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08.06.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

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ग्यारह्वाँ दिन / बारहवाँ दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

कालापानी से नवींढांग(ॐ पर्वत)

14/6/2010 ग्यारह्वाँ दिन

कालापानी से नवींढांग (ॐ पर्वत के दर्शन)

कालापानी की ऊँचाई 3570 मीटर,

नवींढांग की ऊँचाई 4145 मीटर

सुबह चार बजे मेरी आँख खुल गयी। धीरे से उठकर टॉर्च और ब्रश इत्यादि लेकर बाहर आ गयी। बाहर अँधेरा था, ज़्यादा चहल-पहल नहीं थी हवा गज़ब ढा रही थी। रसोई में हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी। मैं गर्म पानी के लिए वहाँ गयी। कु.मं.वि.नि. के कर्मचारी चूल्हा फूँक रहे थे। बहुत बड़े भिगौने में पानी गर्म हो रहा था। मैं जग में गर्म पानी लेकर बाहर बाथरूम के पास बनी नाली पर ब्रश करके चाय लेने पुनः रसोई चली गयी, तब तक कई यात्री जाग चुके थे और दैनिकचर्या मे व्यस्त थे।

चाय बन रही थी, मैंने पीने के लिए गर्मपानी लिया और वहीं पटरे पर बैठकर कर्मचारियों से बात करते हुए चाय का इंतज़ार करने लगी।

मैं नहाने के लिए गर्म पानी के जुगाड़ में थी। जब मैंने निगम कर्मचारी से पूछा तो उसने पहले तो हलका सा न-नुक्कड़ किया फिर एक अन्य कर्मचारी से बोला- "बाहर चूल्हे पर पानी गर्म होने रख दो, यहाँ तो नाश्ता बनेगा।"

मैं चाय लेकर उस कर्मचारी के पीछे-पीछे आ गयी और हमारे कमरे के बिलकुल पास में ही कतार में बने खोका टाइप स्नानागारों के पीछे उसने पत्थरों से बने चूल्हे पर पानी गर्म होने रख दिया। मैं अपने कमरे में चली गयी।

कमरे में सभी चाय पी रहे थे। गीताबेन और पटेल भाई मेरा मज़ाक बनाने लगे - "दीदी नहाएगी ज़रूर।" मैंने हँसते हुए अपने कपड़े लिए और बाहर आ गयी। जहाँ पानी गर्म हो रहा था वहाँ गयी तो देखा कि सब यात्री गर्म पानी लेते जा रहे हैं पर ठंडा पानी कोई डाल नहीं रहा है जबकि पास में ही नल था।

मैंने दो बाल्टी पानी डाल दिया और खाली बाल्टी लेकर बैठ गयी गर्म पानी के इंतज़ार में चूँकि आग बहुत तेज़ थी भिगौना गर्म था सो पानी जल्दी गुनगुना हो गया। मैं अपनी बाल्टी में पानी पलटने का यत्न करने लगी पर भिगौना बहुत भारी था, तभी सहयात्री मधुप वहाँ आया और प्यार से डाँटते हुए "क्या आँटी बुला नहीं सकती हो! हटो" कहते हुए पानी बाल्टी में उड़ेलकर बाथरूम में रख गया। मैंने मुस्कराकर उसके सिर पर हाथ रखा और बाथरूम में घुस गयी, कहीं कोई और न चला जाए।

तैयार होकर मैंने पोर्टर को बुलाया और लगेज निर्धारित जगह पर रखने की कहकर उसे अपना हैंडबैंग और बेंत संभलवा कर अन्य यात्रियों के साथ नाश्ते के लिए भोजन कक्ष में चली गयी। मीठा दलिया और उपमा था नाश्ते में। मैं बिना तला नाश्ता देखकर अति खुश हुई और मन से ग्रहण किया। बोर्नविटा पीकर नलिनाबेन के साथ बाहर की छटा निहारने लगी।

धीरे-धीरे सभी यात्री पहुँचने लगे। एलओ ने सीटी बजायी और सभी ग्रुप-लीडर्स से अपने साथियों को गिनने को कहा। सभी यात्री उपस्थित थे। सहयात्री प्रकाशवीर ने जयकारे लगवाए और सहयात्री ब्रिगेडियर श्री बंसल जी की जय भी बुलवायी (क्योंकि वह ७३ साल के सबसे बड़े तीर्थयात्री थे। सभी उनके स्वास्थ्य के लिए चिंतित रहते थे, जबकि वह अपनी बिलकुल परवाह नहीं करते थे)।

छः बजे मंदिर की ओर निकल गए। एक- डेढ़ घंटे पूजा-अर्चना में लगे। सभी ने माँ काली से निर्विघ्न यात्रा पूरी होने की प्रार्थना की और चल पड़े।

पहाड़ी उबड़-खाबड़ रास्तों को पार करते पागल कर देने वाले प्राकृतिक सौंदर्य को निहारते हुए जवानों के संरक्षण में चलते-चले जा रहे थे। जवान और डॉक्टर्स थके से लगने वाले यात्रियों का हौंसला बढ़ाते चल रहे थे।

बीच-बीच में कुछ देर रुककर पीछे वाले यात्रियों के आने का इंतज़ार करते और थोड़ा विश्राम भी। दो बार जवानों ने चाय और चिप्स भी सर्व किए। उनकी सेवा के लिए तो शब्द भी कम पड़ जाएँ।

लगभग 11 बजे के आसपास पहाड़ी ढलान पर ही पीछे आने वाले यात्रियों का इंतज़ार करते हुए बैठ गए। मैं और ज्योत्सना शर्मा लघुशंका के लिए आगे जाने लगे तो सिपाहियों ने हमें रोका बोले- "अकेले आगे न बढ़ो" फिर फौरन ही हमारे बिना कुछ कहे वह हमारा मन्तव्य समझ गए और हमें पहाड़ी के पीछे को जाने का कहकर स्वयं उल्टी दिशा में मुड़ गए।

लौटकर आए तो सभी एक ही दिशा की ओर ताक रहे थे। सामने सामने दायीं ओर "ॐ" पर्वत दिखायी दे रहा था। सब चिल्ला-चिल्लाकर एक दूसरे को इशारे से बता रहे थे। कु.मं. का गाईड और सिपाही सभी उस ओर इशारा कर रहे थे। कारण यह था कि ॐ पर्वत हमेशा बादलों में ही ढका रहता है। कभी-कभी दर्शन होते हैं। लोग तीन-तीन दिन तक नवींढांग में डेरा डाले रहते हैं पर ज़रूरी नहीं कि दर्शन हो जाएँ। हम भाग्यशाली थे कि यहीं से दर्शन हो गए।

बहुत देर तक जब सब निहारते रहे और फोटो लेते रहे तो जवानों ने आगे बढ़ने को कहा। साथ ही यह भी बताया कि अगर मौसम ठीक रहा तो नवींढांग तक ॐ पर्वत पूरे रास्ते दिखायी देता रहेगा।

हम ॐ पर्वत दिखायी देने की खुशी मन में भरकर आगे बढ़ गए। लगभग साढ़े बारह बजे नवींढांग पहुँच गए। देखते ही कु.मं. के कर्मचारियों ने "ॐ नमः शिवाय" के साथ स्वागत किया और नमकीन छाछ पीने को दी।

एलओ ने वहाँ के इंचार्ज से सलाह करके सभी को कमरे और रूममेट निर्धारित किए। हम कल वाले यात्रियों के साथ ही ठहरे। यहाँ भी कालापानी की तरह ही अर्धवृत्ताकार डोम बने थे। फ़र्श पर मोटे-मोटे गद्दे लगे थे। सब अपना-अपना बिस्तर निश्चित करके वापस बाहर आ गए।

बाहर धूप खिली थी। सामने ही ॐ पर्वत अपने पूर्णाकार में स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे। सभी अति प्रसन्न मुद्रा में अपने ऊपर भगवान की कृपा मानते हुए एकटक उधर ही देख रहे थे और अपने कैमरे में संजो भी रहे थे। हमने भी कुछ चित्र लिए।

धीरे-धीरे मौसम बदलने लगा और हमारे देखते-देखते ही ॐ पर्वत पूरी तरह बादलों में छिप गया। पता भी न चल रहा था कि वहाँ कुछ आकृति भी थी, सब छटा बादलों के पीछे! बस धवल वितान!! वाह री प्रकृति तेरा भी क्या जादू है!!!

सभी आपस में बातचीत करते हुए भोजन के लिए बुलावे का इंतज़ार कर रहे थे। मैं भी सभी के साथ बैठी थी पर मुझे घुटन सी महसूस होने लगी। मन घबराया सा हो गया, पर मैं इग्नोर करती हुई बैठी रही।

भोजन तैयार होने की सूचना मिलते ही सभी भोजन कक्ष में इकट्ठे हो गए। कक्ष बहुत बड़ा नहीं था। एक बड़ी मेज़ पर खाना लगाया हुआ था। सब्जी, कढ़ी, दाल, रोटी, चाव, रायता खीर अचार इत्यादि गर्मागर्म भोजन, पर मैं अनईज़ी महसूस कर रही थी। भोजन-कक्ष से थोड़े से दाल-चावल थाली मे डालकार अन्य कुछ यात्रियों के साथ बाहर खुले में आगयी और थोड़ा सा खाकर जल्दी से स्नेहलता के साथ आकर बिस्तर पर सो गयी।

शेष यात्री कब कमरे में आए कुछ पता न चला, पर लगभग साढ़े तीन बजे एक एमीग्रेशन अधिकारी ने सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्र करने हेतु दरवाज़े पर खट-खट की तो आँख खुली। सहयात्री मधुप भी उनकी मदद कर रहा था सो सभी ने उसे ही अपने-अपने पासपोर्ट दे दिए। थोड़ी देर बाद उन पर एँट्री कराकर वह वापिस दे गया।

एक कर्मचारी ने लगेज तुलवाने के लिए कहा। पच्चीस किलोग्रा. से अधिक भार नहीं ले जाया जा सकता था। मैंने अगले दिन का सामान और कपड़े निकालकर लगेज पोर्टर से बंधवाकर निर्धारित स्थान पर पहुँचवा दिया।

शाम की चाय आ गयी, मैंने चाय पी और बाहर आकर फ़ोन-सुविधा के बारे में जानना चाहा। पता चला कि यहाँ का सैटेलाइट फ़ोन तो काम नहीं कर रहा था, नीचे आयटीबीपी के कैंप में फ़ोन सुविधा थी। कैंप था तो गेस्टहाऊस के बिल्कुल नीचे ही पर रास्ता वहाँ थोड़ा घूमकर था। कई यात्री ढलान से शॉर्टकट से जाते दिखायी दिए। हालांकि वहाँ तारों की बाड़ लगी थी और एक सिपाही भी पहरे पर खड़ा था पर उसने तारों के नीचे से अंदर जाने दिया।

जवानों ने इतनी ऊँचाई पर चट्टानों को काट-काटकर समतल खेल का मैदान बना रखा था। खाली समय में सिपाही फुटबाल खेल रहे थे। हमारे कुछ यात्री भी शामिल हो गए थे खेल में।

मैं पूछते-पूछते उस कमरे तक पहुँच गयी जहाँ फ़ोन था। कमरा बहुत छोटा था। दो बिस्तर लगे थे जिनपर सिपाही लेटे हुए आराम कर रहे थे (यहाँ जवानों को पहाड़ों पर गश्त लगाकर ड्यूटी देनी होती है) कई यात्री पहले बैठे अपने नंबर की प्रतीक्षा कर रहे थे।

हम महिला यात्रियों को देखकर सिपाही उठकर बैठ गए। हमारे बहुत मना करने पर भी वे एक ओर बैठ गए और हमें बैठने की जगह दे दी। सहयात्री प्रकाशवीर, के.के.सिंह और बालाजी के अलावा खंडूरी-दंपत्ती लाइन में थे। मैं, नलिनाबेन और श्रीमती बाद में पहुँचे। हमने सभी से छोटी बात करने या फिर हमें जल्दी फ़ोन करने देने का आग्रह किया। खंडूरी दंपत्ती के बाद के.के.सिंहजी ने हम तीनों को पहले फ़ोन करने दिया। हम बहुत जल्दी अपने-अपने घर फ़ोन करके बाहर आगयीं।

वहीं पता चला कि वहाँ डॉक्टर्स भी बैठे थे सो मैं और श्रीमती उनके कक्ष में सलाह लेने चली गयीं। डॉ. ने मेरा ब्लड-प्रेशर चैक किया पर बिल्कुल ठीक था। उन्होंने अधिक ऊँचाई पर होने के कारण घबराहट मसहूस होने की बात कही और मुझसे पूरा खाना खाने, अधिक पानी पीने और आराम करने की सलाह दी।

पौने सात/सात बजे रात का खाना लग गया क्योंकि अगले दिन सुबह दो बजे प्रस्थान करना था इसलिए रात को जल्दी सोना था। भोजन से पहले एलओ ने छोटी सी मीटिंग की। अगली सुबह सभी से कई लेअर्स में कपड़े पहनकर सिर से पैर तक ढकने और रेनकोट, टॉर्च और ड्राई-फ्रूट्स साथ रखने के लिए कहा।

पोनी पर चलने वालों को ठंड से बचने के लिए विशेष ध्यान देने के लिए कहा क्योंकि पैदल चलने वाले यात्रियों को चलने से गरमायी आजाती है पर पोनी पर हवा बहुत लगती है।

सभी जल्दी से खाना खाकर लगभग साढ़े आठ बजे बिस्तर में दुबक गए क्योंकि अगले दिन बहुत कठिन यात्रा थी। लिपुलेख पास पार करके तिब्बत में प्रवेश करना था। लिपुलेख का मौसम बहुत थोड़ी देर सुबह लगभग सात बजे (दो/तीन घंटे) तक ही ठीक रहता है। उसके बाद वहाँ बर्फीली आँधियाँ और बारिश होने लगती है। यात्रियों को निर्धारित समय-सीमा के अंदर ही लिपुलेख पास पार करना पड़ता है।

अगले दिन के रोमांच को मन में रखकर हम जल्दी सो गए।

15/6/2010 बारह्वाँ दिन

नवींढांग से तकलाकोट(तिब्बत)

(नवींढांग ऊँचाई 4145 मीटर, लिपुलेखपास ऊँचाई 5334 मीटर,

नवींढांग से लिपुलेख की दूरी (तिब्बत-सीमा तक) 8.5 किमी

इस दिन की यात्रा के दो चरण थे।

प्रथम- नवींढांग से लिपुलेख दर्रा पारकर तिब्बत की सीमा में प्रवेश. दूरी 8.5 किमी

दूसरा- तिब्बत सीमा से तकलाकोट(शहर) तक की यात्रा।
"लिपुलेख पास पार करके चीन की सीमा में" दूरी 19 किमी

प्रथम चरण

सुबह डेढ़ बजे चाय आ गयी। ठंड इतनी कि रजाई में से मुँह निकालने का जी न था, पर आज की यात्रा प्रकृति के अकुंश से चलने वाली थी सो सभी यात्रियों ने एकदम बिस्तर छोड़ दिया। दैनिकचर्या के साथ तैयार होने लगे। कु.मं. के कर्मचारियों की कर्तव्यपरायणता का तो जबाव ही न था उन्होंने यात्रियों के उठने से पहले ही गर्म पानी कर दिया था। सभी ने गर्म पानी से हाथ-मुँह धोए। सब मेरा मज़ाक बना रहे थे – "आज क्यों नहीं नहाओगी?"

इनर से लेकर विंड-चीटर तक पाँच लेअर्स में कपड़े, हाथ-पैरों में डबल गल्व्ज़ और जुराबें, सिर पर मंकी कैप और स्कार्फ़ बाँध लिया (जैसे कि हमेशा डॉक्टर्स ने सुझाया था) सब वेश बदलकर डाकू से लग रहे थे।

नाश्ते के लिए कु.मं. के रसोईये ने आलू-पूरी पैक करके साथ दे दिए थे। सभी यात्री बोर्नविटा पीकर हाथ में बेंत लेकर सीटी का इंतज़ार करने लगे। आईटीबीपी के जवान जल्दी मचा रहे थे चलने के लिए। एलओ ने ग्रुप-लीडर्स की ओर देखा तो सभी ने हाँ में गर्दन हिला दी। एलओ ने स्वास्थ्य संबंधी हिदायतें देकर और सावधानी से चलने की सलाह देते हुए अशोककुमार जी से भोले-शंकर के जयकारे लगवाए और सभी बड़े जोश में लगभग ढाई बजे चल पड़े।

थोड़ी दूरा पर ही पोनीवाले खड़े थे जिन्होंने यात्रियों को बिठाना शुरू कर दिया। पैदल चलने वाले यात्री सिपाहियों के साथ आगे बढ़ गए कुछ जवान पीछे थे। हम पोनी पर बैठकर चल पड़े। सघन ठंड में संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा था। यूँ तो आसमान साफ़ था, तारे चमक रहे थे पर अँधेरा था, पोर्टर और पैदल यात्री टॉर्च जलाकर हाथ में लेकर चल रहे थे। बस ऊँचे खड़े पहाड़ों की आकृति ही समझ आ रहीं थीं।

अँधेरे में माइनस टेम्प्रेचर में साथ उड़ा ले जाने वाले हवा के झोंकों के बीच जूतों और बेंतों की टक-टक, नाक की सूं-सूं सुनसान दर्रे को गुंजित कर रही थी दूर ऊँचाई पर टॉर्च की रोशनी ऊपर-नीचे चलने के कारण हिलाते हुए आगे बढ़ते तीर्थ-यात्री मानों पैदल स्वर्ग जा रहे हो। बीच-बीच में पोनी वालों की पोनी को कंट्रोल करने हेतु निकालने वाली हिच-हिच की आवाज़ भी एकरसता को तोड़ रही थी।

उस दिन पचासों सिपाही और दो डॉक्टर्स मैडिकल-इक्यूपमेंट्स, ऑक्सीज़न-सिलेंडर्स और दो पोर्टेबल-स्ट्रेचर के साथ यात्रियों के बिलकुल साथ-साथ चल रहे थे। किसी को कोई परेशानी न हो हर पल का ध्यान रख रहे थे। बार-बार हाल पूछते हौंसला बढ़ाते और पोनी वालों को हिदायतें देते आगे ले जा रहे थे।

चलते-चलते कुछ दूरी पर एक टूटे से चबूतरे के पास पोनी वाले ने हमें उतार दिया। पता चला काफ़िले को रोक दिया गया था। कुछ सिपाही और यात्री काफ़ी पीछे रह गए थे। उनके आने का इंतज़ार करना था। मैंने चबूतरे के पीछे की ओर टॉर्च से देखा तो वहाँ बर्फ़ की शिलाएँ पड़ी थीं। वह कोई छोटी सी बिल्डिंग का खंडहर था। मेरे पूछने पर एक सिपाही ने बताया कि वह आईटीबीपी का मीटिंग-हॉल था। बहुत ज़्यादा बर्फ़ पड़ने से उसकी छत टूट गयी थी। बिल्कुल सामने पहाड़ गिरने से चट्टानें बिखरी पड़ीं थीं।

कुछ देर में पीछे से आते यात्री और सिपाही नज़र आए तो सारजेंट ने हम सभी को आगे बढ़ने की कमांड दे दी। ठंड के कारण मुँह में से तेज आवाज़ तो न निकल रही थी पर मन ही मन भोलेशंकर की जय करते हुए आगे बढ़ते रहे।

पहाड़ों पर जल्दी दिन निकल आता है सो पौने पाँच बजे के आसपास पौ फटनी शुरू हो गयी। धीरे-धीरे धुंधलका कम होने लगा। बर्फीले पहाड़, झरना, घाटी सभी मानों श-श-श चुप रहने की हिदायत दे रहे हो।
थोड़ा आगे चले तो नदी/जल-धाराएँ पार करनी पड़ीं। हम तो पोनी पर थे पर जो लोग पैदल थे उन्हें सिपाहियों ने पकड़-पकड़कर बड़ी सावधानी से निकाला। मेरे सामने ही एक सिपाही एक यात्री के साथ जाता हुआ स्वयं पानी में गिर गया। उसके सारे कपड़े गीले हो गए थे। इतनी ठंड में उसने कैसे मैनेज किया होगा!

दूर बर्फ़ से ढकी चोटियों पर चलता जवान मानों रेंग रहा हो। पौने सात बजे के आसपास डिप्टी कमांडर हम सब को वहीं रोककर स्वयं पहाड़ी पर चढ़कर देखने गए कि चीनी अधिकारी पहुँचे कि नहीं। हवा के तेज झोंकों से बचाने हेतु हमें वहाँ छोड़ गए थे। हम उनके सेवा-भाव और सहृदयता को नमन करते हैं।

और आगे बढ़े तो दिन निकल आया। दिनकर ने अंगड़ाई ली और पहाड़ों की चोटियों पर अपनी सुनहरी रश्मियाँ फैला दीं वाह क्या दृश्य था! ठंड-वंड सब भूल गए। खो गए उन बर्फ़ के कुओं को देखने में और चारों ओर बिछी सफ़ेद जाजम पर सुनहरे वितान के सौंदर्य में…
चारों ओर चमकीले हिम-मंडित पहाड़ और घाटी बस और कुछ नहीं। आठ-आठ फुट तक बर्फ़ जमी थी। आईटीबीपी के जवान हमारे सामने भी बर्फ़ काटने वाली कुदाल से रास्ता बना रहे थे। पोनी फिसल रहे थे। "जय भोले की" करते सब बढ़ते जा रहे थे। कभी पोनी का पैर तो कभी पैदल चलने वालों का पैर दो-दो फुट तक बर्फ़ में धंस जाता था। जब पोनी का बर्फ़ पर चलना बिलकुल मुश्किल हो गया तो पोनीवाले ने हमें उतार दिया। हम पैदल ही पोर्टर के साथ बर्फ़ पर गिरते-पड़ते चलने लगे।

डिप्टी कमांडर ने अपने सिपाहियों से यात्रियों को ऊपर लाने को कहा। हम सब पुनः आगे बढ़ते हुए बिल्कुल सीमा पर पहुँच गए। सीमा पर जवानों का जमावड़ा था। हमारी ओर हमारे सशस्त्र जवान जमे थे तो सामने तीन मीटर के फासले पर ही चीनी अधिकारी, मिलट्री-मैन और हमारा लगेज उठाने के लिए तिब्बती पोर्टर खड़े थे। पहाड़ियों पर लगे झंडे सीमा बन रहे थे, वरना पता भी नहीं चल रह था कि कौन सी हद से कौन सा देश शुरू होता है। सब एक सा …मनुष्य सीमा बनाता है पहाड़ और धरती नहीं।

हम वहीं पत्थर की शिलाओं पर बड़ी मुश्किल से संतुलन बनाकर बैठ गए। हवा उड़ा ले जाना चाहती थी, हल्की बारिश और बर्फ़ भी पड़ने लगी थी। पैदल यात्री हाँफ़ते हुए धीरे-धीरे पहुँच रहे थे। सिपाही और एलओ उनका हौंसला बढ़ाते हुए अपने साथ लाने के कारण नहीं पहुँचे थे। उनके बिना सीमा में प्रवेश की कार्यवाही शुरू नहीं हो सकती थी। हम सभी यात्री अपनी पोकेट से चॉकलेट और ड्राईफ्रूट्स निकालकर खाने लगे। इतनी ठंड में भी गला बिलकुल सूख रहा था। पानी की बॉटल तो साथ थी पर पिया नहीं क्योंकि लघुशंका के लिए कुछ नहीं था।

कुछ ही पलों में एलओ साहब पहुँच गए। आते ही सारजेंट ने उन्हें आगे करके चीनी अधिकारी से अधिकारिक तौर पर मिलवाया और एक-एक करके यात्रियों को पासपोर्ट हाथ में लेकर तिब्बत सीमा में प्रवेश करने का इशारा कर दिया।

वहाँ बड़ा अफ़रा-तफ़री का दृश्य था। सभी सिपाही, अधिकारी, पोनी वाले और पोर्टर बिल्कुल सीमा पर खड़े थे। अगर कोई ज़रा भी हिला देता तो चीन-अधिकृत तिब्बत में पहुँच जाते पुलिसवाले बार-बार आगाह कर रहे थे अपने जवानों को और अन्य कर्मचारियों को भी।

चीनी अधिकारी अपनी लिस्ट से एक-एक का नाम बोलकर बुला रहे थे। यात्री पीछे थे उनका नाम आगे था सो वह वहाँ तक पहुँचने में देर लगाते थे तबतक चीनी अधिकारी दूसरा नाम पुकार देता; थोड़ी देर बाद उसने अपने आप आकर अपना नाम और पासपोर्ट के साथ चेहरा दिखाकर प्रवेश करने की अनुमति दे दी।
तिब्बत की सीमा रेखा के अंदर जाने तक आईटीबीपी के जवान हमारे साथ थे। जब तक हम सब तिब्बत की सीमा में प्रवेश किए वे सब वहीं खड़े किसी न किसी रूप में हम सब की मदद करते रहे। हमें भी उनसे विदा लेना द्रवित कर रहा था। हम सब उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हुए यात्रा पूरी करके पुनः मिलने की इच्छा लिए आगे बढ़ गए। वे भी भावभिवोर होकर हाथ हिलाते हुए विदा कर रहे थे …

भारत-तिब्ब्त-सीमा से तकलाकोट

दूसरा चरण

तिब्बत में प्रवेश

सुबह ८ बजे के आसपास जब सीमा क्रॉस कर रहे थे तो कुछ जवान कहते सुने गए "अब हम याद आएँगे।" सच जैसे ही सीमा छोड़ी अपने को अकेला महसूस किया। न सिपाही थे न पोनी-पोर्टर। कोई मददगार नहीं। कोई राह दिखाने वाला नहीं। एक बार गाईड ने हाथ से इशारा करके बता दिया कि सभी उधर की ओर चलें।

अपने देश में चढ़ाई करके आए थे पर यहाँ उतराई थी। तेज बारिश होने लगी थी। दो-दो मीटर तक बर्फ़ जमीं थी पर एक हाथ में बेंत दूसरे में हैंड-बैग पकड़कर इतनी बर्फ़ में चलना बहुत मुश्किल था। जैसे ही पैर रखें घुटने तक बर्फ़ के अंदर या फिसलकर गिर रहे थे। वीना मैसूर और रश्मि शर्मा तो गिरकर उठी ही नहीं। सब उनकी ओर मुखातिब होकर चिल्लाए "बचाओ उन्हें"!

चीन सरकार ने तीन गाईड (एक पुरुष और दो स्त्रियाँ) (जिन्हें हिंदी बोलनी और समझनी आती थी) तीर्थयात्रियों को गाईड करने के लिए दिए थे पर वे अभी लगेज ही उठवा रहे थे, चीख सुनते ही भागे और उन दोनों को इमरजेंसी गाड़ी में बिठाकर भेज दिया। अन्य सभी यात्री भोले की जय बोलते हुए फिसलते-लुड़कते आगे बढ़ गए।

मैं अपना बैग संभाल नहीं पा रही थी। बार-बार फिसलन पर लुढ़का देती और धीरे-धीरे उतर रही थी। सबसे ज़्यादा परेशानी तब होती थी जब एक पैर बर्फ़ में से निकालकर दूसरा आगे बढ़ाओ तो वह भी अंदर। बाद में मेरा बैग अशोककुमार जी ने ले लिया और आगे निकल गए।

जैसे तैसे करके वह बर्फ़ीला मार्ग तय किया और सूखे पथरीले मार्ग पर आ गए। दो घंटे तक लगातार पहाड़ी मार्ग पर उतरे, जहाँ ह्यूमिडिटि बहुत थी और वनस्पति नाम का पत्ता भी न था। कुछ लोग जी मिचलाने की शिकायत भी कर रहे थे।

सवा दस बजे उस जगह पहुँचे जहाँ हमें लेने आयी बस खड़ी थी। सभी बेहाल थे। चीन-सरकार की बद-इंतज़ामी को झींक रहे थे कि पोनी या पोर्टर क्यों नहीं दिए जबकि पैसा पूरा ले रहे थे।

जब सब यात्री आ गए तो गाईड जिसका नाम गुरु था ने अपनी सहयोगी डिक्की और दूसरी लड़की (नाम भूलगयी) का परिचय दिया और बताया कि हम कस्टम-चैकिंग के लिए जा रहे थे। सभी को आवश्यक-रूप से स्वेटर पहने रहने को कहा। यात्री-गणना के पश्चात बस चल पड़ी।

टी के पहाड़ी-पठारी-मार्ग पर चढ़ती उतरती धूल उड़ाती बस में बैठकर सुबह से थका शरीर बहुत कष्ट महसूस कर रहा था। बस बॉर्डर के मिलट्री-एरिया से गुज़र रही थी सो गुरु ने फोटो बिलकुल न लेने और कैमरे बंद रखने की हिदायत दी।

 आसपास हम कस्टम ऑफ़िस में दाख़िल हो गए। एक बड़े से हॉल मे सभी को खड़ा कर दिया न बैठने की जगह न लिखने के लिए डेस्क। कस्टम औपचारिकताओं से संबंधित जानकारी भरने के लिए सभी को एक-एक परफ़ोर्मा पकड़ा दिया। कुछ लोग तो ज़मीन पर ही बैठ गए। फिर लाइन में लगकर अंदर गए जहाँ सामने दीवार पर इन्फ़्रा-रेड कैमरा लगा था सभी का टेंप्रेचर रिकॉर्ड हो रहा था। एक दो यात्री जिन्हें थोड़ा बुखार था (रश्मी खंदूरी और नागराज इत्यादि) को रोककर उनका अलग से कुछ टेस्ट हुआ। बैल्ट-पाऊच और हैंडबैग्स भी एक्सरे मशीन से गुजारे। शिव की कृपा से सब कुछ ओके था।

तकलाकोट शहर में पुरंग गेस्ट-हाऊस की ओर चल पड़े। मुश्किल से बीस मिनट में गेस्ट-हाऊस प्रीमिसिस में पहुँच गए।

गेस्ट-हाऊस नयी बिल्डिंग में था। पहुँचते ही एलओ ने गुरु की मदद से सभी को कमरे नंबर बता दिए। कमरे बहुत बड़े और वैल-फर्नीश्ड थे। अटैच बाथ-रूम में गीज़र लगे थे।

मैं और नलिनाबेन एक साथ में ठहरीं तो स्नेहलता और बीना मैसूर एक साथ बिलकुल सामने वाले कमरे में। लगेज के बैग्स उठाकर अपने कमरे मे रखते समय पोर्टर बहुत याद आया।

हमारी घड़ी में बारह चालीस हो रहे थे, (चीनी समय हमारे देश के समय से डेढ़ घंटा आगे होता है) गुरु ने एक घंटे के अंदर भोजन के लिए भोजन कक्ष में पहुँचने के लिए कहा।

हम स्नान इत्यादि के बाद भोजन-कक्ष में पहुँच गए। बड़ा सा हॉल जिसमें पाँच बड़ी गोल मेज़ लगीं थीं और चारों ओर कुर्सियाँ लगीं थी। सामने किचेन का दरवाज़ा था जहाँ एक मेज़ पर टमाटर सूप, फीके फ़्राइड चावल और बंदगोभी की सब्जी रखी थी। पास में ही खाली बाऊल, प्लेटें और चम्मच थे। अपनी प्लेट और बॉउल लेकर जाने पर दो चीनी स्त्रियाँ (जिन्हें हिंदी बिलकुल नहीं आती थी) खाना परोस रहीं थीं।

चाहे कितने ही भूखे थे पर खाना बिल्कुल स्वाद न लगा। एलओ ने सभी को सूप ज़्यादा पीने की सलाह दी। पहाड़ों पर लिक्यूड डाइट अवश्य लेनी चाहिए। खाना जबरन निगलकर अपने कमरे में आ गए और सो गए।

शाम को साढ़े पाँच बजे चाय की घंटी बजी, गुरु और डिक्की स्वयं भी दरवाज़ा खटखटाकर चाय पीने को बुला रहे थे। फिर उसी भोजन-कक्ष में पहुँचे। हरेक मेज़ पर बड़ी-बड़ी प्लेटों में तले हुए साबूदाने के रंग-बिरंगे पापड़, फ़्रायड मूंगफली के दाने और टोस्ट रखे थे। एक कटोरे में जैम थी। चाय के लिए कप न होकर काँच की छोटी-छोटी जैम की शीशियाँ प्रयोग हो रहीं थीं।

चाय पीते-पीते ही एलओ ने सात बजे फ़र्स्टफ़्लोर पर कॉन्फ़्रेंस-हॉल में मींटिंग करने की सूचना दी और गुरु को भी साथ रहने को कहा।
चाय पीकर बाहर आए तो पता चला कि सामने ही एक घर में टेलीफ़ॉन की सुविधा है। मैं और नलिनाबेन लपके उस ओर, वहाँ प्रकाशवीर, सुरेश और राजेशजोशी भी खड़े थे। हम दोनों ने अपने-अपने घर फोन किया और थोड़ा बाहर निकलकर देखा।

गेस्ट-हाऊस से बाहर निकलते ही बाज़ार था। अधिकांश दुकानों पर स्त्रियाँ सामान बेच रहीं थीं। वार्तालाप की प्रोबलम थी, वे न तो हिंदी जानतीं थीं और न अंग्रेजी और न हम चीनी भाषा।। हम सामान उठाकर दिखाते और वो केल्कुलेटर पर अंक लिख देतीं, इतने यूरो क़ीमत! हम बार्गेनिंग करते और केलकुलेटर पर अपनी पसंद के अंक लिख देते और इस तरह हमने मास्क और छतरी (हवा से होंठ बचाने के लिए) और नलिना ने एक हैंड बैग खरीदा उनका बैग टूट गया था। कुछ इनरजी-ड्रिंक्स और फल खरीदे और वापिस आ गए। हवा बहुत रूखी और तेज थी। वहाँ सभी ने मुँह पर मास्क लगाए हुए थे।

निर्धारित समय पर सभी कॉन्फ़्रेंस-हॉल में एकत्र हो गए। पहले आधे घंटे तो शिव-वंदना और कीर्तन हुआ। उसके बाद एलओ ने संबोधित किया।

सात सौ डॉलर तो चीन-सरकार को देने थे, जो श्री वेणुगोपालजी के पास जमा कराने थे। इसके अलावा पोनी-पोर्टर हायर करने के लिए (यदि चाहिए था तो नाम भी लिखवाना था) और शॉपिंग करने के लिए अलग से डॉलर के यूरो बदलवाने के लिए श्री त्यागी के पास जमा करने थे। मैंने यहाँ भी पोनी और पोर्टर दोनों हायर किए जिसके लिए १९९० युवान जमा कराने थे सो मैंने सभी खर्च मिलाकर छः सौ डालर के और युवान बदलवा लिए।

आगे यात्रा में खाना पकाने के लिए तीन कुक हायर किए गुरु की मदद से।

उसके बाद सभी डिनर करने आ गए। फिर वही फीके चावल, सूप और सब्जी। बिना मन के थोड़ा-बहुत खाकर अपने कमरे में चले गए। कल यहीं विश्राम करना था सो कल की कोई चिंता नहीं थी इसलिए निश्चिंत होकर सो गए। 

- क्र्मशः

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