्रायवेट टूरिस्ट सभी थे। कुछ दुकानें भी थीं जिनपर चाय बिस्कुट और कोल्ड-ड्रिंक मिल रही थी।

हमारे पहुँचते ही पोर्टर ने दौड़कर हमें बैग पकड़ाया और हमसे लिपट गयी, इतने में ही पोनी वाली भी आ गयी। हमने दोनों को कोल्ड-ड्रिंक की बोतलें दिलवायी और कुछ युआन इनाम में दिए दोनों अति प्रसन्न हुयीं और हाथ-हिलाकर धन्यवाद करती हुई दोनों एक ही पोनी पर चढ़कर चली गयीं।

साढ़े आठ बजे तक सभी यात्री बस तक पहुँच गए। एल ओ ने ग्रुप लीडर्स से गिनती करवायी, ओके मिलते ही ड्राइवर ने बस स्टार्ट कर दी। बस में सभी ने उच्चस्वर में एक साथ "बोलिए शंकर भगवान की जय", "बम-बम भोले" का घोष किया तो बाहर खड़े प्रायवेट टूरिस्ट भी हमारे साथ जयजयकार करने लगे। बस चल पड़ी। रास्ते की नज़ाकत के साथ कभी धीमी तो कभी तेज गति पकड़ते हुए दस बजे पुनः दारचेन के उसी गेस्टहाऊस में जाकर रुक गयी।

दार्चेन पहुँचकर सभी यात्री नीचे उतर गए। जो यात्री परिक्रमा पर नहीं गए थे वे बस के पास आकर अभिवादन कर रहे थे। हमने स्नेहलता को गले लगा लिया और बीना मैसूर, रश्मी शर्मा और अन्य यात्रियों का हाल पूछा। सभी प्रसन्न दिखायी दे रहे थे।

एलओ ने पुराने कमरे न. ही सभी यात्रियों को बता दिए। मैं और नलिनाबेन अपना लगेज बंद कमरे से बालाजी को बता कर ले आए।

दोपहर का भोजन भी हमारे ग्रुप को तैयार कराना था सो पीछे कमरे में बनी रसोई में पहुँच गए। श्रीमती दाल चावल बनवाना चाहतीं थीं पर हम ने अन्य महिला यात्रियों से सलाह करके दाल-चावल, गोभी की सब्जी और रोटी बनाने का कार्यक्रम रखा। दो बड़े भिगोनों में अरहर की दाल और चावल कुक से धुलवाकर चढ़वा दिए और एक कुक से सामने खड़े होकर आटा गुथवाकर रखवा दिया। सब्जी बालाजी और मधुप ने काट कर धुलवा दी।

जब दाल बन गयी तो उसमें टमाटर का छौंक लगवाया और सभी महिला यात्री मिलकर रोटी बनाने लगे। रश्मी, खंडूरी, गीतबेन, स्मिताबेन सभी रोटियाँ बेल रहे थे और मैं और नलिनाबेन सेंक रहे थे। श्रीमती और उनके पति को परोसने और खिलाने की व्यवस्था का ज़िम्मा सौंप दिया।

सभी यात्री देशी घी लगी रोटी देखकर प्रफुल्लित हो गए। तिब्बत आने पर पहली बार रोटी के दर्शन हुए थे। सभी प्रशंसा में कसीदे कस रहे थे। थोड़ी सी मेहनत से सभी ने रुचिकर भोजन खाया और तृप्त हो गए।

खाना खाकर हम सब रसोई की सफ़ाई की ज़िम्मेवारी बिंद्राजी और अन्य राशन कमेटी के सदस्यों पर छोड़ कर वापिस कमरे में आ गए। वहाँ तिब्बती स्त्रियाँ तरह-तरह की मालएँ, चूड़ीं, कड़े और अन्य आभूषण फैलाए बैठी थीं। वीनामैसूर, स्नेहलता, ज्योसना और नलिनाबेन उनसे मोलभाव कर रहीं थीं। और भी कई तिब्बती स्त्रियाँ भी वरांडे में सामान बेचती घूम रहीं थीं।

हम सामान देख रहे थे तभी स्मिताबेन आयीं और मुझसे नहाने चलने को पूछने लगीं। मैं नहाने की बात सुनकर चौंक गयी क्योंकि वहाँ तो कोई बाथ-रूम था ही नहीं। तब उन्होंने बताया कि बाहर मिलट्री एरिया में एक पार्लर है जहाँ युवान देकर नहाया जा सकता था। मैं फौरन तैयार हो गयी। अपने कपड़े सोप,शैंपू निकाला और दोनों चल पड़े। रास्ता और दुकान की पहचान उनके पति ने बता दी थी।

हम गेस्टहाऊस से बाहर निकल कर सीधे हाथ को चलते चले गए। लगभग ढ़ाई सौ मीटर चलने पर एक दरवाज़े पर दस्तक दी। एक सजी-धजी महिला ने दरवाज़ा खोला। वह हमारे हाथ में कपड़े इत्यादि देखकर हमारा मन्तव्य समझ गयी और मुखातिब होकर पूछने की मुद्रा में बोली- बादरूम? हमदोनों ने हाँ में गर्दन हिला दी। यह तो अच्छा है कि इशारे की भाषा एक सी होती है।

वह हमें अंदर ले गयी और सामने पंक्ति में बने बाथरूम खोल दिए। साधन-पूर्ण स्वच्छ बाथरूम। ठंडा और गर्म दोनों पानी आ रहे थे। हम दोनों एक घंटे तक नहाकर बाहर निकले, बिल चुकता किया और गेस्ट-हाऊस में आ गए। १६ जून को तकलाकोट में नहाने के बाद आज चौथे दिन स्नान-सुख मिला।

थोड़ी देर आराम करके शाम को घर फोन करके पवित्र-कैलाश की परिक्रमा पूर्ण होने की खबर दी और रश्मि खंडूरी के साथ जाकर कुछ खरीददारी की। वापिस आकर चाय पी और मजे से बिस्तर पर लेट गए।

रात के खाने की ज़िम्मेवारी अन्य ग्रुप की थी। खिचड़ी और अचार मिला। सभी ने खुशी-खुशी खाया। एलओ ने मीटिंग में बताया कि अगले दिन सात बजे बस में मानसरोवर-परिक्रमा हेतु झील के किनारे कुगु फनिहंध जाना था। हम अपना लगेज पैक करके सुबह आराम से उठने के लिए गहरी नींद सो गए।

 क्र्मशः

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