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07.12.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

Kailash

नवां दिन / दसवां दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

एक दिन में गुंजी

12/6/2010 नवाँ दिन

गुंजी में मेडिकल जाँच

सुबह छः बजे चाय वाले ने दरवाज़ा खटखटाया तो आँख खुली। सभी ने चाय पीना शुरू कर दिया, (मैं बिना दाँत साफ़ किए कुछ नहीं लेती) मैं ब्रश करने बाहर चली गयी। कई लोग दैनिकचर्या में व्यस्त थे। सामने चूल्हे पर पानी गर्म हो रहा था मैंने भी मग में पानी लेकर हाथ-मुँह धो लिए और रसोई में अपने लिए चाय लेने चली गयी।

रसोई में नाश्ता तैयार कर रहे कु.मं.वि.नि. के कर्मचारी ने गर्म चाय का गिलास पकड़ा दिया, मैं चाय लेकर अपने कमरे में लौट आयी। मेरे कमरे के सभी यात्री चाय पीकर अपना लगेज खोलकर धोने वाले कपड़े निकाल रहे थे। मैं तो यह काम कल ही कर चुकी थी सो नहाने चली गयी।

नहानेवालों की बड़ी लाईन लगी हुई थी। तापमान बहुत कम होने के कारण खुले में पानी बड़ी देर में गर्म हो रहा था, दूसरे कई बाथरुम्स में यात्री कपड़े धो रहे थे।

मैं वहीं चूल्हे के पास बैठकर आग सँवारते हुए खाली बाल्टी का इंतज़ार करने लगी। इतने में मेरा पोर्टर दिखायी दे गया मैंने उसे बुलाया और एक बाल्टी लाने को कहा। वह तुरंत किसी बाथरूम में से दो बाल्टी ले आया और साफ़ करके मुझे दे दी। गर्म पानी लेकर मैं नहाने चली गयी।

आज नहाकर तृप्ति हुई। रोज़ाना मुँह अँधेरे, जमाने वाली ठंड में जल्दी-जल्दी नहाना तो बस नाम मात्र ही था।

धीरे-धीरे सभी लोग तैयार हो गए। भोजन कक्ष में नाश्ता लग गया था। आज नाश्ते में उपमा मिला था। इतने दिन बाद बिना तला नाश्ता देखकर सभी खुश थे और जी भरकर खाया।

लगभग साढ़े आठ बजे एलओ ने सीटी बजायी सब अपनी-अपनी मेडिकल-फ़ाईल के साथ आकर खड़े हो गए। "ॐ नमः शिवाय" के साथ सभी मंदिर में शीश झुकाते हुए भा.ति.सी.पु.ब. के कैंप के प्रांगण में पहुँच गए जहाँ पहले से ही पूरा प्रबंध था।

बिलकुल सामने एक मेज़ और कुर्सी लगी थी एक साईड में एक नक्शा लटका हुआ था, दूसरी साईड में एलओ के लिए कुर्सी, मुखातिब होकर सभी तीर्थयात्रियों के लिए कुर्सियाँ बिछायीं गयी थीं। सभी यात्री जाकर बैठ गए।

जवानों ने सभी को पानी और चाय-बिस्कुट सर्व की। इतने में ही डिप्टी.कमांडर.इन ची. मि.चौधरी और दो डॉ. आ गए। ॐ नमःशिवाय के साथ सभी का हाल पूछा। चौधरी साहब ने यात्रा की ब्रीफ़िंग की। उन्होंने सभी को अपनी हैल्थ के प्रति सजग होने के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति भी सजग रहने का आवाह्न भी किया। पर्यावरण की देखभाल के अंतर्गत उनकी बटालियन ने वहाँ एक "मानसरोवर-वन" की स्थापना की है जहाँ कैलाश-मानसरोवर जाने वाले सभी यात्रियों से एक-एक देवदार का पौधा रोपवाया जाता है।

उनके संबोधन के बाद डॉक्टर्स ने स्वास्थ्य संबंधी टिप्स दिए। गुंजी हाई-एल्टीट्यूड में आता है। यहाँ पर हवा का दबाव शरीर को प्रभावित करता है। इसलिए यहाँ दो रात ठहराकर शरीर को आगे जाने के लिए तैयार करने के साथ मेडिकल जाँच भी होती है। मेडिकल में फेल होने पर यहाँ से भी वापिस भेजा जा सकता है।

इसके बाद सभी यात्रियों को दो ग्रुप्स में बाँट दिया और एक को मेडिकल जाँच हेतु पास में ही अस्पताल में ले गए और दूसरे को मानसरोवर वन में पौधा रोपने के लिए।

हम पहले ग्रुप में थे सो जाँच के लिए चले गए। मेरा नंबर चौदहवां था। अपने नंबर पर मैं अंदर गयी तो डॉ. ने मेरी रिपोर्ट्स देखीं, ब्लड-प्रैशर हार्ट-बीट इत्यादि चैक की। दिल्ली की रिपोर्ट के मुताबिक मेरा कोलेस्ट्रोल थोड़ा बढ़ा हुआ था, पर ब्लडप्रैशर बिलकुल नॉर्मल था सो फ़िट दे दिया। वीनामैसूर आदि कुछ यात्रियों का ब्लड-प्रैशर हाई था सो उन्हें दवाई देकर शाम को दुबारा जाँच के लिए बुलाया गया था।

इसके बाद मैं, नलिनाबेन, श्रीमती और उनके पति इत्यादि यात्री पौधा रोपने गए। फावड़े से पथरीली ज़मीन खोदकर मुरझाया सा देवदार का पौधा लगाया और पानी दिया। जवानों से उसकी रक्षा का वचन लिया और वापिस अपने कमरे पर आ गयी।

उस दिन सब रिलेक्स्ड मूड में थे। कुछ लोग पास में ही ऊँचाई पर गुंजी गाँव देखने चले गए। मैं और श्रीमती कैमरे की बैटरी चार्ज करने पास में ही बने स्टेट-बैंक ऑफ़ इंडिया की शाखा में (जो भारत की सबसे ऊँचाई पर स्थित शाखा है।) में चले गए। हमसे पहले वहाँ सहयात्री श्री के.के.सिंह जी विराजे हुए थे।

हमने शाखा के पीओ श्री गुंजयाल साहब से आज्ञा लेकर चार्जर ऑन कर दिए और बैठ गए।

सबसे ऊँचाई पर स्थित यह बैंक-शाखा बहुत छोटी है। यहाँ दो ही कर्मचारी काम करते हैं। एक्चुअल में यह जवानों की सुविधा के लिए है जो छः-छः महीने तक यहाँ ड्यूटी करते हैं घर नहीं जा पाते हैं।

हम टाइम पास करने के लिए खाली बैठे गुंज्याल साहब से जानकारी हासिल करने लगे। उन्होंने बताया कि वह इसी गाँव के हैं। तभी उनके सरनेम गुंज्याल है। यह गाँव अनुसूचित-जनजाति क्षेत्र में आता है। लोग पढ़-लिखकर शहरों में बड़े पदों पर हैं। यहाँ मुश्किल से चालीस परिवार रहते हैं जो साधनों और ज़मीन के अभाव में बड़ी कठिनाई से जीवन यापन करते हैं। लोगों की खाली पड़ी ज़मीनें बंजर हो रहीं हैं, पर वे दूसरों को खेती करने को नहीं देते। गुंजयाल साहब ने स्वयं दसवीं पास करके यह गाँव छोड़ दिया था और धारचूला में पत्नी और बच्चों के साथ रहते हैं।

शाखा बंद होने का समय आ गया था, हमारे कैमरे की बैटरी थोड़ी चार्ज हो गयी थी सो हम उनका धन्यवाद करके वापिस कमरे पर आ गए।

दोपहर का भोजन तैयार था, खाना खाया और आराम करने लगे।

शाम चार बजे उठकर घर फोन किया फिर बाहर खड़े सहयात्रियों से बातें करने लगी। कुछ यात्री भ.ति.सी.पु.ब. के जवानों के साथ फ़ुटबॉल खेल रहे थे। कुछ उनका मैच देख रहे थे। इधर-उधर टहलते हुए और प्रकृति के नज़ारे देखते हुए दिन छिप गया।

शाम छः बजे सूप पिया और सभी मंदिर में कीर्तन-आरती में सम्मिलित होने चले गए। मंदिर में यात्रियों ने सुंदरकांड का पाठ किया तो जवानों ने मनमुग्ध कर देने वाले भजन सुनाए। अंत मे आरती हुई जिसमें डिप्टी-कमांडर भी शामिल हुए और सभी को अपने हाथ से प्रसाद बांटा।

वापिस आकर भोजन कक्ष में एलओ ने मींटिंग रखी। सबसे पहले उन यात्रियों के बारे में जानकारी ली जिनका शाम को दुबारा मेडिकल हुआ था। ईश्वर की कृपा से सब फ़िट थे, उसके बाद अगले दिन की यात्रा के विषय में बताया। कल साढ़े छः बजे प्रस्थान करना था।

हमने भोजन किया और कल कालापानी जाने के लिए बिस्तर पर पसर गए।

गुंजी से कालापानी

गुंजी से कालापानी

दूरी10 किमीं है। 3570 मीटर है।

13/6/2010 दसवाँ दिन

सुबह की चाय के साथ सबकी आँख खुलीं। जल्दी से तैयार होकर नाश्ता किया। नाश्ते में उपमा बना था और बोर्नविटा था। आज थकान नहीं थी सो सभी ठीक समय पर तैयार हो गए। पोर्टर ने लगेज एक जगह इकट्ठा कर दिया। हम बेंत लेकर बाहर खड़े हो गए। एलओ की सीटी भी बाद में बजी मंदिर में शीश झुकाकर और वंदना करके सभी भोले के नाम का जयकारा लगाकर जवानों के साथ चल दिए।

डिप्टी-कमांडर साहब और एलओ ने कल ही बता दिया था कि आगे नोमैन्स एरिया में ट्रैकिंग करनी थी हाई एल्टीट्यूड पर जाना था इसलिए आयटीबीपी के दो डॉक्टर्स और लगभग बीस सिपाही हमारे आगे पीछे और साथ थे। हमें किसी भी हाल में उनसे न आगे निकलना था और न पीछे रहना। कुछ सिपाही सबसे पहले आगे चले गए थे ताकि उनसे आगे कोई भी यात्री न निकल पाए, कुछ बिल्कुल पीछे रहें ताकि उनसे पीछे कोई न रह जाए।

मैं थोड़ी दूर अन्य यात्रियों के साथ पैदल ही गयी। पोनी और पोर्टर मेरे साथ चल रहे थे। कुछ देर में रास्ते में ड्यूटी पर तैनात सिपाही और सारजेंट ने उन सभी यात्रियों को पोनी पर बैठा दिया जिन्होंने पोनी हायर किया हुआ था पर बैठे नहीं थे। उन्हें सभी को साथ चलाने में परेशानी आ रही थी। क्योंकि कुछ लोग बहुत धीरे चल रहे थे जिससे जवानों का आपसी तालमेल बन नहीं पा रहा था। वे बार-बार वायरलैस पर आपस में लोकेशन जानते थे और उसके अनुसार ही हाल्ट की घोषणा करते थे।

सबसे आगे चलने वाले यात्रियों को जब कुछ देर के लिए रोका जाता था तो वे सब बैठकर कीर्तन करने लगते थे। वह दृश्य ऐसा लगता था मानों कोई ऋषिकुल कीर्तन कर रहा हो। सभी सच्चे मन से तनम्य होकर ताली बजाते और नाचने लग जाते थे।

इस तरह कीर्तन करते, जवानों से बातें करते और प्राकृतिक धरोहर को आँखों में भरते हुए काली नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़ते गए। कभी-कभी रास्ता फिसलन भरा था तो कभी-कभी बहुत संकीर्ण! बहुत डरने वाले जैसे स्नेहलता जी और वीना मैसूर को जवान हाथ पकड़कर आगे ले जाते थे। हम तो डरते नहीं थे न पोनी पर और न पैदल सो सभी हमें झांसी की रानी कहकर मज़ाक बनाते रहते थे।

रास्ते में दो जगह रुकने पर आयटीबीपी के जवानों ने यात्रियों को गर्म पानी और चाय-बिस्कुट भी खिलाए। जवानों की सेवा-भावना का अन्दाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि वे बार-बार पूछ कर सभी को चाय सर्व करते थे कोई रह न जाए। कोई मना करता था तो "थोड़ी सी ले लो" कहकर आग्रह करते थे।

लगभग पौने ग्यारह बजे हम काली के उदगम स्रोत पर बने कालीमाता के मंदिर पर पहुँच गए। सरोवर के किनारे रास्ते पर चारों ओर रंगीन पेपर की झंडियाँ लगायी हुयीं थीं। छोटे-छोटे पत्थरों को लाल रंगकर उनसे सरोवर के जल में ॐ लिखा हुआ था।

काली नदी भारत और नेपाल की सीमा रेखा बनकर दोनों को पृथक करती है। कहते हैं कि अप्रैल से अक्टूबर तक काली नदी का जल भारत में आता है तो बाकी समय नेपाल की ओर चला जाता है। मंदिर के पीछे पहाड़ों के शिखरों पर लाल झंडे लगे हुए थे जो हमारी सीमा रेखा के परिचायक थे।
पोनी से उतर गए और काली नदी के जल से बने सरोवर के किनारे-किनारे चलते हुए मंदिर के द्वार पर पहुँच गए।

मंदिर के सामने एक पहाड़ में बहुत ऊँचाई पर एक कंदरा/गुफ़ा थी, मेरे पोर्टर ने बताया "यह व्यास गुफ़ा है" इतने ही एक सिपाही भी सभी को इशारे से दिखाता हुआ व्यास गुफ़ा के बारे में बताने लगा।

ऊँचे-ऊँचे पर्वत शिखरों से घिरे काली मंदिर में भजनों का संगीत बज रहा था। कुछ सिपाही प्रबंधन में जुटे थे तो कुछ अंदर पूजा की व्यवस्था देख रहे थे।

हम सभी ने जूते उतारकर हाथ-मुँह धोकर अंदर प्रवेश किया और लाइन में लगकर दर्शन किए। एक बड़े से कमरे में सामने दो छोटे कक्ष थे जिनमें एक में माँ काली की प्रतिमा विद्यमान थी तो दूसरे में भगवान शंकर जी की। मंदिर को सलीके से सजाया हुआ था। रंगीन कालीन बिछा हुआ था। ढोलक मंजीरे और चिमटा इत्यादि रखे हुए थे जिनसे पता चलता था कि यहाँ भी कीर्तन होता रहता है। देखकर मन मंत्र-मुग्ध हो गया।

बाहर एक अन्य कक्ष में हनुमानजी की प्रतिमा विद्यमान थी।

सभी के दर्शन और अर्चना करते हुए हम आगे बढ़ गए।

लभग पाँच सौ मीटर की ऊँचाई पर कु.मं.वि.नि. का कैंप था। जहाँ जाते ही बुरांस के फूल का शर्बत मिला। एलओ ने सभी को कमरे बता दिए। हम तीन स्त्रियाँ (नलिनाबेन, सनेहलता और मैं) और तीन गुजराती कपल्स (नौ लोग) एक कमरे में ठहरे। कमरा वही अर्धवृत्ताकार डोम।

हम हमेशा सुबह नहाकर चलते थे सो आराम से बैठ गए पर जिनको नहाना था वे गर्म पानी के लिए जुट गए।

थोड़ी देर बाद दोपहर का भोजन खाया और कुछ देर के लिए सो गए। शाम की चाय के साथ सब उठे, थोड़ी बातचीत करने के बाद पोर्टर से अपना लगेज खुलवाया और कुछ कपड़े यहीं छोड़ जाने का निर्णय लिया। मैंने, नलिनाबेन और हेमलता त्यागी ने अपना सामान पोलीथिन के बैग्स में करके एक ही बड़े बोरे में बाँध दिया और अपना नाम और अपने बैच का नाम लिखकर यहीं रखने और वापसी में लेने हेतु जमा करा दिया। अन्य यात्रियों ने भी कुछ सामान वापिसी में लेने के लिए जमा करा दिया।

शाम को सभी मंदिर में गए। यहाँ भी गुंजी की भांति जवानों ने भजन सुनाए और भक्ति का ऐसा रस बरसाया कि कब नौ बज गए पता ही न चला। आरती और प्रसाद के बाद सभी वापिस कैंप आ गए। एलओ ने कल छः बजे प्रस्थान का समय बताकर अशोक कुमारजी से शिव-वंदना कराने के लिए कहा। सभी ने वंदना की और रात्रि का भोजन करके सुबह उठकर नवींढांग जाने और प्रसिद्ध "ॐ" पर्वत के दर्शन करने के लिए सो गए।

- क्र्मशः

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