अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
09.17.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

Kailash

चौदहवाँ दिन / पँद्रहवां दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

अष्टपद-दर्शन
गतांक से आगे
17/6/2010 चौदहवाँ दिन
अष्टपद-दर्शन
दूरी आठ किमी।

धूप तेज तो थी, आकाश भी स्वच्छ था, पर हवा बहुत ठंडी थी। गुरु ने सभी को टोपी और गलब्ज़ भी पहनने की सलाह दी। सभी जल्दी-जल्दी तैयार होकर कैमरे से लैस प्रांगण में एकत्र हो गए।
सवा दो बजे आठ जीप (गाड़ियाँ) आ गयीं। छः-छः यात्री एक-एक गाड़ी में बैठ गए गुरु और डिक्की भी इन्हीं में एडजस्ट हो लिए।

गुरु ने चलने का इशारा किया और ड्राइवर गाड़ी को विमान की गति से दौड़ाने लगे। तेज दौड़ाते हुए वे पहाड़ी रास्ते पर चढ़ गए। पथरीले चट्टानों भरे रास्ते से, जल-धाराओं के बीच से निकालते हुए, एक-दूसरे से होड़ सी करते हुए इतनी तेज चल रहे थे मानों जीप-रेस हो रही हो।

तीन बजे के आसपास जीप एक नदी के किनारे बिलकुल निर्जन स्थान में जाकर रुक गयीं। सभी नीचे उतर गए और बिलकुल सामने खड़े कैलाश-पर्वत को साष्टांग दण्डवत किया और फोटोग्राफ़ लेने लगे।

अधिकांश-यात्री सामने वाली पहाड़ी पर चढ़कर दर्शन करने जाने लगे तो मैं, नलिनाबेन और स्नेहलता भी उनके पीछे-पीछे चल दिए। वीना-मैसूर, ज्योत्सना शर्मा और रश्मि शर्मा जीप में ही बैठी रहीं।

हम धीरे-धीरे चढ़ते जा रहे थे पर साँस फूल रही थी। हमे पता नहीं था कि चढाई भी करनी पड़ेगी सो हम अपना बेंत लेकर नहीं आए थे। बड़ी कठिनाई से आगे बढ़ रहे थे, पर आई.टी.बी.पी. के कमांडर की बात याद थी- "एक साँस भरो एक कदम चढ़ो।" हम जब आधे रास्ते में थे तो एलओ लौटकर आ रहे थे।

लगभग आधे घंटे में हम उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ से कैलाश-पर्वत और नंदी-पर्वत के स्पष्ट दर्शन हो रहे थे। यूं तो कैलाश यहाँ से बहुत दूर थे पर स्पष्ट दर्शन हो रहे थे ऐसा लगता था कि अगली पहाड़ी पर ही शिव-धाम कैलाश है। यह कैलाश के दक्षिण-दर्शन हैं।

कैलाश-पर्वत अपनी दिव्य छटा बिखर रहे थे। धवल, शांत विशाल हिम-स्तूप मानों अपनी ओर खींच रहे हों! पर्वत के बीचोंबीच मुखाकृति और माला सी बनी मन को मोह रही थी।

हम एकटक देखते खुशी से इतने द्रवित हो गए कि आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे, बिलकुल शांत सुध-बुध खोकर उधर ही निहार रहे थे। कैलाश-पर्वत पर हिम भरा था तो समीप में नंदी-पर्वत बिलकुल कत्थई-भूरी चट्टान सा चमक रहा था। जुनेजा इत्यादि ने भोले की जयजयकार करके एकाग्रता तोड़ दी। हमने शिव-स्तुति की और धन्यवाद दिया प्रभु को जिनकी कृपा से दर्शन हो रहे थे।

सबसे बड़ी बात यह थी कि नीचे जहाँ जीप रुकी थी वहाँ एक नदी जमी पड़ी थी, माइनस डिग्री तापमान था पर कैलाश-पर्वत और नंदी-पर्वत के अलावा किसी पर्वत पर बर्फ़ नहीं थी।

जुनेजा, प्रकाशवीर अभी वहीं खड़े थे। असल में एलओ ने उन्हें अंत में वापिस आने के लिए कहा था। स्मरण रहे जुनेजा की यह चौथी बार की यात्रा थी। थोड़ी देर रुककर हम वापिस आ गए।

नीचे उतरते ही देखा कि कुछ यात्री नदी पार सामने की पहाड़ी पर चढ़ रहे थे, कुछ ऊपर शिखर पर पहुँच चुके थे।

उस हिम-रहित पहाड़ी पर जिनालय बना था भगवान ऋषभदेव ने वहाँ तपस्या की थी। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जी भी कैलाश-दर्शन को आए थे। उन्होंने आठ पद चढ़कर मोक्ष प्राप्त कर लिया था। इसी लिए इस दर्शन का नाम अष्टपद-दर्शन है। जब उन्होंने प्राण त्यागे तो उनकी खड़ा ॐ और छड़ी वहीं रखी थी जिसके आधार पर उनके पौत्र ने स्मारक बनवाया था। पर अब वहाँ खड़ा ॐ और छड़ी नहीं थीं, बस जिनालय के नाम पर एक पत्थर से निर्मित झोंपड़ी थी। तिब्बती लोग समझते हैं कि तीर्थयात्री खड़ा ॐ और छड़ी ले गए।

तीन धर्मों जैन-धर्म, बौद्ध-धर्म और सनातन धर्म में कैलाश-पर्वत के दर्शनों का बहुत महत्त्व है। भगवान बुद्ध भी कैलाश-परिक्रमा करने यहाँ पधारे थे इसलिए बौद्ध-अनुयायी भी यहाँ दर्शन और परिक्रमा करने आते हैं। सनातन-धर्म में तो कैलाश को देवादि-देव महादेव भगवान शंकर का निवास स्थान- मोक्ष का धाम बताया गया है।

जब तक सब लोग जिनालय-दर्शन करके आए तब तक हम जंगली-याक और चूहों इत्यादि के फोटो खींचते रहे। लगभग साढ़े पाँच बजे एलओ ने सीटी बजाई और सभी को जीपों में बैठने को कहा। हमने एक बार और प्रभु-धाम में नमन किया, फोटो ली और आकर जीप में बैठ गए।

जीप और तेज दौड़ रहीं थी। उतरते में तो गति और ज़्यादा हवा से बातें कर रही थी। नीचे दारचैन शहर दिखायी दे रहा था।

साढ़े छः बजे हम वापिस दारचेन पहुँच गए। जाते ही जमाने वाले ठंडे पानी से हाथ-मुँह धोकर कुक द्रारा बनायी गयी चाय पी और बाहर फोन करने चले गए। एक खोखा में कोल्डड्रिंक बेचने वाले के यहाँ फोन सुविधा थी। अति संक्षिप्त में कुशल-क्षेम बताने पर भी चार यान खर्च हो गए।

लौटकर आए तो वीना-मैसूर कराह रहीं थीं उनकी तबियत ठीक नहीं थी। जल्दी से मधुप को बुलाया ब्लड-प्रैशर देखा थोड़ा हाई था। उन्होंने अपनी मेडिसन ली और आराम करने लगीं। हम और नलिनाबेन किचन की ओर चले गए। सुबह की सब्जी बची हुई थी, दाल-चावल बनवा लिए।

डिनर से पहले शिव-वंदना की और एलओ ने मींटिंग की। अगले दिन से तीन दिन की कैलाश-परिक्रमा को निकलना था। तीन-दिन का सामान ही साथ रखना था बाकी सब यहीं छोड़कर जाना था ताकि मार्ग में कठिनाई न हो। सुबह छः बजे बस से यात्रा आरंभ का समय बताया गया और दूसरे ग्रुप को नाश्ता तैयार करवाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी।

हम थके-हारे रात्रि भोजन के बाद सामान पैक करके बिस्तर पर पड़कर सो गए।

कैलाश-परिक्रमा प्रारंभ
18-जून-2010( पँद्रहवां दिन)

आज की यात्रा के कई चरण थे।

पहला चरण

दारचेन से यम-द्वार (लगभग दस किमी)

सुबह चार बजे आँख खुल गयी। उठकर बाहर देखा तो इक्का-दुक्का यात्री दिखायी दिए। मैं भी टार्च लेकर दैनिक-चर्या से निपटने बाहर आ गयी। बाहर बहुत तेज हवा चल रही थी मैं ठंड से कांपती हुई अहाता पार करके टॉयलेट तक पहुँची। टॉयलेट का दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं होता था मैं सोचती-सोचती कोई विकल्प न होने के कारण अंदर चली गयी।

दैनिक-चर्या से निपटकर बर्फ़ से ठंडे पानी से हाथ-मुँह धोकर कमरे में पहुँची तो अन्य लोग भी उठ चुके थे। चाय पी रहे थे। मैं भी रसोई से चाय ले आयी।

आज नहाने की गुंजाइश बिलकुल नहीं थी। न तो पानी गर्म हो सकता था और न बाथरूम जैसा कोई प्रबंध था। मन मसोसकर गीले-तौलिए से शरीर पोंछकर धुले वस्त्र पहनकर तैयार हो गयी।
आज नाश्ते में उपमा बना था। इतनी सुबह बहुत इच्छा नहीं थी पर थोड़ा सा खा लिया और पुनः चाय पी ली।

लगेज कमेटी ने छोड़कर जाने वाला लगेज इकट्ठा एक कमरे में रखवा दिया। मैं अन्य यात्रियों के साथ बेल्ट-पाऊच कमर में बाँधकर साथ-लेजाने वाला बैग जिसमें आवश्यक कपड़ों के अतिरिक्त, खाने का सामान (ड्राई-फ्रूट्स इत्यादि जो घर से लाई थी) एनर्जी-ड्रिंक, पानी की बोतल और बेंत लेकर वराण्डे से बाहर आ गयी।

अहाते में ही बस खड़ी थी। यह वही बस थी जो पहले दिन से हमें अभीष्ट-स्थान पर पहुँचा रही थी। हम बस में जाकर बैठ गए।

छः बजे एलओ ने सीटी बजाई, सभी ग्रुप-लीडर्स से यात्रियों की उपस्थिति पूछी। सभी बस में बैठ चुके थे। प्रकाशवीर ने भोलेबाबा के जयकारे लगवाए। उत्साहित यात्रियों ने पूरी शक्ति से जय-जयकार किया। सवा छः बजे बस चल पड़ी। दारचैन छोड़कर बिलकुल सुनसान में दौड़ने लगी।

चारों ओर मिट्टी के टीले जिनमें प्रकृति ने अपनी अद्भुत कलाकारी कर रखी थी ऐसा लगता था मानों किसी पुराने कई मंझिला महल के खंडहर हों, उन्हें देखकर अचंभित होने के अतिरिक्त और कुछ भाव नहीं आ सकता था अजब तेरी कला भगवान!

दूर नग्न पहाड़ों के बीच हिम-मंडित धवल कैलाश-पर्वत अपने अप्रतिम सौंदर्य के साथ दर्शन दे रहे थे। रात भर हिम-आच्छादन ने उन्हें और आकर्षक बना दिया था। हम खिड़की से एकटक देखते और फोटो लेते जा रहे थे। साढ़े आठ बजे के आसपास बस एक स्थान पर आकर रुक गयी। सभी यात्री नीचे उतर आए। सामने एक छोटा सा मंदिर के आकार में द्वार बना था।

गुरु ने बताया- "यह यम-द्वार है। इस द्वार की परिक्रमा करके कैलाश की परिक्रमा प्रारंभ होती है तो मृत्यु-भय समाप्त हो जाता है। द्वार के इस ओर संसार है तो उस पार मोक्ष-धाम! लामालोग यहाँ आकर प्राणांत होने को मोक्ष-प्राप्ति मानते हैं। इसलिए बीमार लामा अंतिम इच्छा के रूप में यहाँ जाते हैं और प्राण-त्यागते हैं।"

यम-द्वार सफ़ेद पुता हुआ था। उसके दोनों ओर छोटे-छोटे चबूतरे बने थे। लोग शरीर-त्याग के प्रतीक के रूप में अपने शरीर से बाल नोंचकर वहाँ अर्पित कर रहे थे। कुछ शिलाओं पर लिखा हुआ था जो बौद्ध-अनुयायियों के उपदेश बताए गए। द्वार के पार कैलाश-धाम अपने चरम सौंदर्य के साथ दैदिप्यमान हो रहे थे।

सभी परिक्रमा करके चारों ओर पठार के टीलों में प्राकृतिक नक्काशी को अचरज से देख रहे थे। ऐसा लगता था जैसे अद्भुत अलौकिक शांति में योगिनियाँ विराजमान हों।

अभी निहार ही रहे थे उन दृश्यों को कि प्रायवेट टूर वालों की जीप्सियाँ आगयीं और अनेक तीर्थ-यात्रियों के आने से भीड़ जैसी हो गयी।

गुरु ने हम सभी से बस में बैठने को कहा क्योंकि आगे पोनी-पोर्टर मिलने में परेशानी होती। सभी पुनः बस में जाकर बैठ गए।

यमद्वार से डेरापुख
… 18-जून-2010( पँद्रहवां दिन)

(द्वितीय चरण)

यमद्वार से डेरापुख

दूरी लगभग दस किमी

डेरापुख ऊँचाई 4909 मीटर

लगभग आधे घंटे बाद बस रुक गयी और हम सब एक नदी के किनारे के विस्तृत क्षेत्र में खड़े थे जहाँ बहुत सारे पोनी थे और तिब्बती पोर्टर।

गुरु ने पोनी लेने वाले तीर्थयात्रियों की एक लाइन और पोर्टर लेने वालों की दूसरी लाइन लगवा दी, जिनको दोनों लेने थे उन्होंने अपने बैग पोर्टर वाली लाइन में रख दिए।

गुरु ने ठेकेदार को बुलाया तो उसने अपनी भाषा में कुछ आनाकानी की। गुरु, डिक्की और ठेकेदार बड़ी देर तक बातचीत करते रहे। जब एलओ ने जल्दी करने के लिए कहा तो गुरु ने ठेकेदार से अपनी बातचीत समाप्त करके बताया कि पोर्टर्स पहुँचने वाले थे।

कुछ ही मिनटों में डिक्की ने गुरु को प्रक्रिया शुरू करने को कहा तो गुरु ने ठेकेदार से नामों की पर्ची ले लीं और अपनी उल्टी टोपी में रखकर नंबर से हरेक यात्री से एक-एक पर्ची उठाने को कहा जिस पर्ची पर जो नाम लिखा था वही उसका पोर्टर था। अधिकांश लड़कियाँ थी पोर्टर के रूप में।

मैंने जब एक पर्ची निकाली और डिक्की ने नाम पुकारा तो एक छोटी सी लड़की तिब्बती वेशभूषा में आँखों को छोड़कर सिर और चेहरे को पूरी तरह स्कार्फ़ से ढके हुए भागकर आयी और मेरा बैग और बेंत थाम कर मुझसे चलने का इशारा करने लगी। मैंने उसे ठहरने का इशारा किया और पोनी की लाईन में खड़ी रही।

जिन यात्रियों ने केवल पोर्टर ही हायर किया था वे उनके साथ परिक्रमा पर चले गए, पर जिनको पोनी भी चाहिए था वे अभी भी अटके हुए थे। एलओ गुरु और सहयात्री के.के.सिंह को ज़िम्मेवारी सौंपकर पैदल यात्री जुनेजा, प्रकाशवीर और सुरेश इत्यादि के साथ चले गए।

पोनीवाले शायद ज़्यादा आ गए थे सो छीना-झपटी सी होने लगी पर गुरु ने शांति से पर्ची उठवायीं और पोनी दिलवा दिए।

मुझे पोनीवाली भी लड़की ही मिली। मैंने गुरु से जानना चाहा कि पोनी वाली लड़की पोनी पर नियंत्रण कर लेती थी कि नहीं? गुरु ने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा "वह अपना काम बिलकुल ठीक करती है कोई परेशानी नहीं होगी।"

दोनों लड़कियों को हिंदी या अंग्रेजी बिलकुल नहीं आती थी पर इशारे से अपनी बात समझा देती थीं।

पोनीवाली मुझे अपने पोनी के पास ले आयी। उसने स्वयं पोनी की लगाम पकड़ी और दूसरे पोनी वाले लड़के ने जीन कसकर पकड़ी तब मैं पोनी पर चढ़ पायी। लगभग पौने दस बजे हम परिक्रमा के लिए चल पड़े।

पोर्टर बैग हाथ में लिए मटकती आगे-आगे दौड़ गयी। पोनीवाली लगाम मुझे पकड़ाकर स्वयं पीछे से पोनी को हांकते हुए चलती रही।

चट्टानों के टूटने से बनी रोड़ी से भरे रास्ते पर नदी के साथ-साथ पोनी धीरे-धीरे चल रहा था। वह बार-बार उसे हांकती और तेज चलाने का प्रयास करती आगे बढा रही थी।

मैं प्रकृति के अद्भुत दृश्यों में खो गयी थी। आकाश गहरा नीला था, सूर्यदेव अपनी ऊष्मा उड़ेल रहे थे और वायु वेगवान थी। पर तापमान शून्य के आसपास होगा क्योंकि नदी का जल जमा हुआ सा था और पठारों के बीच से निकलते झरने जमे होने के कारण बीच में ही अटक रहे थे। तेज धूप भी उन्हें पिघला न सकी थी।

दायीं ओर कैलाश-पर्वत अपनी श्वेत आभामय छवि के साथ दिव्य-दर्शन दे रहे थे, साथ में नंदी पर्वत उनके सौंदर्य की वृद्धि कर रहा था।

बीच-बीच में हमें सामने से आते बौद्ध-अनुयायी परिक्रमा लगाते दिखायी दिए। वे हमसे विपरीत दिशा में चलकर परिक्रमा करते हैं। कुछ तो लेट-लेटकर परिक्रमा मार्ग पर जा रहे थे। हमसे शुरू में ही इनको रास्ता देने और फोटो न लेने की हिदायत दी गयी थी सो हम उनके निकलने तक रुक जाते थे।
आधे घंटे बाद लड़की ने पोनी को रोककर मुझे उतार दिया। मैं एक टीले पर बैठ गयी। वे दोनों वहीं एक टैंट में बनी दुकान में कुछ खाने-पीने चली गयीं। वहाँ सारे पोनीवाले-और पोर्टर्स जा रहे थे।

दोनों शीघ्र ही आ गयीं और हम फिर आगे बढ़ने लगे।

रास्ता बहुत उतार-चढाव का न था सो हम तेज़ी से आगे बढ़ गए। बारह बजे के आसपास दोनों लड़कियों ने मुझे पोनी से उतार दिया और एक जल धारा के पार सामने की ओर इशारा करके बताया कि वहाँ पहुँचना था। मैं बिलकुल अकेली थी दूर तक कोई सहयात्री आता दिखायी न दिया सो उनके साथ वहीं बीच में बैठ गयी। तभी सहयात्री श्री अहीरे दिखायी दिए, मैंने उनसे रास्ता पूछा और अन्य यात्रियों के बारे में जानना चाहा तो वह भी ठिठक गए और वहीं कुछ दूर पर बैठ गए।

दोनों लड़कियाँ जल्दी मचा रहीं थीं। मैं उनके फोटो लेने लगी तो वे दोनों रुक गयीं। तभी हमने देखा कि अन्य यात्री जलधारा के दूसरे किनारे से सामने जा रहे थे।

हम पोर्टर के साथ तेज़ी से वहाँ पहुँच गए। वही डेरापुख विश्राम-स्थल था। गुरु और डिक्की तो पहुँच गए थे पर एलओ अभी नहीं पहुँचे थे सो कमरे अभी बंद थे।

हमने डिक्की से टॉयलेट पूछा तो उसने सामने इशारा कर दिया। सामने पाँच फुट ऊँची मिट्टी से पुती एल आकार की बिना दरवाज़े की दीवार की ओट में तीन मीटर गहरे गड़्ढ़ों के ऊपर दो छिद्र कर रखे थे। उनमें नीचे और ऊपर हर जगह मल सड़ रहा था, शायद उनमें बहुत दिनों से सफ़ाई नहीं हुई थी। मैं नाक बंद करके बाहर आ गयी और कमरों के पीछे दूर जाकर निपटकर आयी। जब गाईड से सफ़ाई के बारे में कहा तो उसने बताया कि पोनीवाले और पोर्टर्स चुपके से गंदा कर जाते हैं।

एलओ ने आते ही कमरे और सहयात्री बता दिए। हमारे ग्रुप के समस्त छःयात्री एक ही कमरे में ठहरने थे पर अभी तक कोई पहुँचा नहीं था।

कमरे में छः पलंग पर बिस्तर लगे थे पर उनमें सीलन की दुर्गंध आ रही थी, मैंने अपनी रजाई और गद्दा कमरे के बिलकुल सामने धूप में सुखा दिए मुझे देखकर अन्य यात्रियों ने भी वैसा ही किया।

धीरे-धीरे यात्री पहुँच रहे थे और बाहर ही खड़े ही थे कि जुनेजा और एलओ ने बताया कि चरण-स्पर्श दर्शन पर जाने वाले यात्री एक स्थान पर एकत्र हो जाएँ। हमारे ग्रुप से वीना मैसूर को छोड़कर सभी जाना चाहते थे पर एलओ ने स्नेहलता को रोक दिया क्योंकि उनकी अष्टपद पर जाते समय तबियत खराब हो गयी थी। वह थोड़ी उदास होकर कमरे में चली गयीं।

मैंने जुनेजा से चरण-स्पर्श के बारे में पूछा तो उसने बताया कि आधा घंटा लगता है पहुँचने में, और आगे बढ़ गया।

 अलौकिक अनुभूति…
डेरापुख में चरण-स्पर्श तक
…18-जून-2010( पँद्रहवां दिन)

तृतीय अंतिम चरण

कैलाश-चरण-स्पर्श – अद्भुत-अलौकिक अनुभव

समय दोपहर एक बजे

(यह एक दिन की दार्चेन से डेरापुख की यात्रा का तीसरा चरण है)

हमें पता चला कि वहाँ न तो गाईड साथ जाएगा और न पोर्टर सो हम अपनी सोटी थामकर थोड़ा सा ड्राईफ्रूट और एनर्जी-ड्रिंक के दो डिब्बे जेब में रखकर भगवान शिव का धयान करके जाने के लिए तैयार हो गए।

श्रीमती, खंडूरी दंपत्ती, बिंद्राजी और मैं अन्य यात्री अन्य यात्रियों का अनुकरण करते हुए कैलाश-पर्वत की ओर से बहकर आ रही जलधारा के किनारे-किनारे पहाड़ी पर चढ़ गए।

थोड़ा आगे जाने पर ही देखा कि जल धारा बिल्कुल कठोर बर्फ़ बनी हुई थी और किनारे पर कोई रास्ता नहीं था पहाड़ी खड़ी ढ़लान वाली थी। हम बेंत के सहारे मानों दीवार पर चल रहे हों। अब गिरे और तब गिरे सोचते हुए बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच से निकलते पहाड़ी दर पहाड़ी न जाने कितनी पहाड़ी पार करते आगे बढ़ते गए।

आगे जाने वाले सहयात्री दूर पहाड़ी पर दिखायी न देते तो हम समझते कि वे लोग अभीष्ट-स्थान पर पहुँच गए होंगे, पर थोड़ी ही देर में वे दूर पहाड़ी पर बौने जैसे चढ़ते दिखायी देते तो हम समझ जाते कि अभी बहुत आगे जाना था।

चलते-चलते एनर्जी-ड्रिंक के दोनों डिब्बे समाप्त हो गए, गला सूखने लगा पर चरण-स्पर्श का कुछ पता नहीं। जितना आगे जाते उतना ही और रास्ता कठिन होता जा रहा था। शिलाओं पर कूदते-फांदते डर भी लग रहा था कि कहीं संतुलन न बिगड़ जाए, पर "ॐ नमःशिवाय" का जाप करते बढ़ते जा रहे थे।

बहुत ऊपर पहुँचने पर धवल कैलाश-धाम रजत किरणें विकिर्ण कर रहे थे। हम उस आकर्षण में साँस घुटने पर भी चलते-चले जा रहे थे।

हमें निंबाडियाजी की एक साँस एक कदम बढ़ाने की युक्ति हर पल आगे बढ़ा रही थी पर सूखता गला बहुत रुकावट डाल रहा था। यूँ सूर्य की गर्मी से जलधारा किनारों से पिघलकर बह रही थी पर उस तक पहुँचने में इतनी कठिनाई थी कि हिम्मत न हो रही थी पानी भरकर पीने की। बहुत फिसलती ढलान और चट्टानें डरा रहीं थीं।

रास्ते में कई सहयात्री थककर बैठे मिले तो कई शिलाओं पर सोए हुए। बिंद्राजी और रश्मि-खंडूरी भी प्राण हाथ में लिए बैठे थे, जब हम मुँह फाड़े ज़ोर-ज़ोर से साँस लेते उनके पास तक पहुँचे तो उन्होंने हमें भी बैठने की सलाह दी पर हमने इशारे से खड़े होने से भी मना कर दिया, क्योंकि हमें पता था कि अगर हम रुक जाते तो आगे न बढ़ पाते और के.के,सिंह की तरह किसी शिला पर खर्रांटे मारने लगते। हमारे न रुकने पर बिंद्राजी और रश्मि भी खड़े हो गए।

हमारी शक्ति, हमारे थके दर्द करते पैर और सूखता गला हमें वापिस होने के लिए कह रहा था पर हमारा मन अपनी शक्ति पर आश्वस्त और आसक्त आगे बढ़ने की कह रहा था हम मन की बात मानते हुए आगे बढ़ते रहे।

लगभग पौने चार बजे तक अनवरत एकदम खड़ी चढ़ाई (जिस पर कोई ट्रैक न था,) करते प्रकृति के बेढब रास्तों को छानते जब मुझे सामने कैलाश-पर्वत के बिल्कुल नीचे बैठे कुछ यात्री दिखायी दिए तो मैं समझ गयी कि भोले के धाम में प्रवेश और स्पर्श की अनुभूति बहुत निकट थी पर पहुँचना शेष था।

कुछ दूर जाने पर एक बड़ी शिला पर एलओ बैठे मिले। हमें देखकर मुस्कराकर" बस पहुँच गए" कहने लगे।

मुझे आश्चर्य हो रहा था कि मैं इतने कठिन और जोखिम भरे रास्ते पर बढ़ रही थी!! सामने कैलाश-पर्वत वृहदतम-मणि के सदृश दैदिप्यमान हो रहे थे। जो यात्री वहाँ बैठे थे ने देखते ही भोले शिव के जयकारे लगाने शुरू कर दिए और स्वागत की मुद्रा में आह्वान करने लगे। पूरी यात्रा में हम कैलाश के सबसे निकट यहीं होते हैं जब उन्हें स्पर्श कर सकते हैं।

मैंने आगे बढ़कर घुटनों के बल बैठकर कैलाश के चरण अपने मस्तक से स्पर्श किए। हाथों से भी स्पर्श करके मस्तक और हृदय से लगाए और साष्टांग दंडवत हेतु पिघले हिमाच्छादित पत्थरों पर लेट गयी। उस समय कुछ क्षणों के लिए मैं अपने को भूल गयी, शरीर का भान न रहा, संसार की कोई इच्छा मुझे याद न रही मैं दिव्य शांति अनुभव करती हुई अलौकिक-भाव से भर गयी।

फिर खड़ी होकर दोनों हाथ पसार कर कैलाश-आलिंगन किया, भावुकता आँखों से बह रही थी, वाणी और ध्वनि भी शांत थीं।

पुनः वहीं बैठकर कुछ पलों के लिए ध्यानस्थ होकर प्रभु से एकाकार किया और अपने धाम बुलाने जैसी असीम कृपा को बनाए रखने की प्रार्थना करते हुए, जीवन में जाने-अनजाने हुयीं त्रुटियों के लिए क्षमा माँगते हुए सभी के लिए सुख-शांति की याचना की।

प्रभु से हाथ जोड़कर क्षमा माँगते हुए उनके धाम का प्रसाद एक छोटा सा हिमकण मुँह में रख लिया। मैं अद्भुत क्षणों में अपने पर विश्वास न कर पा रही थी कि सच में वहाँ थी या कोई स्वप्न था। सभी को देखकर सोच रही थी कि सच में मैं कैलाशपर्वत के चरणो में खड़ी थी।

यहाँ कैलाश का दृश्य अनोखा था। विशाल विस्तार में धवल हिममंडीत छोटी-छोटी पर्वत-मालाएँ अपनी ओर खींच रहीं थीं। हमरे देखते-देखते ही बर्फ़ पर अनेक आकार जनम ले रहे थे। एकटक निहारने पर भी मन भरता नहीं था। हम लगभग एक घंटे वहाँ रुके और अलौकिक अनुभूति को संजोकर वापिस हो लिए।

मैं अशोक कुमार, बालाजी, श्रीमती, चैतन्य, और अमर इत्यादि कई यात्री एक साथ वापिस आरहे थे।

रास्ते में एलओ वहीं बैठे थे जहाँ हम उन्हें छोड़कर गए थे शायद वह हम सब यात्रियों के वापिस होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। हम सब को देखकर उन्होंने सकुशल सुंदर दर्शन होने की बधाई दी और शेष वापिस होने वाले यात्रियों के बारे में जानकारी ली। जुनेजा के साथ वापिस आने की बात सुनकर वह आश्वस्त हो गए और हमसब के साथ वापिस होने लगे।

कुछ ही आगे नागराज को देखकर एलओ ने सभी का एक ग्रुप-फोटो लेने कहा, हम सब एक बड़ी शिलापर पोज़ बनाकर खड़े होगए। नागराज ने अपने कैमरे से ग्रुप फोटो लिए तो हमने अपना कैमरा भी ओन करके सहयात्री से ग्रुपफोटो खिंचवा ली।

चढ़ाई से अधिक उतरना कठिन हो रहा था। कहीं-कहीं तो पैर रखने तक का स्थान समतल नहीं था। एक-एक क़दम जमकर रखते हुए नीचे उतरते रहे। कुछ यात्री आगे निकल गए तो कुछ फोटो लेते पीछे रह गए।

मैं अकेली छड़ी के सहारे पिघली जलधारा पर पड़ी बड़ी-बड़ी शिलाओं को फांदती (और कोई रास्ता नहीं था) जा रही थी तभी मेरा पैर फिसला और मैं मुँह के बल पानी में गिर गयी। सबसे पहले मैंने शिला को जकड़ लिया ताकि कहीं बह न जाऊँ! मेरे गल्ब्ज़ हाथ से निकल कर बह गए। घबराहट में एक पल को मुझे लगा कि मेरे हाथ और घुटने बिलकुल टूट गए पर दूसरे ही पल मैं उठ बैठ गयी ताकि जान सकूँ कि बची या गयी काम से, पर भोले की कृपा से हड्डी बच गयीं थीं।

दो तीन मिनट मैं वहीं बैठी रही। पीछे से बालाजी, चैतन्य और कई यात्री आ रहे थे मुझे बैठा देख एकदम मेरे पास आकर हाल पूछने लगे मेरी हथेली और घुटने छिल गए थे पर मैंने किसी को बताया नहीं। मैं खड़े होकर चलकर देखना चाहती थी कि सही सलामत हूँ कि नहीं सो उनके साथ खड़ी हो गयी।

आगे रास्ता बहुत स्लीपरी था। चैतन्य मेरा हाथ पकड़कर बार-बार "आँटी ठीक हो न?" पूछता आगे-आगे ले जाता रहा। मैं गिरने की दहशत दे थोड़ी सी घबरायी हुई थी। घुटनों में हल्का दर्द तो महसूस कर रही थी पर चलने में कोई बहुत परेशानी नहीं हो रही थी। जब आगे आकर रास्ता थोड़ा ठीक आ गया तो मैंने चैतन्य से अपने आप चलने के लिए कहा, उसने कई बार कहने पर मेरा हाथ छोड़ा। बच्चा बहुत ही सेवा-भाव वाला था।

मैं धीरे-धीरे चलती वापिस हो रही थी। कई यात्री आगे निकल गए थे। लगभग सात बजे मैं वापिस अपने कमरे पर आगयी। नलिनाबेन, श्रीमती और उसके पति पहले पहुँचकर मुँह ढककर सो रहे थे। स्नेहलता बाहर घूम रहीं थीं और वीनामैसूर मेरे बरबर पलंग पर लेटी हुयीं थीं।

मेरे पलंग पर बिस्तर नहीं था क्योंकि जाते सम्य मैं धूप में सुखा गयी थी। मैं बाहर से रजाई-गद्दा उठाकर लाई बिछाया और किसी को भी अपने गिरने के बारे में बिना बताए चुपचाप लेट गयी।

आधे घंटे बाद कुक चाय दे गया मैंने अपने बैग से कुछ भुने चने निकाले और खा लिए। उसके बाद दर्द-नाशक दवाई लेकार चुपचप सो गयी।

रात को स्नेह और नलिना मेरे लिए खाना कमरे में ही ले आयीं और खाने की ज़िद्द करने लगीं , मैंने उनका मान करते हुए एक रोटी खा ली। मुझे बुख़ार सा फ़ील हो रहा था। मैं आराम करना चाहती थी क्योंकि अगले दिन परिक्रमा का सबसे ऊँचा और कठिनतम भाग था जहाँ बहुत कम तीर्थ-यात्री जा पाते हैं, मैं उसे पूरा करने का भाव लेकर भोले-शिव से प्रार्थना करके सो गयी।

 क्र्मशः

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें