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05.28.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

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सातवा दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

गाला से बुद्धि

10/6/2010

(दूरी 20किमी. बुद्धि की ऊँचाई 2740 मीटर)

सातवां दिन
(इस दिन की यात्रा के तीन चरण थे, गला > लखनपुर>मालपा>बुद्धि)

 

प्रथम भाग

गाला से लखनपुर (4444 सीढ़ियाँ पार करके)

प्रातः दो बजे मेरी आँख खुली तो देखा सब खर्राटे मारकर सो रहे थे। मैं कुछ देर बिस्तर पर ही बैठी रही। फिर सोचा उठ ही लिया जाए, क्योंकि उस कमरे में तेरह लोग ठहरे हुए थे और बाथरूम-लैट्रिन एक ही था, जिसमें एक ब्लैक टंकी में पानी भरा था एक मग और एक बहुत छोटी सी बाल्टी रखी थी। न टैप न टोंटी और न वाश-वेसिन।

मैं बहुत धीरे से उठी और टॉर्च की रोशनी में मोमबत्ती और माचिस निकालकर रोशनी की और अपने टूथ-ब्रश एवं पेस्ट इत्यादि निकाल कर मोमबती सहित बाथरूम में घुस गयी।

पानी इतना ठंडा था कि हाथ डालने में भी ठंड लग रही थी। पर सब काम करने थे सो कर लिए। बड़ी हिम्मत करके दो छोटी बाल्टी पानी शरीर पर भी डाल लिया। पानी पड़ते ही मन हुआ कि ज़ोर से चीखूँ पर अन्य यात्री उठ न जाएँ इस डर से चुपचाप रही, दम घुटा सा होने लगा था फिर भी उफ़ न की।

मैंने तैयार होकर मोमबत्ती बुझा दी और पुनः बिस्तर में बैठकर "ऊं नमः शिवाय" का जाप करने लगी। तभी कल रात आयीं बीमार यात्री उठ गयीं और बाथरूम की ओर जाने लगीं। मैंने मोमबत्ती जलाकर बाथरूम में रखदी और उन्हें अंदर भेज दिया। वापिस आने पर उन्हें बिस्तर में लिटाकर पुनः अपने बिस्तर पर जा बैठी तो देखा तीन बजे थे मुझे बहुत ठंड लग रही थी और चाय की हुड़क भी उठ रही थी पर "अभी बहुत रात है" ऐसा सोचते हुए पुनः लेट गयी और कब नींद आ गयी पता ही नहीं।

लगभग साढ़े चार बजे चाय आयी तो स्नेहलताजी जो मेरे पास वाले बिस्तर पर सोयीं थीं ने मुझे हिलाया और बोलीं, "प्रेमलताजी तबियत ठीक है जो अभी तक सो रही हो? चाय ले लो, सब तैयार हो रहे हैं तुम भी उठ जाओ देर हो जाएगी।"

जब मैंने उन्हें बताया कि मैं तैयार होकर सो रही हूँ तो उनका आश्चर्य भरा मुख देखने लायक था। वह मुझे अपना कंबल उढ़ाकर बड़े प्यार से सोने के लिए कहने लगीं पर मैं जाग रही थी।

जब सब तैयार हो गए तो मैंने फुर्ती से उठकर अपना बैग सँभाला, जूते पहने और बेंत लेकर सभी के साथ बाहर आ गयी। सभी के पोर्टर भी वहीं खड़े थे। मेरे पोर्टर ने देखते ही मेरा हैंड बैग मुझ से ले लिया।

एलओ सीटी बजाकर सभी को बुला रहे थे। एक मेज पर बोर्नबिटा मिला दूध रखा था। सभी अपनी ज़रूरत के हिसाब से पी रहे थे। मुझे दूध-प्रोड्क्ट पचते नहीं सो थोड़ा सा लिया।

जब सभी यात्री एकत्र हो गए तो एलओ ने आज की यात्रा के पड़ाव निश्चित किए और शिव-वंदना के साथ चलने को कहा।

पोनी थोड़े आगे मिलने थे सो यहाँ से सभी को पैदल ही निकलना था। "जय भोले की" बोलते हुए सभी आगे बढ़ गए।

थोड़ी दूर पर ही मेरा पोनी मिल गया, मैं लपककर चढ़ गयी, बेंत पोर्टर को थमा दिया, यहाँ पहाड़ी रास्ता बहुत ही संकरा था। पैदल चलने में चारों ओर देखना मुश्किल हो जाता है। संतुलन बनाकर चलें या फिर सौंदर्य देखें! पर मुझे पोनी पर कोई दिक़्क़त नहीं होती। पोनी चलाने की ज़िम्मेवारी पोनीवाले की होती है, यात्री तो बस बैठने में संतुलन बनाता है।

चारों ओर सुंदर दृष्यों को देखते हुए और साथ चलती काली नदी की डरावनी लहरों का तांडव देखते हुए आगे बढ़ने लगे।

अब आसमान साफ़ हो गया था। धूप निकल आयी थी। जब कोई चट्टान नीचे झुकी हुई आती तो पोनीवाला नीचे उतारकर पोर्टर के साथ चलने को कहता और पोर्टर भी बड़ी ज़िम्मेदारी से बेंत मुझे देकर साथ-साथ चलता। इतना ही नहीं अत्यधिक संकीर्ण पगडंडी पर वह मुझे पहाड़ की ओर और स्वयं नदी की ओर होकर निकालता था। मेरा पोर्टर बहुत अनुभवी था। उन्नीस सौ तिरासी से पोर्टर है।

झुकी चट्टान हटने पर पुनः पोनी पर बैठ जाती इस तरह कठिन पहाड़ी मार्ग पर चलते-चलते हम लगभग साढ़े नौ बजे लखनपुर गाँव में पहुँचे तो पोनी वाले ने नीचे उतार दिया। पास में ही एक झोंपड़ी सी में हमारे नाश्ते का प्रबंध था। गर्मा-गर्म छोले और पूरी!

घर में तली हुई चीजें खाने से बचने वाले सभी यात्री इतने थके और भूखे थे कि टूट पड़ रहे थे नाश्ते पर। पीने के लिए चाय और गर्म पानी भी था। पोनीवाला और पोर्टर सामने बनी झोंपड़ी में जाकर नाश्ता-पानी करने लगे। यात्री आ रहे थे, खा रहे थे और जा रहे थे।

मैं नाश्ता करके लघुशंका के लिए जगह तलाशने लगी पर कोई निश्चित स्थान नहीं था। जंगल, पहाड़ और उफनती नदी! मैं डरती-डरती काली नदी की ओर थोड़ा नीचे उतरकर झाड़ियों की ओर जाकर अपने को निवृत कर आयी। अन्य महिला यात्री भी वहीं जाने लगीं।

वापिस आकर पोनी के बारे में पूछा तो पता चला कि अब आगे पोनी बहुत देर बाद मिलेगा। अब पैदल ही चलना होगा। रास्ता बहुत कठिन था। चार हज़ार चार सौं चौबालीस सीढ़ियाँ उतरनी थीं।

मैं भोले का नाम लेकर हर सीढ़ी पर "ऊं नमः शिवाय" का उच्चारण करती एक हाथ में बेंत पकड़कर संतुलन बनाती पोर्टर के साथ चल पड़ी।

ये सीढ़ियाँ क्या मानों पत्थरों को फेंक-फेंककर बनायी हुई सीढ़ियाँ हों। देखने में तो उबड़-खाबड़ टेढ़े-मेढ़े, छोटे-बड़े पत्थर बेतरतीब पड़े थे। फिर भी …

उतरते-उतरते घुटने दर्द कर रहे थे, पत्थर पर पैर रखते हुए कभी-कभी संतुलन नहीं बनता था तो पोर्टर हाथ पकडकर उतारता था। कभी बायीं ओर पत्थर ठीक लगता था तो वहाँ पैर रखते और कभी दायीं ओर तो वहाँ पैर रखते हुए नीचे उतर रहे थे, तब भी ग़लत पैर रखने पर गिरते-गिरते बचती थी और पोर्टर की डाँट भी खाती थी - "कहना नहीं मानती हो"। मैं मुस्करा देती और आगे बढ़ने लगती…

सीढ़ियाँ थीं कि कभी खत्म न होने वाली उतराई थी! जब भी पोर्टर से पूछती कि कितनी सीढ़ियाँ और हैं तो व हर बार एक ही जवाब देता- "थोड़ी और हैं।"

लखनपुर से मालपा

(10/6/2010 सातवाँ दिन)

सीढ़ियाँ उतरते-उतरते घुटने जवाब देने लगे थे पर कैलाश दर्शन की लालसा से हिम्मत पूरा साथ दे रही थी। पोर्टर भगवान का दूत लग रहा था। जो बड़े संतुलित और संयमित ढंग से ले जा रहा था। रास्ता ऐसा था कि कहीं रुक नहीं सकते थे। पहाड़ और खाई के बीच सीढ़ीनुमा रास्ता!!

अंत मे वे सीढ़ियाँ आ ही गयीं जब पोर्टर ने कहा "बस खत्म हो गयीं सीढ़ियाँ" मैंने पोनी के बारे में जानना चाहा कि वह कब बिठाएगा तो पोर्टर ने दूर एक जगह दिखाते हुए कहा कि वहाँ मिलेगा। पर वहाँ पहुँचने पर भी वह वहाँ न मिला।

मैं पसीने में तर-बतर हाँफती हुई बार-बार पोर्टर से पानी की बोतल माँगकर दो घूँट पानी पीती और वापिस देती हुई आगे बढ़ रही थी पर चलना कठिन हो रहा था क्योंकि मार्तंड बिल्कुल सहयोग नहीं कर रहे थे, बल्कि हमारी परीक्षा सी ले रहे थे। हवा धूल उड़ा रही थी।

घुमावदार छोटी सी पगडंडी जिसके एक ओर विशाल-विकराल अटल पहाड़ थोड़ी सी भी जगह अपनी ओर नहीं दे रहे थे तो दूसरी ओर साँय-साँय करती, गिरी हुई शिलाओं और चट्टानों पर से कूदती-फांदती काली काल-रूप में अपनी ओर खिसकने नहीं देती थी। बस संकुचित रास्ते पर आँखें गढ़ाए चलते जा रहे थे, बेंत का सहारा और पोर्टर का साथ हमें निर्देशित सा कर रहा था।

कहीं कोई पहाड़ की खखोड़ आती तो पोर्टर बैठने की सलाह देता और हम कुछ क्षण बैठकर पानी पीते और नीचे काली को उदंडता करते देखते, फिर उठकर चल पड़ते ऐसे करते हुए बहुत देर हो गयी तो मैं एक जगह बैठ गयी और पोनी का इंतज़ार करने लगीं। पीछे से और तीर्थयात्री भी आने लगे पर किसी ने मेरे पोनीवाले को नहीं देखा था।

मैंने बिना पोनी के आगे बढ़ने के लिए सख्ती से मना कर दिया तो मुझे एक संतुलित सी जगह पर बैठाकर मेरा पोर्टर पुल पार पोनीवाले को ढूँढने गया। मैं काफ़ी देर बैठी रही।

सूर्य बिल्कुल सीधे मेरे सिर पर धमक रहे थे सो मैंने स्कार्फ़ से पूरा चेहरा ढककर बस आँखें छोड़ रही थीं। गौगल्स काम नहीं कर रहे थे, साँस की भाप उन्हें धुंधला कर देती थी, बार-बार साफ़ करने पड़ रहे थे।

सुनसान में मुझे अजीब सा तो लग रहा था, सामने काली बहुत डरा रही थी जैसे मुझे बुला रही हो मैं डर को दूर करती हुई फोटो ले रही थी। तभी भेड़ों के झुंड को हाँकती हुई दो स्थानीय स्त्रियाँ वहाँ से निकलीं, मैं भेड़ों की एकजुटता और आपसी विश्वास के विषय में सोचने लगी – मनुष्य तो परस्पर इतना विश्वास नहीं करता …।

दूसरी ओर से भी भेड़ों का झुंड आ रहा था जिसे एक पुरुष हाँक रहा था। भेड़ें चिल्लाती हुई और चट्टानों पर चढ़ती-उतरती अपने झुंड के साथ भागने लगीं।

उसने कुमाऊंनी मिश्रित भाषा में मेरे पोर्टर का संदेश दिया कि पोनी नहीं मिला है। वह पुलपार मेरा इंतज़ार कर रहा है। मैं वहीं पहुँच जाऊँ। मैं पहले तो बैठी रही यह सोचकर कि वह वापिस आएगा पर पीछे से मुझे सहयात्री स्मिताबेन पैदल आती दिखायी दीं। मैं उनके साथ आगे बढ़ने लगी, उनका पोनी और पोर्टर तो उनके साथ-साथ चल रहे थे, चाहे वह बैठें या न बैठें। मैं ने सोचा "मेरा पोनी तो नाश्ते के समय से गायब है? चीटिंग कर रहा होगा? अन्य क्या कारण होगा?" और चलती रही।

अब आया एक लकड़ी का हिलता सा पुल जिसके नीचे एक ओर सुपरफ़ास्ट ट्रेन की गति के समान तड़तड़-धड़धड़ गिरता झरना जिसके छींटें पुल के ऊपर भी आ रहे थे दूसरी ओर से आती काली नदी में मिल रहा था। हम दोनों चलने लगे फिर मैंने सोचा कुछ दृश्य कैमरे के अधीन कर दिए जाएँ। कुछ चित्र और वीडियो लिए और फिर चल पड़ी। थोड़ा आगे बढ़ते ही पोर्टर भी वापिस आता मिल गया और साथ हो लिया।

हमने पोर्टर से पूछा, “मालपा कितनी दूर है?” उसने कहा- "बस आने ही वाला है।" इस जगह पर भूस्खलन के कारण चारों ओर चट्टानें बिखरी पड़ी थीं।

असल में यह वही जगह थी जहाँ १९९८ में भूस्खलन के साथ-साथ बादल फटने और पुल टूटने की दुर्घटना हुई थी जिसमें मालप कैंप में रुका कै.मा. तीर्थयात्रियों का पूरा जत्था ही काल के मुँह में समा गया था। अनेक पोनी-पोर्टर और कर्मचारी भी थे जिनके शव भी न मिल सके। प्रकृति प्रलंय रूप में हो गयी थी।

स्वर्गवासी तीर्थ-यात्रियों और कर्मचारियों को मन ही मन प्रणाम करते हुए हम दोनों ने रुककर एक पल को आँखें बंद की और फिर चल पड़े। स्मरण रहे अब मालपा में कैंप नहीं लगता क्योंकि यह अभी भी सुरक्षित नहीं है पहाड़ गिरते रहते हैं इसलिए "बुद्धि" शिफ़्ट कर दिया गया है।

थोड़ा आगे चलने पर बिल्कुल पास में ही हमारा दोपहर के भोजन का प्रबंध था। छोटे से चारदीवारी से घिरे आँगन में चारों ओर बैठने के लिए सीमेंट की मुँडेर सी बनी थीं जिन पर दरी बिछी हुई थी। बीच में छोटी सी मेज पर परात में सब्जियाँ थीं।

जब हम पहुँचे तो सहयात्री श्रीमती ज्योत्सा शर्मा और उनके पति आगे जाने के लिए तैयार थे। हमने उनसे हालचाल पूछा और उनको जाने दिया फिर जूते उतारकर हाथ-मुँह धोकर खाना लेने लगे।

राई के पत्तों की तरी वाली सब्जी दाल और रोटी। इस जंगल में धन्य हैं वे कर्मचारी जो इतना भी मुहैया करा रहे थे! पर कुछ यात्रियों ने मुँह सिकोड़ा और चखकर दूर बैठ गए। मैं खाने का निरादर नहीं करती हूँ साथ ही कहीं पढ़ा था कि पहाड़ों पर मिलने वाली हरी पत्तों वाली तरकारी पर्वतारोहियों के लिए बहुत लाभदायक होती हैं सो मैं ने तो थोड़ा खाना खा लिया।

पोर्टर्स के लिए खाने की जगह अलग थी सो वह वहाँ चला गया।

मैं जल्दी ही निवृत्त हो गयी, मैंने पोर्टर को आवाज़ लगायी साथ चलने के लिए। उसने इशारे से कुछ देर रुकने के लिए कहा और यह भी बताया कि पोनीवाला भी है। मैं पोनी मिलने की बात से खुश हो गयी और चाय पीते हुए उन दोनों का इंतज़ार करने लगी…

मालपा से बुद्धि कैंप

छतरी झरना और बुद्धि कैंप

(10/6/2010 सातवाँ दिन)

थोड़ी देर में पोनी वाला आया और बोला- "आइए मैडम बैठ जाइए पोनी पर" मैंने गुस्सा दिखाते हुए उससे पूछा कि वह कहाँ ग़ायब हो गया था। वह बोला- "पोनी आगे-आगे भाग आया इसलिए मुझे भी उसके साथ आना पड़ा" मैंने डाँटते हुए कहा – "मैं बुद्धि कैंप में पहुँचकर तुम्हारी शिकायत करूँगी"। लड़का नया था सो डरा सा हो गया बोला "सॉरी" आगे से ऐसा नहीं होगा"। पोर्टर ने भी उसे डाँटा। मैं पोनी पर सवार होकर चल पड़ी।

रास्ता बहुत कठिन था। कभी एक दम उतार तो कभी सीधी चढ़ाई। संतुलन बना-बनाकर आगे बढ़ रहे थे। पोर्टर बिल्कुल साथ चल रहा था और पोनी वाले से अपनी भाषा में बातचीत कर रहा था। आगे जाकर कुछ झोंपड़ी घर दिखायी दिए मैंने पोर्टर से पूछा तो उसने कहा कि यह लमारी गाँव है। लमारी मालपा से पाँच किमी है।

अभी हम बात करते चल ही रहे थे कि भा.ति.सीमा.पु.ब. के दो जवानों ने अपने चैकपोस्ट से बाहर निकलकर, आगे बढ़कर मुझसे "ऊं नमः शिवाय" कहकर मेरे पोनी वाले से रुकने के लिए कहा। वह रुक गया और मुझे उतार दिया। जवानों ने यहाँ तीर्थ-यात्रियों के लिए चाय का प्रबंध कर रखा था। जो आता जा रहा था चाय पीकर ही जा रहा था। बड़े स्नेह और आदर के साथ वे मुझे कमरे की ओर ले जाने लगे तो बहुत सारे स्थानीय बच्चे मेरे पास भाग कर आ गए और वह भी ऊं नमः शिवाय कहने लगे। उनकी तुतलाती और हकलाती बोली थकान उतार देने वाली थी। मैंने उन सबको एक-एक दस का नोट दिया। उनमें सबसे छोटा बच्चा बड़ा ज़िद्दी था उसने अपने से बड़े लड़के से नोट छीन लिया और अपने घर की ओर भाग गया। सिपाही और मैं हँसने लगे। उन्होंने पुनः मुझसे चाय पीने का आग्रह किया, चूँकि मैं बहुत थकी हुई थी और सफ़र अभी बाक़ी था सो मैं कमरे में प्रवेश कर गयी।
चार-पाँच कुर्सी पड़ी थीं। छोटे से स्टूल पर चाय और आलू के चिप्स रखे थे। कई जवान वहाँ बैठे हुए थे। बड़े सम्मान के साथ ट्रे में रखकर मुझे चाय सर्व की गयी। पर चाय ठंडी थी। मेरे एक्प्रेशन्स से वह समझ गए और कहने लगे "यहाँ तापमान कम होने के कारण चाय बहुत जल्दी ठंदी हो जाती है। अभी कई तीर्थयात्री पीकर गए हैं"।

तुरंत चाय गर्म करने के लिए सिपाही चला गया। मैंने वहाँ बैठे सिपाहियों से अपने दल के आगे चले गए यात्रियों के बारे में पूछा। उन्होंने विवरण दिया और बीते कल की यात्रा के विषय में बताने लगे कि कैसे वीना मैसूर बहुत परेशानी से गाला तक पहुँची थीं।

मैंने चाय और चिप्स लिए चलने से पहले उनका आभार प्रकट किया। जाने लगी लगी तो दो सिपाही पोनी पर बिठाने आए।

बाहर मौसम बदल रहा था। बादल घिर रहे थे। जवानों ने मुझे जल्दी पहुँचने, बरसाती बाहर रखने और ठंड से बचने की सलाह दी साथ ही बंसल जी की शिकायत भी की – "बुजुर्ग से जो तीर्थ यात्री हैं वह कहना नहीं मानते हैं, इतनी ऊँचाई पर भी टीशर्ट में चल रहे थे, बड़ी मुश्किल से उन्हें स्वेटर पहनाया था यहीं। बीमार होने का बहुत डर है।" मुझे हँसी आगयी मैं बोली- वह हैं हीं मनमर्जी के।"

मैं उन सबको धन्यवाद करते हुर लपककर पोनी पर चढ़ गयी तो जवान आश्चर्य से देखने लगे और बोले आप तो बहुत आसानी से चढ़ गयीं। लगता है घुड़सवारी आती है? मैं मुसकरायी और हाथ जोड़ते हुए आगे बढ़ गयी।

मौसम धीरे-धीरे खराब होने लगा। काले बादल आसमान को घेरे जा रहे थे। रास्ता अभी बहुत था। मैं मस्ती में पोनी पर बैठी हुई थी तभी सहयात्री सुरेश और प्रकाशवीर जाते हुए मिले हमने आपस में ऊं नमः शिवाय कहा और मैं आगे बढ़ गयी। थोड़ा आगे गयी थी कि बायीं ओर पहाड़ों के ऊपर एक झरना छतरी का आकार लेकर गिरते हुए बरबस आकर्षित कर रहा था। मैं यह जानते हुए भी कि बारिश आने वाली है उसको कैमरे में कैद करने का मोह छोड़ न सकी। फटाफट गर्दन में लटका कैमरा खोला और चित्र लेने लगी इतने में ही मेरा पोर्टर मुझे जल्दी करने को कहने लगा। मैंने जल्दी से कैमरा कवर में रख लिया और आगे बढ़ गयी।

अभी कुछ ही आगे बढ़े होंगे कि तेज़ मूसलाधार बारिश होने लगी। मैं ने बरसाती सूट का कोट पहन लिया सोचा पाजामा गीला हो भी जाए तो क्या!

पोनी वाला जो धीरे-धीरे पोनी को बढ़ा रहा था ने पोनी रोक दिया। वह एक अन्य रुके खड़े पोनी वाले से बातें करने लगा। पोर्टर ने एक बड़ी चट्टान के नीचे मुझे खड़ाकर लिया और बोला "पहाड़ों पर बारिश के समय बहुत ख़तरा होता है, पहाड़ गिर पड़ते हैं"। बादल ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे थे बिजली चमक रही थी। मैं थोड़ा डर से सहम गयी।

कुछ देर में जब बारिश थम गयी तो हमने पुनः आगे बढ़ना प्रारंभ किया। थोड़ा आगे बढ़े तो बंसल जी हाफ़पैंट और टीशर्ट पहने पूरे भीगे हुए कंपकांपाते हुए चलते नज़र आए। मैंने उन्हें और अपने पोनी वाले को रुकने के लिए कहा।। मैं बंसलजी पर चिल्लायी कि वह अकेले क्यों चल रहे थे। वह भीगे हुए और ठंड के कारण बहुत कष्ट महसूस कर रहे थे। बैग से तोलिया निकलवाकर अपने पोर्टर से उनको सुखवाया उनके गीले कपड़े उतरवाकर उनके थैले से सूखे कपड़े पहनवाए।

अपना रेन सूट (टूपीस था कोट मैं पहने थी जो उतार दिया) पहनवाया, स्वयं मैं ने अपना दूसरा बरसाती लोंगकोट पहन लिया।

बंसल जी की हालत पैदल चलने की नहीं थी, मैं उनको अकेला छोड़कर नहीं जाना चहती थी सो साथ चल रहे पोने वाले से बहुत अनुग्रह करके उनको बिठाने के लिए कहा। वह मान नहीं रहे थे क्योंकि वह अन्य सहयात्री त्यागी के हायर किए हुए थे।

बंसलजी को गुस्सा आ रहा था वह उन्हें डाँट रहे थे, क्योंकि वह पहले भी उनसे बिठाने के लिए कह चुके थे। मैंने अपनी ज़िम्मेवारी पर तथा खुद एकस्ट्रा मनी देने का कहकर बंसलजी को पोनी पर बिठवाया और अपने साथ ले चली।

बारिश पुनः आ गयी थी। अब मैं पूरी भीग गयी थी। रास्ता पूरी तरह कीचड़ से भर गया था। पहाड़ फिसनले हो रहे थे। पोनी पर चढ़ी मैं बहुत डर रही थी पर बारिश के कारण पानी रास्ते पर तेज़ी से बहने के कारण न तो पैदल चल सकती थी और न रुक सकती थी। दोनों हाथ से संतुलन बनाए बार-बार पीछे देखती कि बंसलजी आ रहे हैं या नहीं? थोड़ा पीछे होने पर ज़ोर से चिल्लाकर साथ आने को कहते हुए बढ़ रही थी। बारिश थी कि और तेज़ हुए जा रही थी। बार-बार लगता कि अब गिरे कि तब गिरे।

आखिरकार लमारी से चार किमी दूर स्थित बुद्धिकैंप नज़र आने लगा। जैसे-तैसे करके वहाँ पहुँचे।

बुद्धिकैंप थोड़ा नीचे को बना है। प्रवेश में ही कुछ सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं। मैंने पहले बंसल जी को उतरने दिया उसके पश्चात स्वयं उतरी और भागी कैंप की ओर। प्रवेश पर ही एलओ चिंतित खड़े उन सभी यात्रियों की प्रतीक्षा कर रहे थे जो अभी तक नही पहुँचे थे।

मुझे देखते ही वह खुशी से मुस्कराए और मेरा हाल पूछा। उन्होंने मुझे मेरा कमरा बताया, मैं अपने कमरे की ओर चली गयी। वहाँ नलिनाबेन, श्रीमती और उसके पति पहले से ही विश्राम कर रहे थे। बाहर टीन के वरांडों में लगेज पड़ा था जो-जो आता जा रहा था अपना-अपना लगेज अपने कमरे मे ले जा रहा था।

मेरे पोर्टर ने मेरा लगेज कमरे में रखकर उसपर बंधी रस्सी खोलकर चला गया। मैंने सूखे कपड़े पहने गीले कपड़े फैलाए और डाइनिंग-रूम में गर्म कॉफी पीने चली गयी। वहाँ एलओ और अन्य वे यात्री बैठे हुए थे जो बहुत पहले पहुँच गए थे। एलओ कु.म.वि.नि. और भा.ति.सी.पु. बल के अधिकारियों से पल-पल की खबर ले रहे थे। खबर थी कि छतरी झरने के आगे भूस्खलन हुआ था और पहाड़ बहुत बुरी तरह गिर रहे थे। बार-बार तीर्थ-यात्रियों की गिनती हो रही थी कौन आ गया और कौन रह गया।

पता चला हमारे कई यात्री लैंड-स्लाडिंग के कारण आ नहीं पा रहे थे। रास्ता बिल्कुल बंद हो गया था। एलओ रैस्क्यू हेतु वहाँ जाने ही वाले थे कि सिपाहियों के साथ बुरी तरह भीगे और हाँते हुए एक-एक करके स्नेहलता जी, वीना मैसूर, दीपक पाँड्या जी और श्री शर्मा जी पहुँच गए। भगवान का लाख-लाख धन्यवाद था कि किसी को कोई चोट नहीं आयी थी हाँ पहुँचे बहुत परेशानी का सामना करके।

स्नेहलता जी और वीना मसूर बहुत रो रहीं थीं। सभीने उन्हें ढाढस बँधाया कि सकुशल पहुँचने पर रोना नहीं बल्कि भगवान का धन्यवाद देना चाहिए। मैं, नलिनाबेन और रश्मि उन दोनों को अपने कमरे में ले गए। उनको सूखे कपड़े पहनवाकर गर्म सूप पिलवाया।

उस कमरे में आठ तख्तों पर बिस्तर लगे थे। यहाँ भी एक बिस्तर पर आदि-कैलाश पर जाते हुए बीमार होकर वापिस जाने वाली तीर्थ-यात्री लेटी हुई थी। लाइट नहीं आ रही थी सो हम सब रजाई में दुबक गए। थोड़ी देर में बारिश बंद हो गयी।

सभी फिर चहल कदमी करने लगे। एलओ ने सीटी बजाकर सभी को डाइनिंग-रूम में बुलाया और आज की घटना की समीक्षा करते हुए सभी को कुछ सुझाव दिए। खाना लग चुका था। शिव-वंदना करके सभी ने भोजन किया और सोने चले गए। अगली सुबह साढ़े पाँच बजे प्रस्थान करना था।

कमरे में आकर मुझे याद आया कि जूते तो बिल्कुल गीले थे। मैं भागकर रसोई में पहुँची वहाँ खाना बन चुका था और खाया भी जा चुका था। मैं अपने जूते सूखाना चाहती थी चूल्हे के आगे आग के पास, पर यह क्या वहाँ तो तीर्थयात्रियों के बहुत सारे जूते पहले से ही सूख रहे थे। मैं सुबह को जल्दी उठकर सुखाने की सोचते हुए अपने कमरे में आकर बिस्तर लेट गयी। वीना मैसूर तो सो चुकी थीं पर स्नेहलता बहुत रात तक लैडस्लाडिंग के कारण बंद रास्ते पर कैसे वापिस आयीं के बारे में बताती रहीं। बातें करते करते कब नींद आ गयी पता ही न चल।

- क्र्मशः

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