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07.01.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

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आठवां दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

बुद्धि से गुंजी

11/6/2010

(बुद्धि से गुंजी 17 किमी है)

आठवाँ दिन
रास्ता = वाया छियालेख> गर्ब्यांग(गाँव)>सीती

बुद्धि से गर्ब्यांग

वाया छियालेख ( छियालेख मानो स्विटजरलैंड हो)

रात जल्दी सो जाने के कारण सुबह चार बजे आँख खुल गयी। मैंने सिरहाने के ऊपर ही लगे तख्ते पर मोमबत्ती जलायी और बैग से टूथ-ब्रश और पेस्ट इत्यादि लेकर पिछले दरवाज़े से बाहर की ओर निकल गयी क्योंकि उधर ही लेट्रीन-बाथरूम बने हुए थे।

बाहर गुपा-गुप अँधेरा था, पर और यात्रियों की चहल-क़दमी भी सुनाई दे रही थी सो डर नहीं लगा। मैं बाथरूम में घुस गयी।

फ़्रेश होकर पुनः अंदर कमरे में आयी तब तक चाय-वाला कमरे में ही चाय ले आया था। हमारे कमरे के सभी यात्री चाय पी रहे थे। एक दूसरे को अभिवादन किया और चाय का गिलास लेकर रसोई की ओर चली गयी।

रसोई धुएँ से काली एक बहुत छोटी सी कोठरी थी जिसके दरवाज़े के बाहर रात चूल्हे के पास सूखने रखे तीर्थयात्रियों के जूते पड़े थे और अंदर एक ओर एक छवड़े में बहुत सारे बर्तन रखे थे सामने ही भट्टीनुमा बहुत बड़े चूल्हे में बड़े-बड़े लक्कड़ जलाए जा रहे थे और लगभग बीस लीटर आयतन वाले एल्म्यूनियम के भिगोने में कु.मं.वि.नि. का एक कर्मचारी पानी गर्म कर रहा था।

मुझे देखते ही उसने नमस्कार किया और बोला- "आइए मैडम आपको गर्म पानी चाहिए या चाय?" मैंने चूल्हे के पास पड़े पटरे पर बैठते हुए कहा- "मुझे नहाने के लिए गर्म पानी चाहिए और मैं कुछ देर अपने जूते यहाँ आग के सामने रख जा रही हूँ।" उसने मेरे जूते एक लक्कड़ पर रखकर आग के पास सूखने रख दिए और दरवाज़े के बाहर रखी लोहे की बाल्टी गर्म पानी से भरकर मेरे कमरे के पास वाले बाथरूम में रख आया। मैं नहाने चली गयी। बाद में नलिनाबैन भी नहाने के लिए पानी लेने चलीं गयीं। कुछ ही यात्रियों ने स्नान किया।

मैं बहुत जल्दी तैयार हो गयी। अपना लगेज व्यवस्थित करके बाहर बालाजी को सौंप दिया, हैंड बैग पोर्टर को सौंप दिया। पोर्टर बहुत पुराना कर्मचारी था सो गेस्टहाऊस के सभी कर्मचारियों को जानता था, उन्हीं के पास रात को ठहर जाता था और सुबह जल्दी उठकर हमारी मदद कर देता था।

मैं बेंत भी पोर्टर को पकड़ाकर रसोई में जूते पहनने चली गयी। जूते काफ़ी सूख गए थे, पहनकर हाथ धोकर थोड़ा सा बोर्नविटा पिया और अन्य यात्रियों से बातें करने लगी।

अब तक एलओ सीटी बजा कर सभी को बुला चुके थे। दो-चार को छोड़कर सभी तीर्थयात्री तैयार होकर पहुँच गए थे, जो नहीं पहुँचे थे एलओ उनसे जल्दी करने के लिए कह रहे थे। जो यात्री उनके पास खड़े थे वे हँसते हुए ज़ोर-ज़ोर से हरी-अप, हरी-अप चिल्ला रहे थे। "अरे प्रकाशवीर जल्दी करो, अरे अमर जल्दी आओ फ़ाइन हो जाएगा"! लेट यात्री हबड़-तवड़ भागे चले आरहे थे, कोई बेल्ट बाँधता आ रहा था तो कोई टोपी ठीक करता तो कोई ग्ल्व्ज़ पहनता बाकी खड़े सब हँस रहे थे और पचास-पचास रुपए परहैड के हिसाब से फ़ाइन की राशि जोड़ रहे थे। तीन सदस्यों पर फ़ाइन हुआ। तुरंत डेढ़ सौ रुपए एकत्र कर लिए गए।

{फ़ाइन की बात पर याद आया कि मैं एक बात बताना भूल गयी थी शुरू में। कुछ यात्री लेट उठने के आदी थे सो रोज़ाना लेट न हो जाएँ इसके कारण एलओ साहब ने पहले दिन ही अल्मोड़ा में रात्रि-भोजन के समय हम सब की सहमति से एक नियम बना दिया था कि जो यात्री मीटिंग में या डिपारचर के समय लेट पहुँचेगा तो उसे पचास रुपया उसी समय हमारे मनोनीत कैशियर सहयात्री श्री वेणुगोपालजी के पास जमा कराना पड़ेगा। यह हरेक यात्री पर लागू था। हम सभी इसका पालन बड़े मन से करते और कराते थे। कोई ज़रा सी भी देर करे तो उसे अवज्ञा मान लेते थे। जिसपर फ़ाइन होता था उसका खूब मज़ाक भी बनाते थे।}

एलओ ने सभी ग्रुप लीडर्स से अपने-अपने सदस्य गिनने को कहा, जब सब ने अपने-अपने ग्रुप को पूरा उपस्थित बता दिया तो सहयात्री अशोक कुमार जी ने प्रतिदिन की तरह शिव-वंदना करायी और शिव नाम के जयकारे लगवाए। एलओ ने प्रस्थान का इशारा किया और सब चल पड़े।

आकाश में बादल छाए हुए थे। हल्की-हल्की फुहारें भी पड़ रहीं थीं। सभी रेन सूट में थे। सिर से पैर तक रेन-प्रूफ़ कवर। काफ़िला चल पड़ा। पोर्टर से बेंत लेकर मैं सभी के साथ चल पड़ी। थोड़ा सा ही आगे जाने पर पोनीवाल मिल गया।

आज पोनी वाले के साथ एक और लड़का था। यह वही लड़का था जो कल बंसल जी को लेकर आया था। लड़के ने मुझे ऊँचे पत्थर के पास पोनी पर बैठने के लिए कहा है। मैंने पुराने वाले की ओर देखा पर वह कुछ न बोला, उसी ने बताया, "वह नया है पहली बार आया है इसलिए ठीक से ले जा नहीं पा रहा है"। मेरे घोड़े के (सहयात्री बंसल जी वाले घोड़े के) पैर में कांटा लग गया है, यह उसे लेकर नीचे जाएगा मैं आपको आगे तक लेकर जाऊँगा।" मैंने फिर पहलेवाले लड़के से पूछा तो इस बार उसने भी हाँ मिला दी। मैंने सोचा मुझे क्या! मैं तो कु.मं.वि.नि. के ठेकेदार से पोनी हायर किए हुए हूँ कोई भी चलाए और पोनी पर बैठकर आगे बढ़ गयी।

गीले पहाड़ी संकरे मार्ग पर पोनी बहुत धीरे-धीरे चढ़ रहा था। फिसलने का बहुत डर था। मैं आगे की ओर झुककर शरीर का संतुलन बना रही थी ताकि गिर न जाऊँ।

थोड़ी देर में बारिश लुप्त और आकाश बिल्कुल नीला दिखाई दे रहा था। जो हवा ग्लब्ज़ में भी हाथ गला रही थी अब कुछ अनुशासित लगी। दिवाकर अपनी रश्मियाँ लुटा रहे थे। वर्षा-वनों की हरियाली से लदे पहाड़ों पर पड़ीं सूर्य की प्रातःकालीन कोमल किरणें प्रकृति को दिव्य-सौंदर्य प्रदान कर रहीं थीं। दायीं ओर बिल्कुल सामने हिम-मंडित धवल पर्वत-शृंखला थी।

"धवल चोटियों के नीचे छियालेख के गहरे हरे मैदान" क्या अप्रतिम सौंदर्य!!! हम निहारते आगे बढ़ रहे थे कि तभी हमारे पोर्टर ने हमें और अन्य तीर्थ-यात्रियों को उनके बीच में अन्नपूर्णा चोटी के दर्शन कराए। हमारा पोर्टर एक गाईड की तरह भी हमें बताता चलता था। हालाँकि कु.मं.वि.नि. ने दिल्ली से ही हमारे ग्रुप के लिए एक प्रशिक्षित गाईड की व्यवस्था कर रखी थी, पर एक गाईड कितने तीर्थ-यात्रियों के सथ चल सकता था!

हम सौंदर्य की पराकाष्ठा से मिलते हुए पहाड़ घाटी और नदी-झरने पार करते आगे बढ़ रहे थे कि तभी पोनी वाले ने पोनी रोक दिया, क्योंकि यहाँ हमें नाश्ता करना था।
एक छोटी से टीन से पटे कमरे में टेबल के चारों कुछ बेंच और कुर्सियाँ लगीं थीं जिन पर बैठकर यात्री गर्म छोले-पूरी का आनंद ले रहे थे। शायद यह स्थानीय ढाबा टाइप था जहाँ कु.मं.वि.नि. ने तीर्थ-यात्रियों के लिए नाश्ते का इंतजाम किया था।

कुछ यात्री प्रकाशवीर ग्रुप इत्यादि पहले पहुँचकर अपनी थाली लेकर बाहर धूप में मुँडेरसी पर बैठकर खा रहे थे। मैं, वीना मैसूर और स्नेहलता जी एक साथ बैठकर अंदर ही खा रहे थे तभी जुनेजा और एलओ भी आगए और हमारी टेबल पर खाली जगह देखकर उस पर ही नाश्ता करने लगे। वे दोनों हम चारों स्त्रियों की दोस्ती देखकर मज़ाक बनाने लगे और कहने लगे- "आखिर तक हम आपकी लड़ाई करा देंगे।" हमने हँसते हुए उनके चैलेंज को स्वीकार कर लिया और नाश्ता खाने में ध्यान लगाने को कहा। हम नाश्ता करके और चाय पीकर बाहर आए तो पता चला कि एक किमी की दूरी पर ही हमारे पासपोर्ट चैक हो रहे थे।

भारत-तिब्बत-सीमा-पुलिस बल की चैकपोस्ट थी वह। काफ़ी सारे सिपाही थे। चारों ओर राइफ़्ल्स लिए जवान खड़े थे। कोई बिना चैकिंग के आगे नहीं बढ़ सकता था। एक चबूतरे पर एक सिपाही एक रजिस्टर लिए बैठा था, जिसमें हम सभी तीर्थ-यात्रियों की डिटेल थी और फोटो भी लगी थी। वह उससे हमें और हमारे पासपोर्ट को मिलाकर हस्ताक्षर करवा कर आगे भेज रहा था।
मैंने अपने बेल्ट-पाऊच से पासपोर्ट निकाला और वहाँ जाकर लाइन में लग गयी। स्नेहलताजी ने पासपोर्ट अपने लगेज के साथ रख दिया था जबकि एलओ ने दिल्ली में ही सभी को पासपोर्ट हमेशा अपने साथ रखने को कहा था। उस समय वह बहुत परेशान हो रहीं थीं। बहुत देर बाद एलओ ने अपनी गारंटी पर आगे निकाला। एक दो यात्री और थे जिनको ऐसी ही कुछ दिक्कत आयी थी।

मैं पोनी पर बैठकर आगे बढ़ गयी। छियालेख की घाटी के सौंदर्य के मोहपाश में बँधे चलते-चलते जब "गर्ब्यांग" गाँव की कच्ची गलियों के घरों के नक्काशीदार दरवाज़े दिखायी देने लगे और क़तारों में पहाड़ी घर नज़र आने लगे तो ध्यान बदला।

गर्ब्यांग में रिहाईश अधिक नहीं थी। बहुत कम लोग वहाँ रहते हैं। बच्चे पढ़-लिखकर शहरों में बस गए हैं। कई तो प्रशासनिक-अधिकारी आई.ए.एस. भी हैं। वे सब कभी-कभी गर्मियों में अपना घर और खेत देखने आ जाते हैं। उस समय कैलाश-मानसरोवर और छोटा/आदि कैलाश जाने वाले तीर्थयात्रियों के आवागमन की चहल-पहल देखने भी गाँव आए हुए थे। गाँव की स्त्रियाँ परंपरागत वेश-भूषा में थीं। जब हमने उनका फोटो लेना चाहा तो वह घूँघट खींचकर अंदर छिप गयीं।

मैंने पोनीवाले को रोक-रोक कर पोनी पर बैठे-बैठे ही अनेक फोटो खींचे और इतनी ऊँचाई पर गाँव को देखती हुई पोर्टर से जानकारी हासिल करती हुई बढ़ने लगी इतने में ही भा.ति.सी.पु.ब. का जवान भी फोटो खींचता दिखायी दिया। उसने बताया कि वे हर ग्रुप की यात्रा की वीडियो रील और एलबम बना रहे थे। उसने मेरे पोनी पर बैठे हुए कई फोटो लिए। मैंने उससे मेरे कैमरे से फोटो खींचने का अनुरोध किया तो उसने वैसा भी कर दिया। मैं उसका धन्यवाद करके आगे चल पड़ी।

गाँव की गलियों से आगे बढ़े तो मैदान सा आया जहाँ सिपाहियों ने फिर रोका। पोनीवाले लड़के को अपना आई-कार्ड चैक कराने एक तरफ़ भेज दिया और मुझे बड़े आदर से दो सिपाही उस ओर ले गए जहाँ खुले में ही खिलती धूप में मेज-कुर्सी लगी हुई थीं। मैं जाकर बैठ गयी। इतने में ही नलिनाबैन और एलओ भी पहुँच गए। उनको भी बिठाया और पहले गर्म पानी फिर चाय और चिप्स दिए हमने हल्की-फुल्की बातचीत करते हुए चाय ली। मैं तेज धूप में गर्मी महसूस कर रही थी सो सबसे ऊपर पहना स्वेटर उतारकर कंधे पर डाल कर पोनी पर चढ़कर पुनः चल दी…

गर्ब्यांग से गुंजी

गर्ब्यांग से गुंजी तक

वाया सीती गाँव 11/6/2010 आठवाँ दिन

पर जल्दी ही हवा में ठंडक महसूस होने लगी मैंने पुनः स्वेटर लाद लिया और आगे बढ़ती रही। बीच-बीच में सहयात्री मिलते रहे। आदि कैलाश के दर्शन करके आने वाले यात्री भी मिल रहे थे जो "ऊँ नमः शिवाय" कहकर तीर्थयात्रा संपूर्ण होने की शुभकामनाएँ भी देते जा रहे थे।

हम नदी के किनारे-किनारे चले जा रहे थे। प्रकृति अपना सौंदर्य संभाल न पा रही थी, बिखरा जा रहा था, यात्री आँखों और कैमरों में भरते चले जा रहे थे। सुबह से अबतक चलते-चलते दोपहर हो गयी। लगभग एक बजे पोनी वाले ने मुझसे उतरने के लिए कहा। मैंने पोर्टर से जगह के बारे में पूछा तो उसने बताया कि यह सीती गाँव है यहाँ दोपहर का खाना मिलेगा।

मैं पोनी से उतरकर थोड़ा आगे बढ़ गयी। चौड़े खुले मैदान जैसे क्षेत्र में बिलकुल सामने काली नदी बह रही थी दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ खड़े थे। पहाड़ वाली साइड में हरी घास के मैदान में पोनियों का झुंड भोग (घास चर) लगा रहा था। एक ओर छ्प्पर वाले दो कमरे से थे। एक में ढाबे की तरह भिगोने सजे थे थे जिनमें दाल-राजमा, चावल, राई की सब्जी और रोटी थीं। दूसरे में चाय और मट्ठी इत्यादि थे।

आगे कुछ प्लास्टिक की कुर्सियाँ पड़ीं थी। थोड़ा और आगे पेड़ के सूखे मोटे-मोटे दो तने पड़े थे, जिनपर कुछ सिपाही बैठे हुए थे। उनके सामने हमारे एलओ साहब धूप में कुर्सी पर बैठे खाना खाते-खाते बीच-बीच में उनसे बातें भी करते जा रहे थे। मुझे देखते ही सिपाहियों ने अभिवादन किया और कुर्सी लेने के लिए कहा।

मैं बैठने की बजाय झोंपड़ी के पीछे की ओर चली गयी। जहाँ पोनी के बाँधने की जगह थी। उनके मल-मूत्र की इतनी दुर्गंध आ रही थी कि खड़ा न हुआ जाए, पर मुझे तो अपनी लघुशंका दूर करनी थी सो मुँह पर स्टॉल लपेट कर थोड़ा और आगे गयी जहाँ मिट्टी का बिलकुल गारा हो रहा था। मैं वहीं बैठकर आ गयी।

हाथ धोकर मैंने खाने के लिए थाली उठाई और खाना लेने पहुँची, तो वहाँ खड़े एक आदमी ने जिसे शायद पहाड़ी भाषा ही आती थी, ने खाना परोस दिया। मैं खाना लेकर बैठी ही थी कि कई सहयात्री आगए- चैतन्य, अमर, नीलोय, श्रीमती एवं उसके पति इत्यादि। भीड़ सी हो गयी। सब मस्ती करते हुए कुर्सी और लक्कड़ पर बैठ गए। श्रीमती और दूसरी अन्य महिला तीर्थयात्रियों को भी मेरी तरह पीछे ही जाना पड़ा। एलओ सभी यात्रियों से खाना खाकर जल्दी पहुँचने की कहकर आगे चल गए।

मैं खाना खाकर अन्य यात्रियों से बातें करते हुए अपने पोनी और पोर्टर का इंतज़ार करने लगी। पोनी वाले ने बताया "पोनी अभी चर रहा है, थोड़ी देर में चलेंगे।" मैं पुनः बैठ गयी। थोड़ी देर में उसने मुझे चलने के लिए बुलाया, मैं खड़ी हो गयी। वह पोनी पास में ले आया। मैं लक्कड़ के एक तरफ़ खड़े होकर जैसे ही पोनी पर चढ़ना चाहती थी लकड़ के दूसरे सिरे पर बैठे जवान मेरी मदद के लिए उठ गए बस बैलैंस बिगड़ गया और मैं गिरने की मुद्रा में आ गयी पर गिरी नहीं संभल गयी सभी भागे। जवानों ने अपना खेद प्रकट किया। मैं उनसे "परेशान न हों" ऐसा कहकर पुनः पोनी पर चढ़कर चल पड़ी।

मैं, पोनीवाला और पोर्टर बातें करते काली नदी के किनारे आगे बढ़ते जा रहे थे। मैं उनसे कुछ-कुछ पूछती रहती थी। नदी के उस पार नेपाल था। मैं नेपाल के गाँव के दृश्य देखती आगे बढ़ रही थी। मेरा पोर्टर थक चुका था सो वह बार-बार पीछे रह जाता था। मैंने उससे पानी की बॉटल लेकर पोनी वाले को दे दी और उससे आराम से आने की कहकर आगे बढ़ गयी।

थोड़ी दूर चलने पर सामने आदि कैलाश के दर्शन हो रहे थे।

आदि कैलाश भारत में ही है। यहाँ भी लोग दर्शन हेतु और प्रकृति को निहारने जाते हैं। मैं पोनी पर बैठे हुए ही फोटो लेते-लेते आगे बढ़ती रही। रास्ता प्लेन पर पथरीला था। नदी उल्टी दिशा में बहती हुई साथ दे रही थी।

कुछ देर बाद दो नदियों का संगम आया। पोनीवाले ने बताया कि यह काली और गोरी गंगा का संगम है, एक कालापानी से आ रही है तो दूसरी नेपाल की ओर जा रही है। दोनों का पानी मिलते समय भी अलग रंग दिखाता हुआ मिलता है।

अब सामने नदी के पार से गुंजी कैंप दिखायी देने लगा था। नदी पर पुल बना था जिसे पार करने से पहले एक बार फिर भ.ति.सी.पु.ब. के जावानों ने रोककर चाय पिलानी चाही, पर मैं अब कैंप पहुँचना चाहती थी सो हाथ जोड़कर उनसे क्षमा माँगते हुए पोनी पर ही बैठी रही। जवान से कहकर मैंने अपने पोनीवाले को चाय पिलवा दी। इतने में मैंने ही पोनी को संभाले रखा। बहुत सीधा था वह जानवर, चुपचाप खड़ा रहा, पोनीवाला सामने खड़ा चाय पी रहा था।

चाय पीकर वह पोनी को ले जा रहा था। पोनी तेज़ चल रहा था, क्योंकि रास्ता प्लेन था। हमने पुल से नदी पार की और खादर में बिल्कुल नदी के किनारे चलते हुए आगे बढ़ रहे थे। कभी-कभी कोई जवान या ग्रामीण नदी के किनारे से जाता हुआ दिखायी दे जाता था।

थोड़ी देर बाद नदी के बिल्कुल किनारे होने के कारण रास्ते में रेत बहुत बढ़ गयी थी। पोनी के पैर उसमें गढ़ने लगे और छोटी-छोटी पत्थर की कंकड़ियाँ उसके पैर में चुभने लगी जैसा कि वह लड़का बता रहा था तो वह असंतुलित होने लगा और आवाज़ निकालकर हिनहिनाने लगा। पोनी वाले ने मुझसे उतरने के लिए कहा मैं उतर गयी। मैं पैदल चलने लगी। पोनी तेज भागकर रेत के ऊँचे टीले पर चढ़कर वहाँ उग रही छोटी-छोटी घास खाने लगा। मैं समझ गयी अब वह आजादी चाहता है।

लगभग पचास मिनट पैदल चलकर मैं गुंजी-कैंप के प्रवेश द्वार पर पहुँच गयी। वहाँ खड़े अर्दली ने पोनीवाले को अंदर आने से मना कर वहीं से वापिस कर दिया और स्वयं मुझे अंदर अहाते में छोड़ गया।

अंदर बड़ी शांति थी। हमारे दल के जो यात्री पहुँच गए थे वह सब भी आराम कर रहे थे। मुझे एक कर्मचारी ने मेरा कमरा नंबर बताया। तभी एक कर्मचारी चाबी हाथ में लेकर आया और कमरे का ताला खोल कर मुझे प्रवेश करा गया और ताला-चाबी वहीं रखकर मुझसे कह गया "कमरा खाली मत छोड़ना, ताला बंद करके ही बाहर जाना।"

गुंजी कैंप बहुत बड़ा है। इससे ही लगा हुआ भा.ति.सी.पु.ब. का कैंप है। दोनों ओर ठहरने के लिए डोम बने है तो बीच में सुंदर क्यारियाँ। बहुत साफ़-स्वच्छ!

हमारा कमरा फाइबर का डोम नहीं था, बल्कि टीन शेड वाला अच्छा-खासा कमरा था जिसके आगे पीछे बरांडे थे, एक पंक्ति में ऐसे ही कमरे थे जिसमें लकड़ी के छः तख्तों पर बिस्तर लगे हुए थे, सामने सब अर्धवृत्ताकर फ़ाइबर के शेड वाले डोम थे।

अपने कमरे में ठहरने वाले यात्रियों में मैं सबसे पहले पहुँची, थकी हुई थी। मैंने जूते उतारे, बैल्ट-पाऊच निकालकर सिरहाने रखा और लेट गयी। पायताने पड़ी रजाई को पैरों पर डाल कर आँखें बंद कर लीं। इतने में ही एक कर्मचारी मेरे लिए गर्म पानी और बुरांस का शरबत लाया पर मुझे किसी चीज की ज़रूरत महसूस नहीं हो रही थी सो मैंने विनम्रता से मना कर दिया।

अभी कुछ पल ही हुए थे कि बाहर से खटखटाने की आवाज़ आयी मैंने आँखें खोलकर देखा तो सहयात्री श्रीमती ज्योत्सना शर्मा और रश्मी खंडूरी सामने खड़ीं थीं। वह दोनों मुझसे पहले पहुँच गयीं थीं और बराबर वाले कमरे में ठहरी हुई थीं। मैंने बैठते हुए उन्हें अंदर बुलाया और अपने पास बैठा लिया। हम तीनों बातें करने लगे। मेरी आँखें बार-बार बंद होती देख वह दोनों मुझे आराम करने की सलाह देकर चलीं गयीं। मैं कमरे में सोती रही। जब हमारे ग्रुप के अन्य यात्री आए और चहल-कदमी हुई तो मैं जाग गयी। मेरी थकान उतर गयी थी। सभी के हाल-चाल पूछे और बाहर आ गयी।

बाहर बारिश हो रही थी यात्री भीगते हुए आ रहे थे। पर पहाड़ी मौसम धोखेबाज़ होता है। एकदम बारिश बंद हो गयी और मौसम साफ़! तेज धूप निकल आयी थी।

मैं इधर-उधर टहलने लगी, तभी मुझे मेरा पोर्टर दिखायी दिया। वह मेरे पास आकर बोला, "लगेज आ गया है। मैं उठाकर ला रहा हूँ भीग गया है" और दोनों बैग्स उठाकर कमरे में रख गया।

मैं, नलिनाबेन और अन्य कई यात्री तो सुबह नहाकर चले थे पर बाकी यात्री बिना नहाए थे सो नहाने की व्यवस्था में लग गए। बड़े-बड़े पत्थरों को रखकर बनाए चूल्हे में आग जलाकर कु.मं.वि.नि. का कर्मचारी पानी गर्मकर रहा था। यात्री भी मदद कर रहे थे आग तेज करने में।

उधर रसोई में भोजन बन गया था, कर्मचारी भोजनालय वाले डोम में टेबल पर लगा चुके थे। नहा-धोकर तैयार हो-होकर यात्री खाना खाने पहुँचने लगे। मैं भी अपने सहयात्रियों के साथ खाना खाने पहुँच गयी। सब्जी, दाल, रायता, चावल और गर्म-गर्म रोटी अचार साथ में! सभी आनंद उठा रहे थे।

गुंजी पहुँचकर सभी यात्री रिलेक्स्ड महसूस रहे थे, क्योंकि कल भी पूरे दिन यहीं रुकना था। सो खाना खाकर सब सो गए। मैं भी पुनः लेट गयी पर मुझे नींद नहीं आयी क्योंकि मैं पहले सो चुकी थी।

मैं चुपके से उठी और आहिस्ता से दरवाज़ा खोला और अपने लगेज के दोनों नग बाहर वरांडे में खींचकर ले गयी। बैग खोलकर पिछले दिनों में पहने हुए गंदे कपड़े और वॉशिंग-पाऊडर निकालकर बाथरूम में जाकर कपड़े धोए और धूप में सुखा आयी। तभी देखा कि सामने बहुत छोटे से केविन में फोन करने के लिए लोग खड़े थे, मैं कमरे में आयी और कुछ रुपए बेल्ट-पाऊच से निकाल कर ले गयी।

लोग कई-कई फोन कर रहे थे और लंबी-लंबी बातचीत कर रहे थे। किसी-किसी यात्री का फोन मिल भी नहीं रहा था। सभी को जल्दी थी क्योंकि सैटेलाइट फोन से कई बार कट जाता था।

मैंने नंबर से पहले ही अपने से आगे प्रकाशवीर और के.के. सिंह से पूछकर आपना फोन मिलाया और अति संक्षेप में घर पर राजी-खुशी बताकर मुश्किल से एक मिनट में ही फोन काट दिया। वे दोनों मेरी शीघ्रता पर हँसने लगे।(मैं तीर्थयात्रा पर चलते समय ही अपने परिवार के सदस्यों से निवेदन करके आयी थी "यात्रा के दिनों में मैं प्रतिदिन अपनी कुशल-क्षेम बताने की कोशिश करूँगी पर अति संक्षेप में और किसी एक सदस्य को ही। वही सदस्य सभी को सूचित कर देगा।" मुझे पता था कि इतनी ऊँचाई पर बहुत मुश्किल होगी और सभी को समय मिलना चाहिए।)

फोन करके मैं अपने बिस्तर पर जाकर बैठ गयी। सभी जाग गए थे। जब फोन की बात पता चली तो सभी फोन करने चले गए। लौट कर सब फिर बिस्तर में बैठ गए। चाय आ गयी थी हम अपने-अपने घरों से जो खाने का सामान ले गए थे अपने अपने बैग्स से निकाले और मिलकर चाय के साथ खाने लगे।

तभी बातचीत में पता चला कि गुंजी में जवानों ने एक छोटा सा मंदिर भी बना रखा है। शाम को वहाँ कीर्तन और आरती में शामिल होना था। एलओ ने सूप पीने के बाद मंदिर पहुँचने का कार्यक्रम रखा था।

छः बजे के आसपास सूप सर्व किया गया। मैं और नलिनाबेन बाकी ग्रुप-सदस्यों को बताकर मंदिर चले गए।

मंदिर कैंप से लगभग सौ-डेढ़ सौ मीटर के फ़ासले पर था। एक छोटा कमरा जिसके अंदर बिल्कुल सामने एक कोठरी मे मूर्तियाँ लगायी हुईं थी।

बाहर आरती इत्यादि के पोस्टर लगाए हुए थे। देखभाल भी जवान ही करते हैं।

मंदिर में कुछ जवान और कुछ सहयात्री पहले से ही बैठे थे। हम भी बैठ गए। एक जवान अंदर मूर्तियों के पास पूजा और आरती की तैयारी कर रहा था। बाहर वाले कक्ष में बैठे जवानों ने ढोलक, मंजीरे, चिमटे और हारमोनियम पर तान छेड़कर बहुत सुंदर भजन सुनाए तो तीर्थ यात्रियों ने तालियाँ बजाकर उनका साथ दिया। सुनसान पर्वतों के बीच भक्ति का ऐसा समां बँधा कि कब नौ बज गए पता ही न चला। पूरा मंदिर भरा हुआ था। समापन भगवान शिव और दुर्गा माता की आरती से हुआ। सभी आरती और प्रसाद लेकर वापिस कैंप आ गए।

आते ही सीधे सभी भोजन-कक्ष की ओर चले गए। भोजन सजा हुआ था। एलओ जो हमेशा रात के खाने के समय ही सुबह के कार्यक्रम की आउटलाइन बताते थे, ने सभी से अपनी-अपनी मेडिकल-जाँच रिपोर्ट की फ़ाइल (जो दिल्ली में अस्पताल से मिली थी) बाहर रखने और साढ़े आठ बजे तक नाश्ता करके अपने अपने ग्रुपके साथ आई.टी.बी.पी. के प्रांगण में चलने के लिए तैयार रहने को कहा। तत्पश्चात अशोकजी ने वंदना करायी और सब खाना खाने लगे। कढ़ी, सब्जी दाल, रोटी चावल के साथ मीठी सैंवैंया भी थीं। भोजन सुस्वादु था। सभी ने कु.म.वि.नि. के कर्मचारियों की प्रशंसा की और धन्यवाद दिया। सच में बहुत ही स्नेह और आदर के साथ वे लोग खाना खिलाते और सेवा करते थे। हम हमेशा उनके आभारी रहेंगे।

खाना खाकर जब बाहर आए तो ठंडी हवा चलने के कारण बहुत ठंड लग रही थी। जल्दी से सभी अपने-अपने कक्ष में जाकर बिस्तर में बैठ गए। मैं, नलिनाबेन, स्नेहलता और श्रीमती बहुत देर तक बातें करते रहे। जब बहुत देर हो गयी तो सुबह उठने की दुहाई देते हुए सो गए।

- क्र्मशः

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